Collection of my best poems, stories and other creative stuff. Randomly posted to break monotony...so...there are chances that you are reading a story I wrote 2 hours ago and in the previous post you encounter a poem written by 9-year-old Mohit.

उम्मीद है कि यहाँ (शायद) आप असली मोहित से मिल पायेंगें. :)

- Mohit Sharma






Monday, May 16, 2011

"क्लेवरता" (Cleverta) मतलब चालाकी!





"गर्मियों की छुट्टियाँ पड़ी है इस बार ख़ूब सारे दोस्त बनाऊंगा. पापा की जॉब ऐसी है की हर एक-दो साल मे उनका एक शहर से दूसरे शहर ट्रांसफर हो जाता है....कोई पक्का दोस्त बनता ही नहीं जैसे पिक्चरो और सिरियलो मे दिखाते है. 


छुट्टी पड़ने से पहले किसी क्लासमेट का घर नहीं पूछा....अब मेरी सोशल स्टडीज़ की क्लास वर्क कॉपी और व्याकरण की अभ्यास पुस्तिका खो गयी है. अब पता नहीं कैसे काम पूरा होगा. पहले दिन ही टेंशन आ गयी. पापा ने भी इतने दूर के स्कूल मे एडमिशन दिलवाया की कोई क्लासफेलो पास मे रहता भी नहीं. तेरे भैया कभी राजा की मंडी की तरफ जाए तो बताइयो वहाँ मेरे स्कूल वाले दोस्त के पापा की शॉप है.

आज पहला दिन है छुट्टियों का और मामा जी आ रहे है. वैसे जब भी मेहमान, रिश्तेदार आते है मुझे बड़ा मज़ा आता है कुछ रिश्तेदारों को छोड़ कर, सब पैसे दे ही देते है. जो ऐसे ही कुछ देर के काम से आते है उनके लिए ख़ास नाश्ता मँगाया और बनाया जाता है. समोसे, टिक्की, रसगुल्ले, बर्फी, क्रीम रोल, पेस्ट्री, पेटिज़.....हाय! बताने मे ही मुँह मे पानी आ गया. ऊपर से जो बिस्कुट-नमकीन-केक के पेकिट्स खोलने की घर वालो की तरफ से मुझे मनाही होती है वो भी मम्मी अपने आप आये हुए अतिथियों के लिए परोस देती है. पर रसोई से ड्राइंग रूम तक आने मे ही मै दो-चार बिस्कुट-केक, आदि  मुँह मे रख ही लेता हूँ फिर जल्दी से बिना कुछ बोले भाग आता हूँ....कई बार तो नमस्ते करने के लिए मुँह मे भरा सामान ख़त्म करके लौटना पड़ता है. एक बार उनके सामने नाश्ता रखने के बाद मै उनके जाने का इंतज़ार करने लगता हूँ. अब जो अपरिचित या कम जान पहचान वाले मेहमान होते है वो शर्म के मारे कम खाते है. उनके जाने के बाद पता चलता है की मँगाए 6 समोसे थे खाए गए सिर्फ 3 ....उसपर भी मै जल्दी नहीं करता, शांत बच्चा बना रहता हूँ. मम्मी-पापा खुद बुलाते है की बेटा ये समोसे-केक, आदि बच रहा है खा ले.....और फिर मै आराम से एक राजा की तरह सब ग्रहण करता हूँ. 

जो रिश्तेदार घर मे मिलने और कुछ दिन रुकने के प्लान से आते है उनके लिए अलग बर्ताव करना पड़ता है. अपनी किताबो की अलमारी लगानी पड़ती है, हर चीज़ सही जगह पर रखनी पड़ती है, जल्दी सोना और जल्दी  उठना पड़ता है ताकि आये हुए मेहमान पर अच्छा असर पड़े....ये सब करने से, बाद मे मम्मी-पापा की शाबाशी और कुछ बातों मे छुट तक मिल जाती है. मेहमानों की मदद करो, उन्हें बाज़ार घुमाने ले जाओ तो मुझे भी कुछ एक्स्ट्रा खाने की चीज़ या कपडे दिलवा देते है वो. एक बड़ी ज़रूरी बात अतिथियों के पैर रोज़ छुओ और नमस्ते, गुड मोर्निंग जो आपके यहाँ चलता हो वो भी बराबर करते रहो.....अच्छा बाई चांस भूल भी जाओ तो उनके जाते वक़्त तो ज़रूर उनके पैर बड़ी श्रद्धा से छुओ क्योकि तभी तो उन्हें हज़ार-पाँच सौ का नोट देना याद रहता है. वैसे अभी तो मेरे कंजक वाले पैसे चल रहे है....तब इतनी कन्याओ मे मै अकेला लांगुरिया था, इतने घरो मे जीमे हम लोग....किसी घर से हर बच्चे ने 10 रुपये से कम नहीं लिए. अच्छा रिंकू! कल बादाम मिल्क पिया था, आज भी मन कर रहा है...मै जा रहा हूँ....मेरी साईकल मे हवा कम है नहीं तो तुझे भी ले जाता. याद रखियो जो बातें मैंने बताई है तुझे....अच्छा, बाय! सुना तूने विडियो गेम लिया...आइयों...हाँ, घर लेकर आइयो!  चल फिर....बाय!" 



3 comments:

  1. waah! bahut badhiya mohit baba!......is me maine khud ko hi bandar se ek languriya samjh liya tha ...
    alag hi likha hai ye apne bahut achha mzaa aaya padhke....lage rahiye :)

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