Freelance Falcon ~ Weird Jhola-Chhap thing ~ ज़हन

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Saturday, July 8, 2023

एक लड़की जो कला और रंगों से जादू करती है - ज्योति सिंह (साक्षात्कार)


मोदीनगर निवासी ज्योति सिंह कई सालों से और कई विधाओं, शैलियों में कला के क्षेत्र में सक्रिय हैं। पेंटिंग, कॉमिक्स, डिजिटल आर्ट, कलरिंग में अक्सर उनका कोई न कोई काम प्रकाशित होता रहता है। वे एक फ्रीलांस आर्टिस्ट के तौर पर एक समय में कई प्रकाशनों के लिए काम करती रही हैं। ज्योति कई नए कलाकारों का मार्गदर्शन भी करती हैं। विश्व पुस्तक मेला 2023 में उनसे फिर मिलना हुआ और काफ़ी बातें हुई। 

Q. अपने परिवार के बारे में बताएं।

ज्योति - परिवार में माता पिता भैया भाभी हैं। पिताजी का फोटोग्राफी का बिज़नेस है और मां अध्यापिका हैं। पिताजी ने हमेशा बहुत प्यार किया है और करते हैं और मां तो फिर मां होती है । मुझे शिक्षित करने में मां ने हमेशा प्रेरित किया है। घर में सारे लोग बहुत caring and supportive हैं। 



Q. कला से लगाव कब से है और इस बीच आपको क्या क्या उपलब्धियां मिली?


ज्योति - बचपन से कला के साथ एक अलग रिश्ता रहा है। मैं बचपन से इंट्रोवर्ट रही हूं शांत रहती थी लेकिन peace of mind के लिए हमेशा आर्ट का सहारा लिया। कभी दुखी होती थी तो किसी को नहीं बताती थी बस पेपर पेंसिल मेरे लिए थेरेपी का काम करते थे। हालांकि इसे करियर की तरह नहीं सोचा था it was something i loved to do in my leisure time but when I was in my last semester of BBA मैंने कुछ फेमस आर्टिस्ट का काम देखा social media पर और उन्हें कॉपी करने की कोशिश की और धुन कुछ ऐसी लगी कि Institute of fine arts से एक साल का diploma कर लिया। और उसके बाद my hobby became my addiction. Mental peace achieve करने के साथ साथ मैंने नेशनल लेवल पर अलग अलग states में group exhibition में participate किया है जिसमे 15 से ज़्यादा certificates and medals हैं।

I have worked as a digital colorist with some renowned children book publishers while studying at college and currently doing digital colorist freelancing.



Q. आपके करियर में बड़ा बदलाव / टर्निंग पॉइंट कब आया?


ज्योति - After completing my post graduation I worked for an MNC for three years but उसकी वजह से आर्ट को ज़्यादा वक्त़ नहीं दे पा रही थी सिर्फ वीकेंड पर ही कुछ काम हो पाता था चूंकि मेरा रहना गुड़गांव में था तो ज़्यादा वक्त़ मिलता नहीं था लेकिन lockdown में मुझे आर्ट के साथ रिश्ता बहाल करने का मौका मिला और मैंने महसूस किया कि इसके अलावा कोई काम मेरे लिए ऐसा नहीं है जो मैं इतनी खुशी से कर सकूं जितना कि आर्ट तब से इसे फुल टाइम जॉब बना लिया। मैं समझती हूं ये मेरी ज़िंदगी या करियर का टर्निंग पॉइंट था।


Q. किन क्रिएटिव लोगों का आपके जीवन पर बड़ा प्रभाव पड़ा है?


ज्योति - बहुत से लोग रहे है जो ज़िंदगी के किसी न किसी मोड़ पर मेरी प्रेरणा बने हैं सब के नाम ले पाना मेरे लिए मुश्किल है मगर कुछ लोग हैं जिन्हें मैं समझती हूं कि अपनी फील्ड के माहिर लोग हैं और उनका impact मेरे ऊपर बहुत ज़्यादा है जिनमें Lalit Sharma ji, Pradeep Sherawat ji, Vijay Sharma ji, Jagdish Kumar Ji,  Dildeep Singh ji, Abhishek Malsuni ji, Hemant ji, Vinod uncle आदि है। 



 Q. अपने शहर मोदीनगर के बारे में कुछ बताएं। यहां की कौनसी बातें और जगहें आपको पसंद हैं?  


ज्योति - Honestly speaking मैंने मोदीनगर ज़्यादा explore नहीं किया है मगर कुछ ऐसी जगहें हैं जहां मैं अक्सर जाती रहती हूं उनमें से एक मशहूर मोदी मंदिर है जहां सुकून है शांति है cultural parks हैं यहां जहां मैं evening walk करती हूं। मोदी नगर में काफी अच्छे collages हैं। अब तो मेट्रो भी शुरू होने वाली है। I am happy कि मेरा शहर तेज़ी से तरक्की कर रहा है। 




Q. बहुत से आर्टिस्ट को पता नहीं होता कि वे नौकरी या काम के लिए कहां से सही शुरुआत करें, उनको आप क्या सलाह देंगी?


ज्योति - ये सभी के साथ होता है क्योंकि एक आर्टिस्ट आर्ट को बिजनेस समझ कर शुरू नही करता लेकिन वक्त के साथ उसे अहसास होता है कि वो अपने passion को profession में तब्दील कर ले। इसके लिए ज़रूरी है कि आप ये determine करे आप जॉब करना चाहते हैं या अपना आर्ट वर्क करना चाहते हैं। जॉब के लिए आपको market scenario पता करना पड़ेगा कि किस तरह की आर्ट relevent है कौन से courses और certificates आपके लिए helpful हो सकते हैं आपका forte क्या है linkedin नौकरी. कॉम जैसे पोर्टल्स पर कनेक्शन बनाना वगैरह मतलब कि बहुत कठिन है डगर पनघट की। मगर आपका कला के प्रति समर्पण ज़रूरी है । Everything thrives on gradually तो हो जायेगा करते करते। आर्ट के सफर का मज़ा लीजिए हो जायेगा you just need to be dedicated and aware about what you are upto. 



Q. ट्रेडिशनल आर्ट और डिजिटल आर्ट में से आपको क्या ज़्यादा पसंद है और क्यों?


ज्योति - हर फूल की अपनी खुशबू होती है इसलिए मुझे तो दोनों ही बहुत पसंद है। अलग तरह का फील है दोनो forms में । हालांकि शुरू शुरू में मुझे डिजिटल बिल्कुल पसंद नहीं था शायद इसलिए कि मेरा ज़्यादा वक्त पेंसिल पेपर के साथ बीता लेकिन अब मेरी सोच बदली है डिजिटल में आपके पास एक्सपेरिमेंट करने की आज़ादी है टाइम की बचत है कभी भी कर सकते हैं। Earning के chances डिजिटल में ज़्यादा और आसान हैं वहीं ट्रेडिशनल आर्ट में focus imagination time dedication आदि की ज़रूरत पड़ती है so i am comfortable in both forms now.



Q. कलरिंग करते समय आप किन बातों का ध्यान रखती हैं?


ज्योति - I m just a learner तो मैं आजकल सीख रही हूं कि theme के according कौनसे colour selection लेने चाहिए और grey scale पर कैसे काम किया जाता है. Story और mood के according कैसे colour choose करने चाहिए।



Q. आपके सबसे हिट प्रोजेक्ट्स कौनसे रहे हैं और आने वाले समय में आपके कौनसे प्रोजेक्ट्स आ रहे हैं?


ज्योति - मेरे लिए तो मेरी हर आर्ट मेरे दिल के करीब है लेकिन मैं समझती हूं कि आपका सबसे अच्छा काम वो है जिसमें आप अपने भाव को देखने वाले तक पहुंचाने में कामयाब हुए हैं। ऐसी ही एक painting जो मैंने अपने drawing room में लगाई हुई है भगवान कृष्ण और मीरा की । It was also my first painting on Canvas.


आने वाले प्रोजेक्ट्स की फेहरिस्त लंबी है मैने कई कॉमिक्स प्रकाशन के लिए cover page design किए है कई कॉमिक्स जिनकी कलरिंग मैंने की है आने वाले हैं लेकिन खास तौर पर मैं Reva 2 और shadow blade के लिए excited हूं।



Q. ऐसे आर्टवर्क या प्रोजेक्ट जो आपके दिल के करीब हों, लेकिन ज़्यादा लोगों तक नहीं पहुंच पाए?


ज्योति - जी हैं कुछ ऐसी पेंटिंग्स जो मैंने लॉकडाउन में बनाई है और कुछ पहले की भी है जो शायद अधूरी अधूरी ही हैं मुझे लगता है कि भविष्य में वो भी किसी exhibition का हिस्सा बनें। 



Q. आपकी पसंदीदा कॉमिक्स कौनसी हैं?


ज्योति - अब तो कॉमिक्स पढ़ने का मामला कम कम ही होता है ज़्यादा तर तो मैं उसके आर्टिस्टिक पहलुओं पर गौर करती हूं मगर बचपन में काफी कॉमिक्स पढ़ी हैं जिनमें चाचा चौधरी बिल्लू पिंकी ध्रुव नागराज वगैरा मेरी पसंदीदा कॉमिक्स रही हैं।



Q. आपकी सबसे मशहूर पेंटिंग के बारे में बताएं।


ज्योति - मेरे लिए तो मीरा और कृष्ण की पेंटिंग मेरी सबसे ज़्यादा मशहूर पेंटिंग है बहुत सारी exhibition का हिस्सा रही बहुत से लोगों ने इसे खरीदने की इच्छा ज़ाहिर की मगर मेरा इसे बेचने का बिल्कुल भी मन है क्योंकि मेरा मानना है कि आपका सबसे अच्छा काम आपके सामने होना चाहिए जिससे आपको और अच्छा करने का मोटिवेशन मिले तो फिलहाल ये पेंटिंग घर के ड्राइंग रूम की शोभा बढ़ा रही है।




Q. फुल टाइम जॉब और फ्रीलांस काम में क्या अंतर है और इनमें आप किसे बेहतर मानती हैं?


ज्योति - सबसे बड़ा अंतर आज़ादी का है फुल टाइम जॉब में आप एक schedule से bound होते है जबकि फ्रीलांस में अपनी साहूलत और शर्तों के साथ आप जीविका अर्जित करते हैं। लेकिन मैं नए आने वालों को मशवरा दूंगी कि वे ज़रूर जॉब करें ताकि उन्हें ज़्यादा लोगों से मिलने का और उनके काम को और उसे करने के तरीक़े को देखने का मौक़ा मिले। ये उनके लिए काफी फायदेमंद learning experience रहेगा। 



Q. कोविड-19 के बाद आपके जीवन में क्या बदलाव आए हैं?


ज्योति - सबसे बड़ा बदलाव तो ये कि nothing is permanent in this world इसी वजह से शायद मैं ज़्यादा down to earth हों रही हूं  चूंकि मैंने अपने करीबी लोगों को खोया है इसलिए अब ज़्यादा देर नाराज़ नहीं रहती किसी से। शायरी की तरफ झुकाव हुआ है जिसकी वजह से imagination level increase हुआ है। Work from home की वजह से आर्ट वर्क ज़्यादा कर पाई। Overall mixed experience रहा post कोविड 19। शायद इसी का नाम ज़िंदगी है सुख और दुख के समागम का नाम। बदलाव आए है लेकिन ज़रूरी ये है कि हम हर गुज़रते दिन के साथ अपने आपको सकारात्मक बदलाव की तरफ ले कर चलें।



Q. आर्ट के अलावा आप कुछ अन्य कम्युनिटी से भी जुड़ी हुई हैं, उनके बारे में बताएं।


ज्योति - जी आर्ट के अलावा और कुछ NGOs हैं जिनसे मैं जुड़ी हुई हूं जिसमें स्पाइनल कॉर्ड इंजरी से related awareness प्रोग्राम और दिव्यांग लोगों की मदद की जाती है। इसी तरह मोटिवेशनल मॉडलिंग भी करती रहती हूं मेरे साथ काफी लोग जुड़े हुए है जिनकी वजह से इस तरह के अच्छे कामों का मैं भी हिस्सा बन जाती हूं। मेरे कुछ मित्र para athlete international players भी है जिनकी वजह से sports events से भी जुड़ाव है।

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#ज़हन

Sunday, November 26, 2017

"...और मैं अनूप जलोटा का सहपाठी भी था।"

*कलाकार श्री सत्यपाल सोनकर

पिछले शादी के सीज़न से ये आदत बनायी है कि पैसों के लिफाफे के साथ छोटी पेंटिंग उपहार में देता हूँ। पेंटिंग से मेरा मतलब फ्रेम हुआ प्रिंट पोस्टर या तस्वीर नहीं बल्कि हाथ से बनी कलाकृति है। पैसे अधिक खर्च होते हैं पर अच्छा लगता है कि किसी कलाकार को कुछ लाभ तो मिला। एक काम से घुमते हुए शहर की तंग गलियों में पहुँचा खरीदना कुछ था पर बिना बोर्ड की एक दुकान ने मेरा ध्यान खींचा जिसके अंदर कुछ कलाकृतियाँ और फ्रेम रखे हुए थे। सोचा पेंटिंग देख लेता हूँ। कुछ खरीदने से पहले एक बार ये ज़रूर देखता हूँ कि अभी जेब में कितने पैसे हैं या एटीएम कार्ड रखा है या नहीं। एक कॉन्फिडेंस सा रहता है कि चीज़ें कवर में हैं। किस्मत से जिस काम के लिए गया था उसको हटाकर जेब में 200-300 रुपये बचते और कार्ड भी नहीं था। अब पता नहीं इस तरफ कब आना हो। इस सोच में दुकान के बाहर जेब टटोल रहा था कि अंदर से एक बुज़ुर्ग आदमी ने मुझे बुलाया। 
अंदर प्रिंट पोस्टर, फ्रेम किये हुए कंप्यूटर प्रिंट रखे थे और उनके बीच पारम्परिक कलाकृतियाँ रखी हुई थीं। पोस्टर, प्रिंट चमक रहे थे वहीं हाथ की बनी पेंटिंग्स इधर-उधर एक के ऊपर एक धूमिल पड़ी थी जैसे वक़्त की मार से परेशान होकर कह रही हों कि 'देखो हम कितनी बदसूरत हो गयी हैं, अब हमें फ़ेंक दो या किसी कोने में छुपा कर रख दो...ऐसे नुमाइश पर मत लगाओ।' मैंने उन्हें कहा की मुझे एक पेंटिंग चाहिए। 
"मेरी ये पेंटिंग्स तो धुंधली लगती हैं बेटा! आप प्रिंट, पोस्टर ले जाओ।"
सुनने में लग रहा होगा कि इस वृद्ध कलाकार को अपनी कला पर विश्वास नहीं जो प्रिंट को कलाकृति के ऊपर तोल रहा है। जी नहीं! अगर उसे अपनी कला पर भरोसा ना होता तो वो कबका कला को छोड़ चुका। उसे कला पर विश्वास है पर शायद दुनिया पर नहीं। मैंने उन्हें अपनी मंशा समझायी और धीरे-धीरे अपने कामों में लगे उस व्यक्ति का पूरा ध्यान मुझपर आ गया। आँखों में चमक के साथ उन्होंने 2-3 पेंटिंग्स निकाली। 

"बारिश, धूप में बाकी के रंग मंद पड़ गये हैं। अभी ये ही कुछ ठीक बची हैं जो किसी को तोहफे में दे सकते हैं।" 

 मेरे पास समय था और उसका सदुपयोग इस से बेहतर क्या होता कि मैं इस कलाकार, सत्यपाल सोनकर की कहानी सुन लेता। 

1951 में चतुर्थ श्रेणी रेलवे कर्मचारी के यहाँ जन्म हुआ। सात बहनों के बाद हुए भाई और इनके बाद एक बहन, एक भाई और हुए। तब लोगो के इतने ही बच्चे हुआ करते थे। कला, रंग, संगीत में रुझान बचपन से था पर आस-पास कोई माहौल ही नहीं था। वो समय ऐसा था कि गुज़र-बसर करना ही एक हुनर था। कान्यकुब्ज कॉलेज (के.के.सी.) लखनऊ में कक्षा 6 में संगीत का कोर्स मिला जिसमें इनके सहपाठी थे मशहूर भजन, ग़ज़ल गायक श्री अनूप जलोटा। स्कूली और जिला स्तरीय आयोजनों, प्रतियोगिताओं में कभी अनूप आगे रहते तो कभी सत्यपाल। एक समय था जब शिक्षक कहते कि ये दोनों एक दिन बड़ा नाम करेंगे। उनकी कही आधी बात सच हुई और आधी नहीं। जहाँ अनूप जलोटा के सिर पर उनके पिता स्वर्गीय पुरुषोत्तम दास जलोटा का हाथ था, वहीं सत्य पाल जी की लगन ही उनकी मार्गनिर्देशक थी। पुरुषोत्तम दास जी अपने समय के प्रसिद्द शास्त्रीय संगीत गायक रहे जिन्होंने शास्त्रीय संगीत की कुछ विधाओं को भजन गायन में आज़माकर एक नया आयाम दिया। अनूप जलोटा ने संगीत की शिक्षा जारी रखते हुए लखनऊ के भातखंडे संगीत विश्वविद्यालय से डिग्री पूरी की, फिर लाखो-करोड़ो कैसेट-रिकार्ड्स बिके, भजन सम्राट की उपाधि, पद्म श्री मिला, बॉलीवुड-टीवी, देश-विदेश में कंसर्ट्स....और सत्यपाल? घर की आर्थिक स्थिति के कारण वो अपनी दसवीं तक पूरी नहीं कर पाये। 1968 में कारपेंटरी का कोर्स कर दुनिया से लड़ने निकल गये, जो लड़ाई आजतक चल रही है। रोटी की लड़ाई में सत्यपाल ने कला को मरने नहीं दिया। उनकी कला उनसे 5-7 बरस ही छोटी होगी। फ्रेमिंग का काम करते हुए कलाकृतियाँ बनाते रहे और बच्चों को पेंटिंग सिखाते रहे। 
*इस पेंटिंग को बनाने में लगभग 2 सप्ताह का समय लगा

"आप पेंटिंग सिखाने के कितने पैसे लेते हैं?"

"एक महीने का पांच सौ और मटेरियल बच्चे अलग से लाते हैं। जिनमें लगन है पर पैसे नहीं दे सकते उनसे कुछ नहीं लिया।"
कभी एक सतह पर खड़े दो लोग, आज एक के लिए अलग से प्राइवेट जेट तक आते हैं और एक खुले पैसे गिनने में हुई देर से टेम्पों वाले की चार बातें सुनता  है। कला के सानिध्य में संतुष्ट तो दोनों है पर एक दुनियादारी नाग के फन पर सवार है और एक उसका दंश झेल रहा है। सत्यपाल जी की संतोष वाली मुस्कराहट ही संतोष देती है। क्या ख्याल आया? पागल है जो मुस्कुरा रहा है? पागल नहीं है जीवन, कला और उन बड़ी बातों के प्यार में है जिनके इस छोटी सोच वाली दुनिया में कोई मायने नहीं है। क्या सत्यपाल हार गये? नहीं! वो पिछले 49 सालों से जीत रहे हैं और जी रहे हैं। अपने शिष्यों की कला में जाने कबतक जीते रहेंगे। 
ओह, बातों-बातों में इनकी चाय पी ली और समय भी खा लिया। अब दो-ढाई सौ रुपये में कौनसी ओरिजिनल पेंटिंग मिलेगी? एटीएम कार्ड लाना चाहिए था। कुछ संकोच से पेंटिंग का दाम पूछा। 

"75 रुपये!"

अरे मेरे भगवान! धरती फट जा और मुझे खुद में समा ले। क्या-क्या सोच रहा था मैं? सत्य पाल जी ने तो मेरी हर सोच तक को दो शब्दों से पस्त कर दिया। क्या बोलूँ, अब तो शब्द ही नहीं बचे। आज पहली बार मोल-भाव में पैसे बढ़ाने की कोशिश कर रहा था। मैंने कोशिश की पर उन्होंने एक पैसा नहीं बढ़ाया। मैंने बचे हुए पैसो की एक और थोड़ी बड़ी पेंटिंग खरीदी और वहाँ आते रहने का वायदा किया। आप सबसे निवेदन है कि डिजिटल, ट्रेडिशनल आदि किसी भी तरह और क्षेत्र के कलाकार से अगर आपका सामना हों तो अपने स्तर पर उनकी मदद करने की कोशिश करें। विवाह, जन्मदिन और बड़े अवसरों पर कलाकृति, हस्तशिल्प उपहार में देकर नया ट्रेंड शुरू करें। 

नशे से नज़र ना हटवा सके...
उन ज़ख्मों पर खाली वक़्त में हँस लेता हूँ,
मुफ़लिसी पर चंद तंज कस देता हूँ...
बरसों से एक नाव पर सवार हूँ,
शोर ज़्यादा करती है दुनिया जब...
उसकी ओट में सर रख सोता हूँ। 
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#ज़हन

Thursday, August 13, 2015

Guest appearance in Ashes (RSP)


Guest appearance in Ashes -Adish Origins (Red Streak Publications) after winning "Fire for Fear" writing contest (with co-winner Utkarsh Sikriwal). 

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Nyctophobia Struggle....

My entry for Red Streak Publications Fire for Fear Contest. 

                                                             Red Streak Publications
Entry #4
from meerut

डर हर किसी के जीवन का अंग है, बस उसके कारक अलग-अलग हो सकते है पर डर का अनुभवकभी ना कभी हम सभी करते है। अपने अनुभव से मैंने यह सीखा है कि डर को टाल कर हम उसे अपनी आदत में आने का और बड़ा होने का अवसर दे देते है जबकि उसका सामना कर उसको हराना उतना मुश्किल नहीं जितना हम समझते है। जीत कभी तुरंत मिल जाती है और कभी धीरे-धीरे भय को मारा जाता है।

मेरा डर अँधेरे से था। वजह तो पता नहीं पर बस यही एक बात थी जिस से मुझे बेचैनी होती थी। बचपन तो मम्मी-पापा के बीच में राजा की तरह सोकर कट गया पर टीनएजर होने पर बड़े भैया और दीदी के अलग शहरों में जाने के बाद अपना कमरा मिला तो रात में लाइट ऑफ करना मेरे लिए एक संघर्ष बन गया। जैसा मैंने कहा कि इसका कारण मुझे याद नहीं पर अवचेतन मन में शायद कोई बचपन में सुनी कहानी घर कर गयी थी या मैंने खुद ही कोई अनजान अनुभव गढ़ लिया था। धीरे-धीरे घरवालो ने इस आदत के लिए टोकना शुरू किया पर हमेशा मेरे पास कुछ ना कुछ बहाने रहते थे लाइट जली छोड़ने के। शायद समय के साथ मेरे पिता जी जान चुके थे पर मुझे बुरा ना लगे इसलिए उन्होंने कभी ज़्यादा ज़ोर नहीं दिया इस बात पर मेरे बड़े होने के बाद भी।

यह भय केवल अंधकार का नहीं था बल्कि उसमे गढ़ी अज्ञात बातों, काल्पनिक भूत-प्रेतों, जीवों का भी भय था। जब भी लाइट ऑफ कर सोने की कोशिश करता तो ऐसा लगता जैसे कोई कमरे में बैठा मुझे देख रहा है। उस ओर पीठ कर सोने को होता तो लगता कि वह और पास आ गया है। वैसे अंधेरे में कहीं बाहर टहलने में, किसी अँधेरी जगह जाने में यह डर शायद इसलिए नहीं लगता था क्योकि मन को गाड़ियों-लोगो कि आवाज़ों से यह तस्सली रहती थी कि आस-पास कोई है और कुछ अनहोनी होने पर मैं दौड़ कर उनके पास पहुँच सकता हूँ। पर रात को ना लोगो कि आवाज़े रहती और ना ही मैं परिवार के सदस्यों को परेशान करना चाहता था इसलिए चाहे-अनचाहे मुझे अपने कमरे में मुझे घूरते अनजान जीवों के साथ रहना पड़ता।

इन्वर्टर आम होने के ज़माने से पहले लाइट जाने पर रात में अगर मेरी नींद खुलती तो 15-20 मिनट्स तक करवटें बदलने तक अगर लाइट वापस नहीं आती तो मुझे बरामदे में टहलना पड़ता जहाँ दूर की स्ट्रीट लाइट्स से, घरों से थोड़ी बहुत रौशनी रहती थी। वैसे तो टोर्च भी थी पर घुप्प अँधेरे में टोर्च की रौशनी घरवालो का ध्यान खींच सकती थी और उसे किसी तरह ढकने या एंगल बदलने पर फायदा ना होता। पूरी कोशिश रहती थी की मेरे परिवार पर यह बात ज़ाहिर ना हो इसलिए रात में कम से कम हरकते करता था। एक बार तो सरकारी मकान में अपने कमरे कि खिड़की के कोने में अच्छा-खासा छेद कर दिया जिस से लाइट जाने पर भी दूर अलग फेज़ की स्ट्रीट लाइट की बीम से कमरे में थोड़ा उजाला रहे।

समय के साथ चीज़ें बदली पर यह आदत जैसे मेरे रूटीन में आ गयी। अगर मैं कहीं किसी के यहाँ कुछ दिनों के लिए बाहर जाता या किसी फंक्शन आदि वजह से कोई मेरे कमरे में सोता तब मुझे ऐसा कोई डर नहीं लगता था। पर यह बात 25 साल के हो जाने के बाद भी जारी रहने पर मुझे परेशान करने लगी। जब भी मैं लाइट बंद कर सोने की कोशिश करता तो कुछ ही देर में इतनी बेचैनी हो जाती कि उठकर स्विच ऑन करना पड़ता। अब खुद पर गुस्सा बढ़ने लगा था। पहले तो 6 फ़ीट से ऊपर अपने शरीर को देख कर लगता था कि ऐसा क्यों करता हूँ मैं, फ़िर इस बात को बचपन से अब तक घसीटते जाने पर। एक यह सोचने पर हँसी और रोष दोनों आते थे कि बचपन से अब तक मैं कितनी लाइट वेस्ट कर चुका हूँ इस डर के चक्कर में।

समस्या पर गौर करने पर मैंने पाया कि अब तक मैं सिर्फ इसको अनदेखा कर रहा था, टालते हुए बच रहा था पर असल में मैंने कभी इसका सामना तो किया ही नहीं। सबसे पहले तो मैंने पाया की मेरा शरीर और मेरी आँखें रात में रौशनी की इतनी अभ्यस्त हो चुकी थी कि उजाला कम या बंद होने पर अपने आप मेरी नींद टूट जाती थी, शायद तभी कहते है कि बहुत लम्बे समय तक बुरी आदत के साथ रहने पर उस से पीछा छुड़ाना लगभग नामुमकिन सा हो जाता है। फिर मैंने अपने कमरे में रात के लिए अलग से ज़ीरो वॉट का बल्ब लगाया और कुछ हफ्ते उसमे सोया। जब मुझे कुछ अंतर महसूस हुआ तो समय था डर से सीधे उसके इलाके में युद्ध करने का। मैंने एक रात वह बल्ब भी ऑफ कर दिया पर पूरी रात सो नहीं पाया, पसीने से लथपथ बेचैनी का यह सिलसिला कुछ दिनों तक चला। फिर मैंने ध्यान बटाऊ टैक्टिक्स सोचे जैसे सोने से पहले खुद को अलग-अलग विचारों में डुबा देना, एक्सरसाइज से बहुत थका लेना, भगवान जी का स्मरण करते रहना, म्यूजिक सुनना आदि जिस से फायदा हुआ पर लगा कि यह भी भय को टालना हुआ, उसका सामना करने के बजाए।

अब मैंने बिना सहारे के सीधा मुकाबला करने की ठानी। मैं कमरे में हर उस तरफ उन काल्पनिक आँखों में देखता रहता जब तक मुझे नींद नहीं आती। अंतर लग रहा था, मैं बेहतर महसूस कर रहा था। कुछ दिन बाद अपने रूटीन में मैंने बिस्तर से तुरंत उठ कर कमरे के उन कोनो, जगहों पर जाकर घूरना शुरू कर दिया जहाँ मुझे लगता कोई मुझे बैठा/खड़ा घूर रहा है। इस बात कि घूरने वाले/वाली को शायद आदत नहीं थी, अब मैं भी अंधेरे के उन काल्पनिक लोगो को वैसे ही परेशान कर रहा था जैसे होश संभालने के बाद से अब तक उन्होंने मेरी नींद हराम कि थी (और मेरे पापा का बिजली का बिल बढ़वाया था)। आखिरकार मैंने इस डर को खुद से अलग कर लिया था और जैसे एक भ्रम को राख कर मन से एक भारी बोझ कम कर लिया। मैं चैन से सोने के लिए अब उजाले पर निर्भर नहीं। अब कभी कभी वह घूरने वाला कमरे मे आता है तो उस तरफ मुस्कुरा कर आराम से सो जाता हूँ।

Monday, June 11, 2012

Featured Work : "Good Company and Bad Company"

 Alternate version for kids (without racism and easy to understand language) of my story is now on "English for Students" website - Story Link. The story was originally posted on Storywrite, Allpoetry and Raj Comics websites by me. 



Two parrots had built their nest on a banyan tree. The female parrot laid two eggs in the nest. After sometime, the eggs latched. Two chicks came out of them. The parent birds took good care of them. After few weeks, the young birds were able to fly for some distance. 

Every morning the parent birds flew out to fetch food for the young birds. Then they returned in the evening with food for their young children. This was their lives went on for a while. 

A hunter saw this behavior of these birds. He learned that the old birds went out in the morning. He decided to catch the young birds after their parents would go away in the morning. As planned he caught the young birds. The young birds struggled their best to free themselves from the clutches of the hunter. One of the two young parrots escaped from the hunter. The other bird was taken in a cage by the hunter to his house. 

“I caught two parrots, but one of them escaped,” said the hunter to his children and he further added to his children, “Keep this parrot safely in the cage and play with this parrot.” 

The hunter’s children played with the parrot. Very soon the parrot in the house of the hunter learnt to speak few words.

The other parrot flew away. It had escaped from the hunter. It flew for some time. Then it came to a hermitage. Some holy men lived in the hermitage. They did not do any harm to the young parrot. The young parrot stayed there. It listened to their talk. It learnt to say a few words. 

A traveler was walking near the hunter’s hut. He was tired. He sat next to a hut. He heard the parrot speak. “Fool, why have you come here? I will cut your throat.” 

The traveler was very sorry to hear such bad words. He got up immediately and left the place in a hurry. Then he walked for some time and reached the hermitage. The parrot was sitting on a tree near the hermitage. 

The parrot spoke, “Welcome, traveler. Welcome to this hermitage. We have a lot of good fruits in this forest. Eat whatever you like. The holy men will treat you well.” 

The traveler was surprised. He said to the parrot. “I met a young parrot near a hunter’s hut. It spoke badly. I left the place immediately. Now I have met you. You speak so well. Your words are kind and gentle. Both you and the other birds are parrots. Then why this difference in your language is there?” 

By this statement, the parrot in the hermitage guessed that the other parrot was none other than its brother. The hermitage parrot said, “Traveler, the other parrot is my brother. But we have lived in two different places. My brother has learnt the hunter’s language. But I have learnt the language of holy people. It is the company that shapes your words and deeds.” 

Moral - Good company helps you learn good things. Bad company makes you lean bad things.