Freelance Falcon ~ Weird Jhola-Chhap thing ~ ज़हन

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Saturday, May 16, 2026

When Businesses Optimize Themselves Into Distrust (Article)


I recently wrote an article diving deep into this topic. You can read the full piece here:

What if your best cost-cutting decision is quietly damaging your company’s future?

Modern businesses focus heavily on visible metrics like revenue, clicks, and quarterly targets. But spreadsheets cannot measure trust, loyalty, creator goodwill, or brand memory.

When projects are abruptly shut down to improve short-term numbers, the damage spreads silently.

Freelancers stop seeing the company as a long-term partner. Emotional investment fades, quality drops, and top talent becomes hesitant.

Users notice these patterns too. Over time, they stop emotionally investing in new products and trust begins to weaken.


The biggest problem is that some savings only delay a much larger future cost.

Data is important, but it is only a compass, not the entire landscape. Some investments work like seeds. They take time to grow, but eventually shape long-term loyalty, reach, and sustainability.

A company’s real strength is not just in its immediate numbers. It is in how confidently people invest their time, creativity, and trust into its ecosystem.









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Monday, December 13, 2021

सरकारी संन्यास (हास्य व्यंग)

 

[नोट - यह एक हास्य कहानी है, इसका उद्देश्य किसी की भावनाओं को ठेस पहुंचाना नहीं है। (स्वयं लेखक कई प्रतियोगी परीक्षाओं में असफल हो चुके हैं।)]

आज संवाददाता विकास, झेलम कस्बे की बड़ी खबर को कवर करने आए थे।

रिपोर्टर विकास - " आज झेलम कस्बे के सेलिब्रिटी, श्री डफली कश्यप जी ने 34 साल की उम्र में अपने साढ़े 13 साल के प्रतियोगी परीक्षा के करियर से सन्यास की घोषणा की। डेढ़ साल पहले ही डफली जी ने अपने कस्बे और आस-पास के गाँवों में सबसे ज़्यादा प्रतियोगी परीक्षाओं में बैठने का रिकॉर्ड बनाया था। उनके संन्यास लेने के बयान से उनके परिजनों और दोस्तों में खुशी की लहर दौड़ गई है और उनकी सरकारी नौकरी की आस लगाए बैठी उनकी गर्लफ़्रेंड भी दूसरे बैकअप प्रेमी की और दौड़ गई है। आइए डफली जी से जानते हैं कि कब और कैसे उनकी ऐसी डफली बजी..."

रिपोर्टर विकास - आप अब तक कितनी प्रतियोगी परीक्षाओं में हिस्सा ले चुके हैं?
डफली - मैं 197 बार अलग-अलग भर्तियों के लिए लिखित परीक्षाओं में बैठ चुका हूं।

रिपोर्टर विकास - ओह! बेहतरीन! तो क्या आपके मन में नहीं आया कि दोहरे शतक का जादुई आंकड़ा छुआ जाए?
डफली - हा-हा...अब 99 के फेर में जितना घुसा जाए, उतना कम है। ऐसे तो मेरे दो-चार सीनियर ने 300 का आंकड़ा पार करने के बाद संन्यास लिया था। हां, मैंने करीब 250 फ़ॉर्म भरे होंगे। यह संख्या देखकर लगता है कि मैं दोहरा शतक आसानी से मार सकता था।

रिपोर्टर विकास - तो कहाँ चूक रह गई?
डफली - दरअसल, लगभग सभी प्रतियोगी परीक्षाएं रविवार के दिन होती हैं, इस वजह से कभी-कभी ऐसा हुआ कि एक ही दिन दो परीक्षा पड़ गईं। इसके अलावा कभी अपने आलस्य और लापरवाही, तो कभी परीक्षास्थल बहुत दूर के शहर होने की वजह से कुछ परीक्षाएं नहीं दे पाया।

रिपोर्टर विकास - तेरह साल से ज़्यादा के करियर में अपनी सबसे बड़ी उपलब्धि क्या मानते हैं?
डफली - देखिए, सरकारी नौकरी में चयन होने या न होने के अलावा एक और उपलब्धि होती है जो सालों तक तैयारी करने वाला हर अभ्यर्थी बताता है, लेकिन यह बहुत कम के हिस्से आती है। ज़्यादातर लोग इस बारे में गप्प मारते हैं। वह उपलब्धि है, परीक्षा या साक्षात्कार में चयन होने से सिर्फ़ एक नंबर से रह जाना। मेरा सौभाग्य है कि आम लोगों का गप्प...ऐसा मेरे तैयारी के करियर में एक नहीं दो बार हुआ। पहला शुरुआती दौर में जब मैं 22-23 साल का था, तो बैंक मैनेजर की लिखित परीक्षा में कट ऑफ़ से 1 अंक कम आया। यह परिणाम देखकर सिर्फ़ मैं ही नहीं, मेरा परिवार और दोस्त भी आश्वस्त हुए कि कोई न कोई सरकारी नौकरी मेरे हिस्से ज़रूर आएगी। दूसरा तीन साल पहले बीमा क्लर्क की परीक्षा में ऐसा हुआ था।

रिपोर्टर विकास - ...और सबसे खराब प्रदर्शन कब रहा?
डफली - दो बार, एक बार हवा में दी गई परीक्षा में 150 में से 17 सवाल सही हुए थे और एक बार मुझसे ओएमआर शीट का क्रम गड़बड़ा गया था, तो 120 में से 9 अंक आए होंगे।

रिपोर्टर विकास - आपके प्रदर्शन पर और किन बातों का असर पड़ा?
डफली - जिओ मोबाइल क्रांति का मेरे जैसे करोड़ों युवाओं पर भारी असर पड़ा। सभी कंपनियों ने अपने डेटा और कॉल प्लान सस्ते कर दिए। बस उसके बाद तो गर्ल फ्रेंड से बात करने और दिन में 36 तरीके के ठुमके देखने में ही साल बीत गए। अब बेरोज़गारों को कोई दिनभर का काम मिलेगा, तो वो तो करेंगे ही न? पहले कहाँ सिर्फ़ फ़ोन पर बात करना ही खर्चीला शौक था। कुछ छोटी वजहें भी रहीं, लेकिन उनकी क्या बात करना....

रिपोर्टर विकास - अब बात छिड़ी ही है तो कर लीजिए।
डफली - छोटी मतलब एक परीक्षा पर असर डालने वाली। जैसे, कभी एग्ज़ाम के दिन तेज़ बारिश, बुखार होना या कभी तो खड़ूस परीक्षक द्वारा सू-सू जाने की अनुमति न देना। दो बार सू-सू रोकने के दबाव में आसान पेपर होते हुए भी अच्छे अंक नहीं आए। एक दफ़े तेज़ पहुंचने के चक्कर में टेबल का कोना पेट में लग गया बस पूरा पेपर अपने गुलगुले पेट तो थपथपाता रहा। वैसे 'सेक्सी लेडीज़ इन दी एग्ज़ाम सेंटर' को नक़ल कराने के चक्कर में भी कभी-कभी पेपर छूटे। हालांकि, बाद में न पेपर रहा, न ही वो लेडीज़।

रिपोर्टर विकास - इस दौरान आप कितने साक्षात्कारों वाले चरण तक पहुंचे?
डफली - हर लिखित परीक्षा के साथ साक्षात्कार नहीं होता, कई बार तो लिखित परीक्षा के साथ शैक्षिक डिग्रीयों के अंक जोड़े जाते हैं। फिर में मैंने करीब 2 दर्जन से ज़्यादा साक्षात्कार दिए। सरकारी नौकरी में सालों से सोए कुछ थकेले चेहरे देखने के अलावा इन इंटरव्यू में कुछ खास अनुभव नहीं रहा।

रिपोर्टर विकास - आपको नहीं लगता कि तैयारी करियर के शुरुआती दौर में 1 नंबर से रह जाने से जो लालच की लॉलीपॉप आपने चूसी वह कब की खत्म होने के बाद भी चूसी जाती रही।
डफली - निसंदेह! आपने कैसे जाना?


रिपोर्टर विकास - अरे, हम खुद भुक्तभोगी हैं। वैसे इस दौरान आपने कितने पैसों में आग लगाई?
डफली - जी, फ़ॉर्म भरने का पैसा, परीक्षा केंद्र जाना, कई बार दूसरे शहर ठहरना, कोचिंग, किताबें, नोट्स, प्रिंट आउट फलाने का कोई हिसाब नहीं। इस चक्कर में खैनी-सिगरेट की लत लगी सो अलग। दुनिया तो कहती है कि "टाइम इज़ मनी" और वह तो मैंने थोक के भाव उड़ाया है। फिर भी यह कहा जा सकता है कि मेरे पड़ोसी के पापा ने बारहवीं के बाद उसका ट्रैक्टर का शोरूम खुलवाया था, अगर मैं तैयारी न करता तो आज मेरे पापा के पास ऐसे तीन शोरूम खुलवाने के पैसे होते।

रिपोर्टर विकास - अब आपके पापा किस चीज़ का शोरूम खुलवाएंगे?
डफली - उनके अरमानों और सब्र का शोरूम में उड़ा चुका हूं, अब वे मन में गाली दिए बिना मेरा चेहरा देख लिया करें इतना ही काफ़ी है।

रिपोर्टर विकास - डफली जी, अब आप क्या करेंगे?
डफली - सिस्टम को गाली देंगे, कहीं कोई कुत्ते-गाय-सांड सोते हुए मिलेंगे, तो बिना बात का गुस्सा उन्हें लात मारके निकालेंगे। 8-10 हज़ार महीना वाली कोई एंट्री लेवल प्राइवेट नौकरी करेंगे और सोचेंगे कि यह नौकरी अगर 14 साल पहले शुरू कर देता, तो अभी 80 हज़ार कमा रहा होता और कितना जमा कर लिया होता फलाना ...

रिपोर्टर विकास - क्या कभी आपकी वापसी भी हो सकती है?
डफली - हो तो दुनिया में कुछ भी सकता है। अगर कोई आसान एग्ज़ाम हुआ जिसमें मेरी उम्र के लोग शामिल हो सकते हैं, तो देख लेंगे।

रिपोर्टर विकास - "हमारी टीम आपको सुखद रिटायरमेंट विश करती है, आशा है आप जीवन के अन्य क्षेत्रों में ऐसे ही कीर्तिमान बनाएं।"
डफली - "@#!$%&@"

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#ज़हन

Wednesday, January 27, 2021

दिल्ली बड़ी दूर है, किसान भाई! #ज़हन


वह भागने की कोशिश करे कबसे,
कभी ज़माने से तो कभी खुद से...
कोई उसे अकेला नहीं छोड़ता,
रोज़ वह मन को गिरवी रख...अपना तन तोड़ता।

उसे अपने हक़ पर बड़ा शक,
जिसे कुचलने को रचते 'बड़े' लोग कई नाटक!
दुनिया की धूल में उसका तन थका,
वह रोना कबका भूल चुका।

सीमा से बाहर वाली दुनिया से अनजान,
कब पक कर तैयार होगा रे तेरा धान?
उम्मीदों के सहारे सच्चाई से मत हट,
देखो तो...इंसानी शरीर का रोबोट भी करने लगा खट-पट!

अब तुझे भीड़ मिली या तू भीड़ को मिल गया,
देख तेरा एक चेहरा कितने चेहरों पर सिल गया।
यह आएगा...वह जाएगा,
तेरे खून से समाज सींचा गया है...आगे क्या बदल जाएगा?

तेरे ज़मीन के टुकड़े ने टेलीग्राम भेजा है,
इस साल अच्छी फसल का अंदेशा है।
देख जलते शहर में लगे पोस्टर कई,
खुश हो जा...इनमें तेरी पहचान कहीं घुल गई।
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Sunday, September 6, 2020

संजय राउत, आप स्वर्गीय बालासाहेब ठाकरे की विरासत पर पानी फेर रहे हैं!

 नमस्ते, संजय राउत जी! आप जिस पद पर हैं और जहाँ के लिए लोगों ने आपको चुना है उसको देखते हुए आप थोड़ा सोच कर बोला करें। कभी आप फेसबुक पर किसी कमेंट को लाइक करने वाली लड़कियों की गिरफ्तारी को जायज़ बता देते हैं, कभी एक समुदाय के वोट करने के हक़ को वापस लेने को कह देते हैं, कभी मृत अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत के पिता के.के. सिंह के बारे में ऐसी बात कह देते हैं जिसका मामले से कोई सरोकार ही नहीं है। अब आप एक अभिनेत्री को गाली दे रहे हैं। पूरे मीडिया को दलाल बता रहे हैं। आप भी तो आँखें मूँद कर एक तरफ खड़े हैं। खुद के लिए कोई विशेषण नहीं सोचा आपने?

 ये तो ऐसी बातें हैं जो राष्ट्रीय पटल पर चर्चित हो गई, इनके अलावा स्थानीय तो आपने न जाने कितना अनाप-शनाप बोला और किया होगा। कृपया, थोड़ी शर्म कर लें। बार-बार इतना उल्टा-सीधा बोलते हुए मैंने सिर्फ़ राखी सावंत और दीपक कलाल जैसे लोगों को देखा है। क्या आप खुद को उनकी श्रेणी में रखना चाहते हैं? ऊपर से अपने बचाव में हास्यास्पद तर्क दे रहे हैं और अहंकार से भरी बातें, ट्वीट, पोस्ट आदि कर रहे हैं। आपकी शह में श्री अनिल देशमुख जैसे कुछ नेता भी आपकी बोली बोल रहे हैं। शिवसेना के कार्यकर्ता कोरोना के समय भीड़ में कंगना के पुतले जला रहे हैं। इतना अहं, इतनी असहिष्णुता, और इतनी छोटी सोच कहाँ लेकर जाएंगे?

 रही बात महाराष्ट्र या मुंबई के अपमान की तो आपने तो पूरे नारी जगत का अपमान किया है। दुनिया की 380 करोड़ महिलाएं ज़्यादा हुई या 12.5 करोड़ महाराष्ट्र (या 2 करोड़ मुंबई)। अगर कंगना रनौत को एक बार माफ़ी मांगनी चाहिए, तो उस हिसाब से आपका तो दर्जनों बार माफ़ी माँगना बनता है। 

 मैं आपसे माफ़ी मांगने को नहीं कहूंगा यह आपका अपना निर्णय है, लेकिन सोचिये ज़रूर...यह क्षेत्रवाद का बाजा कब तक बजाते रहेंगे? इससे ऊपर उठिए, देशहित देखिए! समाज का भला, स्त्रियों के अधिकार एक बड़े नज़रिये से देखने की कोशिश करें। नहीं तो आपकी पार्टी भी क्षेत्र में सिमट कर रह जाएगी। बाकी ऐसा नहीं है कि आपने कुछ अच्छा नहीं किया या कहा पर इन बातों पर गौर करके आप अगर खुद में बदलाव करेंगे तो और बेहतर समाज सेवा कर पाएंगे।

धन्यवाद!
 #ज़हन

Monday, May 25, 2020

Color-blind Baalam (Book)


एकसाथ दो किताबें... "कलरब्लाइंड बालम" Kahaniya और FlyDreams Publications की साझा पेशकश।

पढ़ने के लिए क्लिक करें - https://www.kahaniya.com/s/colour-blind-balam-6eAP45
एप्लिकेशन डाउनलोड करने के लिए लिंक - https://play.google.com/store/apps/details?id=com.viven.android.kahaniyaofficial
#ज़हन

Monday, April 20, 2020

आप दोनों मेरे!


दो साल पहले (19 April 2018) को जीवन में एक बदलाव आया। कुछ आदतें बदली और कुछ आदतें बदलवाई। थोड़ी बातें और ढेर सारी यादें बनाई। एक रचनात्मक व्यक्ति की प्राथमिकताएं अलग होती हैं...उसे दुनिया में रहना भी है और दुनियादारी में पड़ने से भी परहेज़ है। ऐसे में डर होता है कि क्या शादी के बाद भी यह सोच बनी रहेगी या नहीं? पहले मेघा और अब प्रभव ने मिलकर मुझे जीवन के कई पाठ पढ़ाए। इन्होनें बताया कि प्राथमिकताएं कोई बाइनरी कोड नहीं जिन्हें या तो रखा जाए या छोड़ा जाए...इंसान नए नज़रिये और जीने के ढंग के साथ प्राथमिकताओं में कुछ बदलाव करके भी खुश रह सकता है। मेरे मोनोक्रोमेटिक जीवन को खूबसूरत पेंटिंग बनाने के लिए शुक्रिया मेघा और प्रभव! <3 font="">

आप दोनों के लिए 2 रचनाएं:

कुछ मैंने समझा...कुछ तुमने माना,
नई राह पर दामन थामा।
कुछ मैंने जोड़ा...कुछ तुमने संजोया,
मिलकर हमने 'घर' बनाया।
दोनों की जीत...दोनों की हार,
थोड़ी तकरार...ढेर सा प्यार।

मेरी नींद के लिए अपनी नींद बेचना,
दफ्तर से घर आने की राह देखना।
माथे की शिकन में दबी बातें पढ़ना,
करवटों के बीच में थपथपा कर देखना।

साथ में इतनी खुशियां लाई हो,
एक घर छोड़ कर...मेरा घर पूरा करने आई हो।
पगडंडियों से रास्ता सड़क पर मुड़ गया है...
सफर में एक नन्हा मुसाफिर और जुड़ गया है।

चाहो तो अब पूरी ज़िंदगी इन दो सालों की ही बातें दोहराती रहो...
लगता है यह सफर चलता रहे...कभी पूरा न हो!

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(हास्य) [ध्यान दें - ये दोनों ही मेन लीड हैं, क्योंकि मेरी प्रोफाइल है इसलिए खुद को नायक बना रहा हूँ।]

मैं उपन्यास हूँ...आप दोनों मेरे प्लाट ट्विस्ट और मेन लीड,
मैं छुटभैया नेता हूँ...आप दोनों मेरे जुटाए कैबिनेट मंत्री और भीड़।
मैं अन्ना हजारे हूँ...आप दोनों मेरे संघर्ष और अनशन,
मैं वीडियो गेम हूँ...आप दोनों मेरे प्लेयर और लास्ट स्टेज के ड्रैगन।

मैं एसयूवी हूँ...आप दोनों मेरे चेसिस और इंजन,
मैं सुबह की सांस हूँ...आप दोनों मेरे माउथवाश और मंजन।
मैं ट्रैक्टर हूँ...आप दोनों मेरे कल्टीवेटर और डाला,
मैं शक्तिमान हूँ...आप दोनों मेरे किलविश और कपाला!

मैं सब्जीवाला हूँ...आप दोनों मेरा ठेला और टोकरा, 
मैं धूम सीरीज़ हूँ...आप दोनों मेरे अभिषेक बच्चन और उदय चोपड़ा!
मैं हलवाई हूँ...आप दोनों मेरी दिवाली और मिठाई,
मैं तापसी पन्नू हूँ...आप दोनों मेरी पीआर एजेंसी और बीफिटिंग रिप्लाई!

मैं अजय देवगन हूँ...आप दोनों मेरे रोहित शेट्टी और काजोल,
मैं बीजेपी हूँ...आप दोनों मेरे आरएसएस और बजरंग दल।
मैं इंदिरा गांधी हूँ...आप दोनों मेरे भारत रत्न और इमरजेंसी,
मैं पाकिस्तान हूँ...आप दोनों मेरे टेररिज़्म और इंसरजेंसी।  

मैं फ़ुटबॉल हूँ...आप दोनों मेरे जूता और लात, [ओ भाई...मारो मुझे मारो]
मैं हालात हूँ...आप दोनों मेरी यादें और जज़्बात।
मैं बाबा रामदेव...आप दोनों मेरे योग और पतंजलि,
मैं धड़कन...आप दोनों मेरे देव और अंजली।

जीवन में नहीं रहा कोई अभाव,
मोहित को मिल गए मेघा और प्रभव।
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#ज़हन

Wednesday, February 5, 2020

तंज़ (सामाजिक कहानी) #ज़हन


घरेलू बिजली उपकरण बनाने वाली कंपनी के बिक्री विभाग में लगे नदीम का समय अक्सर सफर में बीतता था। ट्रेन में समय काटने के लिए वह अक्सर आस-पास यात्रियों से बातों में मशगूल हो जाता। कभी उनकी सुनते और कभी अपनी कहते वक़्त आसानी से कट जाता।  एक दिन नीचे चादर बिछा कर बैठे मज़दूर से उसकी जन्मपत्री मालूम करने के बाद नदीम ने अपना तीर छोड़ा।

"मौज तो तुम गरीब-लेबर क्लास और अमीरों की है। देश का सारा टैक्स तो मिडिल क्लास को देना पड़ता है। एक को सब्सिडी तो दूसरे को लूट माफ़ी।"

सहयात्रियों से "कौनसा स्टेशन आ गया?", "बिजनौर में बारिश हो रही है क्या?" और "हरिया जी दुकान की गजक मस्त होती हैं!" जैसी बातों के बीच हालिया बजट से कुढ़ा नदीम व्हाट्सएप पर मिडिल क्लास के आत्मसम्मान को बचाती पंक्तियां मज़दूर पर फ़ेंक रहा था। वह मज़दूर कभी नदीम की बात समझने की कोशिश करता तो कभी मुस्कुरा कर रह जाता।

ऊपर अपने फ़ोन में मग्न गुरदीप से रहा नहीं गया। 

"बड़े परेशान लग रहे हैं, भाई? अमीरों का पता नहीं पर देश के गरीब का जो हक है वह लेगा ही।"

नदीम को इतनी देर से बांधी गई भूमिका और अपनी बात कटती अच्छी नहीं लगी।

"अरे, लाल सलाम कामरेड! हा हा...मज़ाक कर रहा हूं। किस बात का हक? मुफ़्त की देन तो भीख हुई न?"

गुरदीप को ऐसे ही जवाब की उम्मीद थी।

"भाईसाहब! गरीब लोग तो जहां मिलें उनका शुक्रिया करो...ये गरीब-लेबर क्लास तो देश में सबसे ज़्यादा टैक्स देते हैं।"
यह अलग सा वाक्य सुनकर सब जैसे नींद से जागे और ऊपर से झांकते गुरदीप की ओर देखने लगे। इससे पहले कोई स्टेशन आ जाए या किसी का बच्चा चीख मार के ऐसा रोए कि 12-15 लोगों का ध्यान गुरदीप से हट जाए वह लगातार गरीबों के पक्ष में तर्क देने में लग गया।

"सबसे पहले तो गरीब कभी खाना-पीना और बाकी सामान एकसाथ नहीं लेते। 50 ग्राम तेल, 200 ग्राम आटा, कुछ ग्राम चावल और जीने के लिए ज़रूरी कई चीज़ें ये लोग अपनी रोज़ या हफ़्ते की कमाई के हिसाब से लेते हैं। अगर वही सामग्री ये लोग एकसाथ 5 किलो, डेढ़ किलो या ज़्यादा मात्रा में लें...जैसा हम मिडिल क्लास के लोग लेते हैं, तो इनकी 30 से 90 प्रतिशत तक बचत हो सकती है। ऐसा ये कर नहीं पाते क्योंकि एकसाथ कुछ भी उतना खरीदने के लिए इनके पास पैसे ही नहीं होते। सोचो इकॉनमी में ये करोड़ों लोग रोज़ कितना पैसा लगाते हैं। 
पिछली पे कमीशन में मेरे पड़ोसी शर्मा जी को लाखों का पुराना बकाया एरियर और महीने की सैलरी में सीधे 8200 रुपए का फायदा हुआ था...अब इतने साल बाद नया पे कमीशन लगने वाला है। शर्मा जी को फिर से लाखों रुपए मिलेंगे और वेतन भी बढ़ेगा पर इस बीच के गुज़रे इतने सालों में मजाल है जो उनकी कामवाली बाई के इतना रो-पीटने के बाद भी कुल ढाई सौ रुपए महीना से ज़्यादा बढ़े हों। 

आपका ये कहना की सरकारी अस्पताल "इनसे" भरे रहते हैं या सारी सुविधाओं, स्कीम पर ये लोग टूट कर पड़ते हैं भी गलत है। ये शहर की दूषित जगहों के पास बने घरों में रहते हैं...हर शहर की उस गंदगी का काफ़ी बड़ा स्रोत हम मिडिल क्लास लोग हैं। कम पैसों में शरीर ख़राब कर बीमारी देने वाले काम कर-कर के दुनियादारी का धुआं, धूल झेलकर तो इनका हक बनता है सरकारी सुविधाओं पर टूट पड़ना। मिडिल क्लास की यह कहानी है कि आपने 40-45 की उम्र तक ठीक बैंक बैलेंस, घर और गाड़ी जैसी चीज़ें जोड़ ली और अपने बच्चों के लिए उड़ने का प्लेटफॉर्म बना दिया, लेकिन इन्हें पता है कि इनमें से ज़्यादातर के बच्चे भी गरीबी का ऐसा ही दंश झेलेंगे। इस वजह से ये लाइन में लगकर ज़िंदगी से लड़ते हैं..."

नदीम कुछ कहने को हुआ तो वाइवा सा दे रहे गुरदीप की आवाज़ ने उसे दबा दिया।

"इस बेचारे को मेरी कोई बात समझ नहीं आई होगी पर ये वैसे ही मुस्कुरा रहा है जैसे आपके तानों पर मुस्कुरा रहा था। हम जीवन के वीडियो गेम की रोटी, कपड़ा और मकान वाली स्टेज से बहुत आगे निकल चुके हैं और इसका जीवन ही उनके पीछे भागना है। कार या तकियों पर बढ़े टैक्स की झुंझलाहट हर सांस में जीने का टैक्स देने वालों पर मत निकालो भाई।"

जिसका डर था वही हुआ...सामने महिला की गोद में खेल रहा बचा रो दिया और रेल की रफ़्तार में हिलते गुरदीप के विचारों की रेलगाड़ी का मोनोलॉग भी टूट गया। कुछ बातें कह दी, कई बातें रह गई! नदीम की सांस में सांस आई कि तभी गुरदीप ने कहा...

"एक बात और!"

सत्यानाश! नदीम की आँखें जैसे पूछ रही हों कि भाई नाली में लिटा-लिटा कर बुरी तरह पीट लिया अब...और भी कुछ बचा है?

"सही और गलत समझने के लिए और दूसरों के हक की बात करने के लिए लाल सलाम ब्रिगेड वाला होना ज़रूरी नहीं।"

नॉकआउट घूंसा पड़ चुका था और नदीम गृहशोभा पढ़ने की एक्टिंग करने लगा।

समाप्त!
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Friday, November 22, 2019

कुछ मीटर पर...ज़िंदगी! (कहानी)


आस-पास के माहौल का इंसान पर काफ़ी असर पड़ता है। उस माहौल का एक बड़ा हिस्सा दूसरे इंसान ही होते हैं। एक कहावत है कि आप उन पांच लोगों का मिश्रण बन जाते हैं जिनके साथ आप सबसे ज़्यादा समय बिताते हैं। जहाँ कई लोग दूसरों को सकारात्मक जीवन जीने की सीख दे जाते हैं वहीं कुछ जीवन के लिए अपना गुस्सा, नाराज़गी और अवसाद अपने आस-पास छिड़कते चलते हैं।

35 साल का कुंदन, रांची की एक बड़ी कार डीलरशिप में सेल्समैन था। अक्सर खुद में कुढ़ा सा रहने वाला जैसे ज़िंदगी से ज़िंदगी की चुगली करने में लगा हो। उसकी शिकायतों का पिटारा कभी ख़त्म ही नहीं होता था। इस वजह से उसके ज़्यादा दोस्त नहीं थे। गांव से दूर शहर में अकेले रहते हुए वह घोर अवसाद में पहुंच गया था। उसे लगता था कि दुनिया में कोई उसे समझता नहीं था। वैसे उसका यह सोचना गलत नहीं था...आखिर कम ही लोग लगातार एक जैसी नकारात्मकता झेल सकते हैं।
इस बीच उसके पड़ोस में निजी स्कूल की शिक्षिका तृप्ति आई। वह कुंदन की तरह ही औरों से कुछ अलग थी। धीरे-धीरे दोनों में बातें शुरू हुईं और दोनों एक-दूसरे को पसंद करने लगे। नहीं...नहीं यह प्यार वाला "पसंद" करना नहीं था। दोनों इस हद तक नकारात्मक होकर अवसाद में डूब चुके थे कि उनकी शिकायती बातें कोई और समझ रहा है और पसंद कर रहा है...बस यह बात ही दोनों को कुछ तस्सली देती थी। कहते हैं किसी का साथ इंसान को अवसाद की गर्त से निकालने के लिए काफी होता है पर ये दोनों तो साथ ही दलदल में डूब रहे थे। यह भी किस्मत की बात थी कि इस सयानी दुनिया की आदत पड़ने के बाद भी दोनों ने अपने मन के उन दबे राज़ों को खोला, जिनको लोग पागलपन का नाम देकर बात तक करना नहीं चाहते। कुछ हफ्ते बीतने के बाद कुंदन और तृप्ति को अपने बीच कुछ प्यार जैसा महसूस तो हुआ पर उसके ऊपर टूटे व्यक्तित्वों की इतनी परतें थी जिनके पार देख पाना असंभव था।
धीरे-धीरे बातों के विषय शिकायत, परेशानी से अलग होकर स्थायी हल पर आने लगे। दोनों आत्महत्या पर बातें करने लगे। यही तो इनके मन में था। हर झंझट से चुटकी में छुटकारा पाना। दोनों का प्यार बढ़ रहा था लेकिन दोनों को ही खुद पर भरोसा नहीं था...कहीं उनका बावरा मन इस नॉवल्टी से बोर होकर पुरानी रट न लगाने लगे। एक दिन दोनों आत्महत्या के तरीकों पर गहरा विमर्श करने लगे। तृप्ति ने कुंदन से अनुरोध किया कि प्यार में घुली इस दोस्ती के नाते दोनों को साथ  मरना चाहिए। 

कुंदन तृप्ति के बालों में हाथ फिराता हुआ बोला। - "मैं भी ऐसा ही चाहता हूँ! लेकिन मैं साधारण मौत नहीं चाहता।" 

तृप्ति ने दिलचस्पी भरी नज़रों से कहा - "मतलब? यह असाधारण मौत कैसी होती है भला?"

कुंदन - "मतलब, ज़िंदगी ढंग की न सही मौत तो ज़बरदस्त होनी चाहिए। ऐसे जैसे लोग मरते न हों...क्या कहती हो?"

तृप्ति - "वाह! ठीक है, चलो कुछ 'ज़बरदस्त' सोचते हैं। हा हा!"

मरने की बातें जो लोग गलती से करने पर भी भगवान से माफ़ी मांगते हैं। इधर कुंदन और तृप्ति कितनी आसानी से कर रहे थे।

घंटों बातें करने के बाद दोनों के अपनी मौत का अलग तरीका चुना। अगले दिन कुंदन डीलरशिप से बहाना बनाकर एक कार निकाल लाया। उसने अपनी गारंटी पर तृप्ति को कुछ देर टेस्ट ड्राइव के लिए दूसरी कार दी। योजना यह थी कि सुनसान तालाब के बगल वाली सड़क के एक छोर से तेज़ रफ़्तार कार में कुंदन आएगा और कुछ दूर से तृप्ति। दोनों इस गति से एक-दूसरे से टकराएंगे कि मौके पर मौत पक्की। अगर कोई घायल होकर कुछ देर के लिए बच भी जाए तो इस वीरान इलाके में किसी के आने तक उसका भी मरना तय था। दोनों फ़ोन पर जुड़े और साथ में अपनी-अपनी कार चालू कर तेज़ी से एक-दूसरे की तरफ बढ़े। डीलरशिप से निकली चमचमाती कारें अपनी किस्मत और कुंदन-तृप्ति को कोस रहो होंगी। 

"आई लव यू!"

"आई लव यू टू!"

क्या इस इज़हार में देर हो गई थी? क्या यही अंत था?

जब कारें दो-ढाई सौ मीटर की दूरी पर थी तो कुंदन और तृप्ति को बीच सड़क पर एक नवजात बच्ची पड़ी हुई दिखी। शायद इनकी तरह कोई और भी इस वीराने का फ़ायदा उठा रहा था...इस बच्ची को खुद मारने के बजाय प्रकृति से हत्या। कायर! 

इतनी रफ़्तार में फ़ोन पर कुछ बोलने का समय नहीं बचा था दोनों ने आँखों में बात की और टक्कर होने से कुछ मीटर पहले गाड़ियां मोड़ दी। जीवन का इतना समय केवल आत्महत्या और इस पल के बारे में सोचने वाले इतने करीब से कैसे चूक गए? शायद उस बच्ची में दोनों को जीने की वजह मिल गई थी। बच्ची को देखने के बाद के दो सेकंड और आँखों से हुई बात ने कुंदन और तृप्ति की जीवन भर की उलझन सुलझा दी थी। तृप्ति की कार तालाब में जा गिरी वहीं कुंदन पेड़ से टकराने से बाल-बाल बचा। घुमते दिमाग के साथ कुंदन ने उतरकर उस बच्ची को कार में रखा और तालाब में छलांग लगा दी। कुंदन किसी तरह तृप्ति के पास पहुंचा जो जीने के लिए डूबती कार की खिड़की को ज़ोर-ज़ोर से मार रही थी। कितना अजीब है न कि कुछ सेकंड पहले वह मरने को तड़प रही थी और अब जीने के लिए पागल हुई जा रही थी। इस बात को भांपकर दोनों इस स्थिति में भी मुस्कुराने लगे। कार का शीशा टूटा और कुंदन तृप्ति को तालाब से सुरक्षित निकाल लाया। मौत की आँखों में झांककर और जीवन की डोर पकड़कर दोनों खुशी से काँप रहे थे। बच्ची भी हल्की नींद में मुस्कुरा रही थी जैसे अपने नए माँ-बाप की बेवकूफियों पर हँस रही हो।

तृप्ति और कुंदन वापस उस जीवन, उन संघर्षों में एक नई उम्मीद के साथ वापस लौटे और अपने सकारात्मक नज़रिए से जीवन को बेहतर बनाने लगे। अब जब भी वे परेशान होते तो अपनी बेटी का चेहरा देखकर सब भूल जाते। ऐसा नहीं था कि उन्हें किसी जादू से ज़िंदगी में खुशियों की चाभी मिल गई थी, बस अब वे ज़िंदगी से बचते नहीं थे बल्कि उससे लड़ते थे।

उस दिन कुंदन और तृप्ति ने उस बच्ची को नहीं बचाया था...उस बच्ची ने बस वहाँ मौजूद होकर उन दोनों की जान बचाई थी।

समाप्त!
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Artwork - Louis L.
#ज़हन

Wednesday, June 19, 2019

जब क्रिकेट से मिलने बाकी खेल आए...(कविता) #ज़हन


एक दिन सब खेल क्रिकेट से मिलने आए,
मानो जैसे दशकों का गुस्सा समेट कर लाए।
क्रिकेट ने मुस्कुराकर सबको बिठाया,
भूखे खेलों को पाँच सितारा खाना खिलाया।

बड़ी दुविधा में खेल खुस-पुस कर बोले... 
हम अदनों से इतनी बड़ी हस्ती का मान कैसे डोले?
आँखों की शिकायत मुँह से कैसे बोलें?
कैसे डालें क्रिकेट पर इल्ज़ामों के घेरे?
अपनी मुखिया हॉकी और कुश्ती तो खड़ी हैं मुँह फेरे...
हिम्मत कर हाथ थामे टेनिस, तीरंदाज़ी आए,
घिग्घी बंध गई, बातें भूलें, कुछ भी याद न आए...

"क...क्रिकेट साहब, आपने हमपर बड़े ज़ुल्म ढाए!"

आज़ादी से अबतक देखो कितने ओलम्पिक बीते, 
इतनी आबादी के साथ भी हम देखो कितने पीछे!

माना समाज की उलझनों में देश के साधन रहे कम,
बचे-खुचे में बाकी खेल कुछ करते भी...तो आपने निकाला दम!

इनकी हिम्मत से टूटा सबकी झिझक का पहरा, 
चैस जैसे बुज़ुर्ग से लेकर नवजात सेपक-टाकरा ने क्रिकेट को घेरा...

जाने कौनसे नशे से तूने जनता टुन्न की बहला फुसला,
जाने कितनी प्रतिभाओं का करियर अपने पैरों तले कुचला...

कब्बडी - "वर्ल्ड कप जीत कर भी मेरी लड़कियां रिक्शे से ट्रॉफी घर ले जाएं...
सात मैच खेला क्रिकेटर जेट में वोडका से भुजिया खाये?"

फुटबॉल - "पूरी दुनिया में पैर हैं मेरे...यहां हौंसला पस्त,
तेरी चमक-दमक ने कर दिया मुझे पोलियोग्रस्त।"

बैडमिंटन - "हम जैसे खेलों से जुड़ा अक्सर कोई बच्चा रोता है,
गलती से पदक जीत ले तो लोग बोलें...ऐसा भी कोई खेल होता है?"

धीरे-धीरे सब खेलों का हल्ला बढ़ गया,
किसी की लात...किसी का मुक्का क्रिकेट पर बरस पड़ा।

गोल्फ, बेसबॉल, बिलियर्ड वगैरह ने क्रिकेट को लतिआया,
तभी झुकी कमर वाले एथलेटिक्स बाबा ने सबको दूर हटाया...

"अपनी असफलता पर कुढ़ रहे हो...
क्यों अकेले क्रिकेट पर सारा दोष मढ़ रहे हो?
रोटी को जूझते घरों में इसे भी तानों की मिलती रही है जेल,
आखिर हम सबकी तरह...है तो ये भी एक खेल!
वाह, किस्मत हमारी,
यहाँ एक उम्र के बाद खेलना माना जाए बीमारी।
ये ऐसे लोग हैं जो पैकेज की दौड़ में पड़े हैं...
हाँ, वही लोग जो प्लेस्कूल से बच्चों का एक्सेंट "सुधारने" में लगे हैं। 
ऐसों का एक ही रूटीन सुबह-शाम,
क्रिकेट के बहाने सही...कुछ तो लिया जाता है खेलों का नाम।

हाँ, भेड़चाल में इसके कई दीवाने,
पर एक दिन भेड़चाल के उस पार अपने करोड़ों कद्रदान भी मिल जाने!
जलो मत बराबरी की कोशिश करो,
क्रिकेट नहीं भारत की सोच को घेरो!

समाप्त!
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Wednesday, August 8, 2018

गृहणी को इज़्ज़त की भीख (कहानी) #ज़हन

Artist - Ningen Enpi

सरकारी बैंक में प्रबंधक कार्तिक आज कई हफ़्तों बाद अपने अंतरिक्ष विज्ञानी दोस्त सतबीर के घर आया हुआ था। सतबीर के घर रात के खाने के बाद बाहर फिल्म देखने का कार्यक्रम था। खाना तैयार होने में कुछ समय था तो दोनों गृहणियाँ पतियों को बैठक में छोड़ अपनी बातों में लग गयीं। इधर कुछ बातों बाद कार्तिक ने मनोरंजन बढ़ाने के लिए कहा - 

"कितनी बचकानी, बेवकूफ़ी भरी बातें करती रहती हैं ये लेडीज़ लोग।"

अपनी बात पर मनचाही सहमति नहीं मिलने और लंबी होती ख़ामोशी तोड़ने के लिए कार्तिक बोला - 
"...मेरा मतलब यहाँ हम दोनों अगर अंगोला के गृह युद्ध की बात कर रहे होंगे तो वहाँ दोनों चचिया ससुर की उनके पड़ोसी से लड़ाई पर बतिया रही होंगी, यहाँ हिमाचल में हुयी उल्का-वृष्टि पर बात होगी तो वहाँ बुआ जी के सिर में पड़े गुमड़े की, इधर भारत की विदेश नीति तो उधर चुन्नी और समीज का कलर कॉम्बिनेशन मिलाया जा रहा होगा। मतलब हद है!"

सतबीर ने कुछ सोच कर कहा - "हाँ, हद तो है..."

कार्तिक ने सहमति पाकर कुछ राहत की सांस ही थी कि..."

सतबीर - "हद है हमारे नज़रिये की! ग़लती से ही सही ठीक किया था सरकार ने जब जनगणना में गृहणियों का कॉलम भिखारियों के पास लगा दिया था। बेचारी अपना सब कुछ दे देती हैं और बदले में इज़्ज़त की चिल्लर तक नहीं मिलती। बराबर के मौके और परवरिश की बात छोड़ देता हूँ....यह बता ये लोग जैसी हैं वैसी ना होतीं तो क्या आज हम लोग ऐसे होते?"

कार्तिक - "भाई, मैं समझा नहीं?"

सतबीर - "मतलब ये लेडीज़ लोग भी विदेश नीति, आर्थिक मंदी, अंतरिक्ष विज्ञान फलाना में हम जैसी रूचि लेती तो क्या हम दोनों के घर उतने आराम से चल पाते जैसे अब चलते हैं? घर की कितनी टेंशन तो ये लोग हम तक आने ही नहीं देती और उसी वजह से हम अपने पेशों में इतना लग कर काम कर पाते हैं और बाहर की सोच पाते हैं। जहाँ हम प्रमोशन, वेतन, अवार्ड आदि में उपलब्धि ढूँढ़ते हैं....ये तो बस पति और परिवार में ही अपने सपने घोल देती हैं। अगर ये लोग अपने सपने हमसे अलग कर लें तो बहुत संभव है कि ये तो बेहतर मकाम पा लें पर हमारी ऐसी तैसी हो जाये। इस तरह आराम से बैठ कर दुनियादारी की बात करना मुश्किल हो जायेगा, ईगो की लंका लगेगी सो अलग! हा हा...ये तो हम जैसे करोड़ों का लाइफ सपोर्ट सिस्टम हैं जिनके बिना हमारा जीवन कोमा में चला जाये। तो गृहणियाँ ऐसी ही सम्पूर्ण और बहुत अच्छी हैं! इनसे बैटमैन बनने की उम्मीद मत लगा वो तू खुद भी नहीं हो सकता। इन्हें भीख सी इज़्ज़त मिले तो लानत है हमपर!"

कार्तिक - "हाँ, हाँ...सतबीर के बच्चे सांस ले ले, मैं समझ गया। आज तो गूगली फेंक दी मेरे भाई ने...."

सतबीर - "रुक अभी ख़त्म नहीं हुआ लेक्चर! एक बात और बता ज़रा...इतनी दुनिया भर की बातें करता है मुझसे, यहाँ तक की ब्रह्माण्ड तक नहीं छोड़ता। अपने प्रोफेशन के बाहर कितनी तोपें उखाड़ी हैं तूने? शर्ट प्रेस करनी आती नहीं है और अंगोला के गृहयुद्ध रुकवा लो इस से..."

हँसते हुए कार्तिक को आज अपने जीवन का सबसे महत्वपूर्ण लेक्चर मिला था। 

समाप्त!
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#ज़हन #mohit_trendster #freelance_talents #mohitness

Wednesday, April 11, 2018

उल्लास की आवाज़ (कहानी) #ज़हन

Artwork - Igor Vitkovskiy

जीव विज्ञानी डॉक्टर कोटल और उनके नेतृत्व में कुछ अनुसंधानकर्ताओं का दल प्रशांत महासागर स्थित एक दुर्गम द्वीपसमूह पर कई महीनों से टिका हुआ था। उनका उद्देश्य वहाँ रहने वाले कबीलों में बेहतर जीवन के लिए जागरूकता फैलाना था। स्थानीय धर्म सूमा के रीती-रिवाज़ों में हज़ारों कबीलेवासी अपनी सेहत और जान-माल से खिलवाड़ करते रहते थे। इतने कठिन और अजीब नियमों वाले सूमा धर्म में जागरूकता या बदलाव के लिए कोई स्थान नहीं था। अलग-अलग तरीकों से कबीले वालों को समझाना नाकाम हो रहा था। वीडियो व ऑडियो संदेश, कबीलों के पास खाद्य सामग्री या दवाई गिराना, रिमोट संचालित रोबॉट से संदेश आदि काम जंगलियों को जागरूक करने के बजाय भ्रमित कर रहे थे।

जब हर प्रयास निरर्थक लगने लगा तो डॉक्टर कोटल ने स्वयं जंगलियों के बीच जाकर उन्हें समझाने का फैसला किया। इस जोखिम भरे विचार पर दल के बाकी सदस्य पीछे हट गये। किसी तरह डॉक्टर केवल अनुवादक को अपने साथ रहने के लिए समझा पाये। बिना सुरक्षा के जंगली सीमा में घुसते ही दोनों को बंदी बना लिया गया। कुछ कबीलों की संयुक्त सभा में डॉक्टर और अनुवादक को एक खंबे से बाँध कर उनकी मंशा और पिछले कामों के बारे में पूछा गया। 

डॉक्टर ने अपनी तरफ से भरसक कोशिश की, और अपनी बात इस तरह ख़त्म की - "....हम आपके दुश्मन नहीं हैं। बाहर की उन्नत दुनिया में यहाँ फैले कई रोगों के इलाज और परेशानियों के हल हैं। एक बार हमें मौका देकर देखिए।"

अपनी जान के लिए कांपते और डॉक्टर को कोसते अनुवादक ने तेज़ी से कोटल की बात को जंगलियों की भाषा में दोहराया। 


जवाब में कबीलों के वरिष्ठ सदस्य ज़ोर-ज़ोर से हँसने लगे। उन्होंने अनुवादक को बताया की सूमा धर्म सबसे उन्नत है और बाकी बातें व्यर्थ हैं। डॉक्टर कोटल को सूमा के ईश्वर ने उन सबकी परीक्षा लेने के लिए भेजा है।

अचानक अंतरिक्ष से गिरा एक विशालकाय पत्थर डॉक्टर कोटल और उनके अनुवादक पर बरसा और दोनों की मौके पर ही मृत्यु हो गयी। कोई बड़ी उल्का पृथ्वी का वायुमंडल पार करते हुए बड़े टुकड़ो में उस द्वीपसमूह पर बरसी थी। 

इस घटना में कोई जंगली नहीं मरा। उन सबका विश्वास पक्का हुआ कि उनके धर्म से ना डिगने के कारण वो ज़िंदा रहे जबकि बाहरी अधर्मी लोग मारे गये। सभी उल्लास में "हुह-हुह-हुह..." की आवाज़ निकालकर नृत्य करने लगे। 

जंगली नहीं देख पाये कि उल्का के कई टुकड़े सुप्त ज्वालामुखी में ऐसे कोण पर लगे की वह जाग्रत होकर फट गया। गर्म लावे का फव्वारा द्वीपसमूह पर आग की बारिश करने लगा। कुछ देर पहले तक सूमा धर्म के गुणगान गाते जंगली जान बचाकर भागने लगे। अधिकांश गर्म बरसात में मारे गये और जो ओट में बच गये उनकी तरफ आग की नदी तेज़ी से बढ़ रही थी। फिर भी अगर कोई बच गया तो उल्कापिंडो से समुद्र में उठी सुनामी कुछ मिनटों में दस्तक देने वाली थी। ज़मीनी सतह से काफी ढका होने के कारण दबाव में ज्वालामुखी भी उल्लास में "हुह-हुह-हुह..." की आवाज़ निकाल रहा था...शायद मन ही मन सूमा के ईश्वर का गुणगान और नृत्य भी कर रहा हो।

समाप्त!
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Thursday, April 5, 2018

रोग में मिला जोग...स्वर्ग में बनी शादी (कहानी) #ज़हन

Artwork - Vinj Gagui

मानसिक रोग विशेषज्ञ डॉक्टर जैना गर्भावस्था में ली कुछ महीनों की छुट्टी के बाद हॉस्पिटल काम पर लौटी थीं। रोज़ के काम के बीच कुछ कागज़ों ने जैना का ध्यान खींचा। शाम तक उन कागज़ों की बात जैना के मन में गोते लगा रही थी। आखिरकार उसने विभाग की नर्स से अपनी शंका का समाधान करना उचित समझा। 

"ये रिटायर्ड मेजर उत्कर्ष और मिस कोमल कैसे गायब हो गये? दोनों की मानसिक हालत दयनीय थी। मुझे तो लगा था...अभी कम से कम मेरे प्रसव के कई महीनों बाद तक इनका इलाज चलेगा।"

नर्स को ज़्यादा जानकारी नहीं थी, उसने इतना ही बताया - "डॉक्टर, उन दोनों ने शादी कर ली। उसके कुछ समय बाद दोनों का ट्रीटमेंट बंद हो गया।"

जवाब में जैना विस्मित सी केवल "क्या!" बोल पायी। 

अब तो इन दोनों में उसकी जिज्ञासा और बढ़ गयी थी। अन्य डॉक्टर एवम कर्मचारियों से संतोषजनक जानकारी ना मिल पाने की वजह से पूरी बात जानने के लिए जैना ने उनके घर जाने का फैसला किया। कोमल सालों तक घरेलु हिंसा की शिकार तलाकशुदा औरत थी और उत्कर्ष पड़ोसी देश से युद्ध की विभीषिका झेल चुका पूर्व-सैनिक था। इतने मानसिक और शारीरिक शोषण के बाद कोमल टूटकर गंभीर अवसाद में रहा करती थी। वहीं उत्कर्ष जंग में खून की नदियों में नहाकर पी.टी.एस.डी. (पोस्ट ट्रॉमेटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर) से पीड़ित होकर अवसाद, घुटन से जूझ रहा था। दोनों के उपचार में जैना ने न जाने कितने जतन किये थे पर उसे अधिक सफलता नहीं मिल पायी थी। अब ऐसा क्या हो गया जो इतने कम वक़्त में ना सिर्फ दोनों ठीक हो गये बल्कि दो से एक हो गये। जैना नवदंपत्ति के घर पहुँची। दोनों ने अपने दुख की घड़ियों के एक पुराने साथी का स्वागत किया। औचारिकताओं के बाद जैना मुद्दे पर आयी। 

"...तो जो काम इतने टाइम मैं और मेरी टीम नहीं कर सकी वो प्यार ने कर दिया? जबसे आप दोनों के बारे में सुना है तबसे ये सवाल परेशान कर रहा है।"

कोमल चहक कर बोली - "हाँ डॉक्टर, प्यार ने भी और नफरत ने भी।"

जैना की उलझन और बढ़ गयी - "नफरत? मैं समझी नहीं। हॉस्पिटल में मानसिक रोगियों को ऐसे नकारात्मक शब्द तो हम लोग बोलने भी नहीं देते थे। तो फिर  इस से इलाज कैसे हो गया?"

उत्कर्ष ने मुस्कान देते हुए समझाया - "डरिये मत, हम दोनों ने आपकी कही हर बात पर अमल किया है। कहते हैं किसी एक बात के लिए प्यार होना...दो लोगो को करीब ला सकता है। जैसे घूमने के शौक में, कला के शौक में या किसी एक विषय के पागलपन में पड़े दो लोग कब एक दूसरे की तरफ आकर्षित हो जाएं पता भी नहीं चलता। हम लोग हॉस्पिटल में मिले और एक चीज़ के लिए दोनों की नफरत हमें पास ले आयी।"

जैना की जिज्ञासा के शांत होते ज्वालामुखी में से आख़री भभका निकला - "कौनसी चीज़?"

उत्कर्ष - "हिंसा!....हिंसा के प्रति हम दोनों का गुस्सा, उस से जन्मी घुटन से दोनों की दुश्मनी में कब हम एक-दूजे का दर्द समझने लगे...और मरहम लगाने लगे पता ही नहीं चला। कुछ ही हफ़्तों में जैसे पूरी ज़िन्दगी का लदा बोझ उतर गया और हम सामान्य जीवन जीने लगे। डॉक्टर, कभी-कभी दो दर्द एक-दूसरे का ध्यान बँटाकर ख़त्म हो जाते हैं। 

समाप्त!
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Sunday, December 10, 2017

Educational-Horror Comic: Samaj Levak (Freelance Talents)

New experimental genre mix, समाज लेवक (Samaj Levak) - Social Leech (Educational-Horror Comic)
Illustrators: Anand Singh, Prakash Bhalavi (Bhagwant Bhalla), Author: Mohit Trendster, Colorist: Harendra Saini, Letterer: Youdhveer Singh
Also Available: Google Play, Google Books, Readwhere, Magzter, Dailyhunt, Ebook360 and other leading websites, mobile apps.
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#horror #comics #art #educational #india #mohitness #anandsingh #mohit_trendster #freelancetalents #harendrasaini #trendybaba #youdhveersingh #ज़हन #आनंदसिंह #मोहित #prakashbhalavi #freelance_talents #indiancomics

Sunday, December 3, 2017

सड़ता हुआ मांस क्या कहेगा? (वीभत्स रस) #nazm #tribute


Revolutionary and Hindi writer Yashpal's 114th birth anniversary, The Government of India issued a commemorative Yashpal Centenary postage stamp (2003).
आज क्रांतिदूत, लेखक यशपाल जी का जन्मदिवस है। इस अवसर पर देशभर में कार्यक्रम आयोजित होते हैं। वैसे तो यशपाल जी हमें 41 वर्ष पहले छोड़ कर जा चुके हैं पर उनका लेखन अबतक देश का मार्गदर्शन करता रहा है और आगे जाने कितनी ही पीढ़ियों की उंगली पकड़कर उन्हें चलना सिखाता रहेगा। उनकी स्मृतियों को याद करते हुए उनके सुपुत्र आनंद जी बताते हैं कि वो लेखन को एक नौकरी की तरह नियम और समय से करते थे। अनेक शैलियों में लिखते हुए अगर उन्हें ऐसी बातों पर लिखना पड़ता जिनसे लोगो को घिन आती है या जिनपर बात करने से लोग बचते हैं तो वे निडरता से लिखते। वहीं आजकल अधिकतर लेखक, कवि खुद पर किसी लेबल लगने के डर से आम जनता के स्वादानुसार लिखने की कोशिश करते हैं। यशपाल जी काव्य नहीं लिखते थे पर हर कला की तरह पद्य में रूचि लेते थे। अपने रचे पागलपन की दौड़ में परेशान समाज की कुत्सित मानसिकता "अच्छा-अच्छा मेरा, छी-छी बाकी दुनिया का" पर चोट करती 'वीभत्स रस' में लिखी नज़्म-काव्य। यशपाल जी को मेरी नज़्म-काव्यांजलि। यह नज़्म आगामी कॉमिक 'समाज लेवक' में शामिल की है (आशा है मैं उनकी तरह निडरता से लिखना सीख सकूँ) नमन! -
सड़ता हुआ मांस क्या कहेगा?
सड़ता हुआ मांस क्या कहेगा? 
बिजबिजाते कीड़ों को सहेगा,
कभी अपनी बुलंद तारीख़ों पर हँसेगा,
कभी खुद को खा रही ज़मीं पर ताने कसेगा।

जब सब मुझे छोड़ गये,
साथ सिर्फ कीड़े रह गये,
सड़ती शख्सियत को पचाते,
मेरी मौत में अपनी ज़िन्दगी घोल गये।

आज जिनसे मुँह चुराते हो,
कल वो तुम्हारा मुखौटा खायेंगे,
इस अकड़ का क्या मोल रहेगा?
सड़ता हुआ मांस क्या कहेगा?

लोथड़ों से बात करना सीख लो,
बंद कमरों में दिल की तसल्ली तक चीख लो!
सड़ता हुआ मांस सुन लेगा, 
अगली दफ़ा तुम्हे चुन लेगा।

जिसे दिखाने का वायदा किया था हमसे,
वो गाँव तो हमारी लाश पर भी ना बसेगा।
खाल की परत फाड़ जब विषधर डसेगा,
सड़ता हुआ मांस क्या कहेगा?

जिसपर फिसले वो किसी का रक्त,
नाली में पैदा ही क्यों होते हैं ये कम्बख्त?
बाकी तो सब राम नाम सत!
उसपर मत रो... 
सुर्ख़ से काला पड़ गया जो,
ये जहां तो ऐसा ही रहेगा,
सड़ता हुआ मांस कुछ नहीं कहेगा!
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Thursday, September 28, 2017

समाज को तोड़ती समूह वाली मानसिकता (लेख) #ज़हन


प्राकृतिक और सामाजिक कारणों से हम सभी की पहचान कुछ समूहों से जुड़ जाती है। उदाहरण के लिए एक इंसान की पहचान कुछ यूँ - महिला, भारतीय, अच्छा कद, गेहुँआ रंग, शहरी (दिल्ली निवासी), प्रौढ़, सॉफ्टवेयर क्षेत्र में काम करने वाली, हिन्दू (दलित), मध्यमवर्गीय परिवार आदि। अब पूरा जीवन इन समूहों और उनसे निकले उप-समूहों को जीते हुए उस महिला के मन में इन सबके बारे में काफी अधिक जानकारी आ जाती है जबकि बाकी दुनिया के अनगिनत दूसरे समूहों के बारे में उसे ऊपरी या कम जानकारी होती है। ऐसी ऊपरी जानकारी पर उसके साथ समूह साझा कर रहे लोग नमक-मिर्च लगा कर ऐसा माहौल बनाते हैं कि अधिकांश लोग धीरे-धीरे मानने लगते हैं कि वो जिन समूहों से हैं, दुनिया की सबसे ज़्यादा चुनौतियाँ सिर्फ उन्हें ही देखनी पड़ती हैं और उनका समूह सर्वश्रेष्ठ है। दुनिया की हर खबर, बात, मुद्दे पर वो अपने समूहों के हिसाब से विचार बनाते हैं। 

जहाँ वो महिला कई पुरुषों द्वारा गोरे वर्ण की स्त्रियों को वरीयता देने की समस्या को समझेगी, वहीं खुद छोटे कद के या पतले पुरुषों का सहेलियों में मज़ाक उड़ाने या उन्हें वरीयता ना दिए जाने की गलत बात पर दोबारा सोचेगी भी नहीं। जहाँ उसे सॉफ्टवेयर दुनिया का सबसे कठिन क्षेत्र लगेगा, वहीं अपने पिता द्वारा दिवाली पर डाकिये को दिए इनाम पर वह सवाल करेगी कि साल में 2-4 बार तो आता है (पर उसे यह नहीं पता या शायद वह जानना नहीं चाहती कि इस डाकिया के ज़िम्मे डेढ़ हज़ार हज़ार घर और सौ दफ्तर हैं)। कभी सवाल करने पर वह रक्षात्मक होकर अपने समूह पर अनगिनत रटी हुई दलीलें सुना देगी...बिना यह समझे की संघर्ष तो सबके जीवन में है; कई बार उसके नज़रिये से 'गिफ़्टेड' या 'कम मेहनत' वाले समूहों से जुड़े लोगो में उसके समूहों से अधिक। यह मानसिकता लेकर व्यक्ति जीवनभर कुढ़ता रहता है। मन ही मन ऐसे अनेक लोगो से दूर हो जाता है जिनसे उसका अच्छा नाता बन सकता था और दोनों एक दूसरे के बहुत काम आ सकते थे। एक संभावना यह बनती है कि आपको अपना मित्र पसंद है बस उसकी कुछ बातें नहीं पसंद क्योंकि वो 'कुछ बातें' उसके अंदर दूसरे समूहों से आई हैं, जिनमे आप नहीं हो।  

इस सामाजिक अनुकूलन (सोशल कंडीशनिंग) के जाल से बाहर आकर ही समाज में निष्पक्ष, सकारात्मक योगदान देना संभव है। यहाँ ये मतलब नहीं कि अपने समूह के अधिकारों, बातों पर आवाज़ ना उठायी जाए; पर ऐसा करते हुए बिना जांचे गलत बातों-अफवाहों को बढ़ावा देना, अन्य आवाज़ों को अनसुना करना, उनको अपनी बड़ी कालजयी पहल के आगे छोटा मानना या भ्रान्ति में जीना गलत है। समूहों की तुलना में भावनाओं के बजाय तर्कों और इतिहास की घटनाओं से बने वर्तमान समीकरण के अनुसार बात करना बेहतर है।  
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