Freelance Falcon ~ Weird Jhola-Chhap thing ~ ज़हन

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Friday, January 3, 2020

भूत बाधा हवन बनाम एक्सोरसिस्म (कहानी)


पुणे से कुछ दूर एक वीरान सी बस्ती में लगभग आधा दर्जन परिवार रहते थे। वहां दो पड़ोस के पुराने घरों में कई सालों से दो भूत रहते थे। एक का नाम था विनायक और दूसरी थी क्रिस्टीन। दोनों बड़े ही शांत किस्म के थे पर उनका थोड़ा-बहुत विचरण या कुछ हरकतें (जिनसे किसी को नुक्सान नहीं होता था) उन घरों में बाद में किराए पर रहने वाले लोगों को डरा दिया करती थी। हालांकि, थोड़े समय बाद इन घरों में रह रहे परिवारों को इनकी आदत पड़ जाती। इस तरह कुछ दशक बीते। जहां विनायक, भगवान गणेश का परम भक्त था वहीं क्रिस्टीन कट्टर कैथोलिक ईसाई। 

मरने से पहले दोनों जितना एक दूसरे से बचते थे, मरने के बाद न चाहते हुए भी बातें करते-करते अच्छे दोस्त बन गए थे। ऐसा नहीं था कि मरने से पहले विनायक और क्रिस्टीन में कोई बात नहीं होती थी। दोनों के जीवनसाथी बहुत पहले दुनिया छोड़ चुके थे। बस्ती में पेड़ लगाना, बिजली की लाइन पाने के लिए धरना देना, बंजर ज़मीन पर सब बस्ती वालों की साझा खेती जैसे कामों में दोनों सबसे ज़्यादा बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेते थे... इस वजह से दोनों मन ही मन एक दूसरे की इज़्ज़त भी करते थे पर जहाँ धर्म, त्यौहार आदि की बात आती थी तो विनायक और क्रिस्टीन उत्तर और दक्षिण ध्रुव बन जाते थे। अपने धर्म के प्रति इनका विश्वास इतना दृढ़ था कि मरने के बाद भी ये एक-दूसरे को अपना धर्म अपनाने के तर्क दिया करते थे।

किस्मत से विनायक के घर में एक ईसाई परिवार किराए पर आया और थोड़े समय बाद क्रिस्टीन के घर में एक गणेश भक्त परिवार। विनायक और क्रिस्टीन बड़ी उत्सुकता से उन परिवारों की दिनचर्या देखते और फिर एक दूसरे को बताते कि कैसे आजकल के तरीके और बच्चे पहले से अलग हो गए हैं, कैसे पुराना धीमापन नई तेज़ी से बेहतर था और कैसे किराए पर आये परिवार के सदस्य बहुत अच्छे हैं। अगर कभी-कभार उन्हें कुछ गलत या दूसरे के धर्म का उल्लंघन दिखता तो वे जानबूझ कर दूसरे को नहीं बताते। न चाहते हुए भी कुछ हरकतों, हल्की खटपट और दूसरी आवाज़ों की वजह से दोनों परिवारों का शक बढ़ने लगा कि इन घरों में भूतों का साया है। हिन्दू परिवार ने अपने घर का भूत (क्रिस्टीन) भगाने के लिए हवन रखा और उसी दिन ईसाई परिवार ने अपने घर से भूत (विनायक) निकालने के लिए बड़े पादरी से एक्सोरसिस्म की योजना बनाई। दोनों परिवार साबित करना चाहते थे कि भूत भगाने के लिए उनके धर्म का तरीका दूसरे धर्म से बेहतर और कारगर है।

विनायक, स्वभाव के अच्छे ईसाई परिवार को नुक्सान नहीं पहुंचाना चाहता था। साथ ही, क्रिस्टीन आहत न हो इसलिए विनायक एक्सोरसिस्म से पहले की शाम घर छोड़कर जंगलों की तरफ उड़ गया। धर्म की छोटी बहस में इतने सालों की दोस्ती इस तरह ख़त्म कर देना उसे गवारा नहीं था। उसने सोचा कि अगर हिन्दू धर्म बेहतर होगा तो उसे खुद से कोई जतन करना ही नहीं पड़ेगा। उसके भूतिया मन में चल रहा था कि क्रिस्टीन क्या सोच रही होगी। पता नहीं वह उसका अचानक गायब होना समझ पाई होगी या नहीं। 

जंगल आकर उसका सिर चकरा गया। शांति और लोगों से दूर जंगल के हर पेड़ पर भूतों ने डेरा जमा रखा था। कोई भी नए भूत-प्रेतों के लिए अपनी जगह छोड़ने को तैयार नहीं था।

"हे गणपति बप्पा! ऐसा तो नहीं सोचा था...आत्मा बनने के बाद भी घर के लिए भटकना पड़ेगा।"

कुछ देर भटकने के बाद, विनायक उस जान-पहचानी आवाज़ पर मुड़ा...

"किराए पर रहने के लिए जगह चाहिए...यह पेड़ छोटा है पर दो भूत एडजस्ट कर लेगा।"

विनायक ख़ुशी से फूल कर कुप्पा होके बोला - "क्रिस्टीन! तुम तो..."

क्रिस्टीन मुस्कुराकर बोली - "हाँ! गणपति बप्पा से पिटाई थोड़े ही खानी थी।"

उधर बस्ती में ज़ोर-शोर से बिना भूत वाले एक्सोरसिस्म और हवन चल रहे थे।

समाप्त!
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#ज़हन

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Saturday, December 23, 2017

जासूस सास (हास्य कहानी)


लक्ष्मी कुमारी स्वेटर बुनने से तेज़ गति से अपनी बहु पर विचार बुन रही थीं।  वैसे उनकी बहु शताक्षी ठीक थी....बल्कि जैसी कुलक्षणी, कलमुँही बहुएं टीवी और अख़बारों में दिखती हैं उनके सामने तो शताक्षी ठीक होने की पराकाष्ठा ही समझो। फिर भी लक्ष्मी को एक बात परेशान करती थी। केवल उन्हें ही नहीं, कॉलोनी की कुछ और सास भी इस मुद्दे पर चिंतित थीं। कई घरों की 25 से लेकर 40 साल की महिलाएं आपस में अक्सर झुंड में घंटों पता नहीं क्या बतियाती रहती थीं। बाहर से लगता कि मानो चुगलियों की कितने पहाड़ चढ़ रही हैं। बड़ा और सभी कोण से ढका घर होने के कारण अक्सर दर्जन भर स्त्रियां शताक्षी के घर पर डेरा जमाती। 

मोहल्ले की सासों से जब रहा नहीं गया और उनकी मिसमिसी का रौला-रप्पा हो गया तो सबने पैसे मिलाकर अच्छी क्वालिटी के माइक्रोफोन और कैमरे लक्ष्मी कुमारी के आँगन में लगवाये, जहाँ बहुओं की चुगलियों का गोरख धंधा चलता था। दो दिन बाद वीकेंड को बहुओं की मैराथन बैठक हुई। अगले दिन सत्संग का बहाना बनाकर वृद्ध जेम्स बांडनियाँ गुप्त अड्डे पर मिलीं। कॉलोनी की सासें अपनी साँसें थाम कर बहुओं की मीटिंग की फुटेज देखना शुरू करती हैं। 

"दीदी, कल छुटकी की वजह से छोटा भीम हार गया। मैं तो दूध उबलने रखने जा रही थी कि मीनू ने बताया कि कालिया को जीत कर टाइटल मिल गया। इतनी झुंझलाहट हुई कि मैं कच्चा दूध ही पी गयी और मीनू की अभ्यास पुस्तिका फाड़ी सो अलग..." 

"हाँ! इस वजह से कल पूरा दिन मेरा भी मूड ऑफ रहा। ऑफिस से लौटे पीकू के पापा पुच्ची करने को बढे तो ऐसी कोहनी मारी मैंने...नील पड़ गया उनके होंठों पर। हुँह! भला कालिया को जिताना कोई बात हुई?"

छोटा भीम पर गंभीर चर्चा के बीच शिवा कार्टून सीरीज की फैन शताक्षी बोली। 

"...पेड़ाराम ने अपनी पड़ोसन के चक्कर में शिवा का फूफा जो किडनैप करवाया उस से मेरा दिल बैठ गया सच्ची। अरे! आपने सुना...शक्तिमान को दोबारा शुरू कर रहे हैं।"

उसके बाद मोटू पतलू, माइटी राजू, गली गली सिम सिम, डोरेमॉन, शिनचैन पर शिद्दत से चर्चा हुई। इतना ही नहीं बीच-बीच में महिलाओं ने कार्टून सीरियल्स के मंगल गीत...टाइटल सांग भी गुनगुनाये। गृहणियों को जब फुर्सत मिलती थी तब टीवी के सामने बच्चे होते, जो कोई और चैनल चलने ही नहीं देते थे। कोई विकल्प ना होने के कारण थोड़े समय बाद कार्टून्स, एनिमेशन में बच्चों की तरह महिलाओं को भी मौज आने लगी और देखते ही देखते यह कार्टून क्रान्ति महिला मोर्चा बन गया। 

बहुओं की बुराई और गप्पों के लिए ब्रेड रोल, पकोड़े तल कर लायी एक सास निराशा में बोली। 

"भक..."

ये केवल एक 'भक' नहीं बल्कि 'खोदा पहाड़ निकली चुहिया' वाली हार की स्वीकृति थी। गुप्त फुटेज देख रही सास मंडली के सारे अंदेशों का मुरब्बा बन चुका था। धूलधूसरित पहलवान की तरह सब अपने कार्टूनी सत्संग से घर लौट आयीं। 

समाप्त! भक!
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Art - Sebastien K.
#ज़हन