Freelance Falcon ~ Weird Jhola-Chhap thing ~ ज़हन

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Wednesday, April 21, 2021

ज़रूरी था...

पिछले हफ़्ते मैं और मेरे माता-पिता कोरोना पॉजिटिव हो गए। इस समय मैं अपने पैतृक घर पर उनके साथ हूँ। मेरी पत्नी और पुत्र दूसरे घर में सुरक्षित हैं। 19 अप्रैल को हमारी शादी की तीसरी सालगिरह थी, लेकिन इस स्थिति में उनसे मिलना संभव नहीं था। इस आपदा की घड़ी में, लोगों के इतने बड़े दुखों के बीच यह बात बांटना भी छोटा लग रहा है। बस यह ठीक है कि मेरा बाकी परिवार सुरक्षित है और मैं इस समय माता-पिता के साथ हूँ। मेघा को दिए कुछ उपहारों में हमारे फ़ोटो पर कलाकार Ajay Thapa की बनाई यह पेंटिंग सबसे ख़ास है...

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आगे कभी...पीछे मुड़कर इस साल को देखेंगे,

तुम इससे पूछ लेना..."क्या यह साल ज़रूरी था?"

मैं भी डांट दूंगा..."क्या यह हाल ज़रूरी था?"

ज़िन्दगी के किसी शांत दौर में...फिर इस साल से बात करेंगे।

तब जब तुम मुस्कुरा रही होगी,

बैंक में पड़ी मोटी बचत का हिसाब लगा रही होगी,

बुढ़ापे की दवाई खा रही होगी।

तब जब मैं कहीं फ़ोन नंबर की जगह पिन कोड लिख रहा होऊंगा,

तुम मुझे किसी महीन बात का अंतर समझा रही होगी।

मैं छिप कर मीठा खा रहा होऊंगा,

तुम प्रभव से मेरी शिकायत लगा रही होगी।

उन बातों में कभी इस साल को भी शामिल कर लेंगे,

और मुस्कुराकर इससे कहेंगे,

शायद यह इम्तिहान ज़रूरी था...

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#ज़हन

 Last week, tested positive for Coronavirus along with my parents. I am in home quarantine away from my wife and kid...and today is our third wedding anniversary.

Saturday, July 13, 2019

शहर के पेड़ से उदास लगते हो...(नज़्म)

दबी जुबां में सही अपनी बात कहो,
सहते तो सब हैं...
...इसमें क्या नई बात भला!
जो दिन निकला है...हमेशा है ढला!
बड़ा बोझ सीने के पास रखते हो,
शहर के पेड़ से उदास लगते हो...

पलों को उड़ने दो उन्हें न रखना तोलकर,
लौट आयें जो परिंदों को यूँ ही रखना खोलकर।
पीले पन्नो की किताब कब तक रहेगी साथ भला,
नाकामियों का कश ले खुद का पुतला जला।
किसी पुराने चेहरे का नया सा नाम लगते हो,
शहर के पेड़ से उदास लगते हो...

साफ़ रखना है दामन और दुनियादारी भी चाहिए?
एक कोना पकड़िए तो दूजा गंवाइए...
खुशबू के पीछे भागना शौक नहीं,
इस उम्मीद में....
वो भीड़ में मिल जाए कहीं।
गुम चोट बने घूमों सराय में...
नींद में सच ही तो बकते हो,
शहर के पेड़ से उदास लगते हो...

फिर एक शाम ढ़ली,
नसीहतों की उम्र नहीं,
गली का मोड़ वही...
बंदिशों पर खुद जब बंदिश लगी,
ऐसे मौकों के लिए ही नक़ाब रखते हो?
शहर के पेड़ से उदास लगते हो...

बेदाग़ चेहरे पर मरती दुनिया क्या बात भला!
जिस्म के ज़ख्मों का इल्म उन्हें होने न दिया।
अब एक एहसान खुद पर कर दो,
चेहरा नोच कर जिस्म के निशान भर दो।
खुद से क्या खूब लड़ा करते हो,
शहर के पेड़ से उदास लगते हो...
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#ज़हन

Saturday, February 3, 2018

नये उपन्यास में नज़्म


शुभानंद कृत मास्टरमाइंड (जावेद, अमर, जॉन सीरीज) नॉवेल में प्रकाशित नज़्म।


अभी तो सिर्फ मेरी मौजूदगी को माना,
दिमाग में दबे दरिन्दों से मिलकर जाना। 
तुझे तड़पा-तड़पा कर है खाना,
पीछे दरिया रास्ता दे तो चले जाना।

कभी किसी की चीख से आँखों को सेका है?
कभी बच्चे का जिस्म तेज़ाब से पिघलते देखा है?
अभी वक़्त है...रास्ते से हट जाओ,
किसी का दर्द दिखे तो पलट जाओ।
जिसकी दस्तक पर दिलेरी दम तोड़ती है...
मौत से नज़रे मत मिलाओ!

क़ातिल आँधियों मे किसका ये असर है?
दिखता क्यों नहीं है हवा मे जो ज़हर है?
चीखें सूखती सी कहाँ मेरा बशर है?
ये उनका शहर है...

धुँधला आसमां क्यों शाम-ओ-सहर है?
आदमख़ोर जैसा लगता क्यों सफ़र है?
ढ़लता क्यों नहीं है ये कैसा पहर है?
ये उनका शहर है...

जानें लीलती है ख़ूनी जो नहर है.
माझी क्यों ना समझे कश्ती पर लहर है?
हुआ एक जैसा सबका क्यों हश्र है?
ये उनका शहर है...


रोके क्यों ना रुकता...हर दम ये कहर है?
है सबके जो ऊपर..कहाँ उसकी मेहर है?
जानी तेरी रहमत किस्मत जो सिफर है!
ये उनका शहर है....

इंसानों को तोले दौलत का ग़दर है!
नज़र जाए जहाँ तक मौत का मंज़र है!
उजड़ी बस्तियों मे मेरा घर किधर है?
ये उनका शहर है...
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#ज़हन

हाल ही में आयोजित सूरज पॉकेट बुक्स कार्यक्रम में यह नज़्म मंच पर पढ़ी। 

Thursday, January 25, 2018

रहनुमा अक्स (नज़्म) #mohit_trendster


पिघलती रौशनी में यादों का रक़्स,
गुज़रे जन्म की गलियों में गुम शख़्स,
कलियों की ओस उड़ने से पहले का वक़्त।  
शबनम में हरजाई सा रंग आया है,
जबसे तेरे अक्स को रहनुमा बनाया है...

तेरे दर का सरफिरा रास्ता, 
इश्क़ की डोर में वाबस्ता, 
दिल में मिल्कियत...हाथ में गुलाब सस्ता। 
उपरवाले ने अब मेरी दुआओं का हिसाब बनाया है,
जबसे तेरे अक्स को रहनुमा बनाया है... 

नारियल सा किसका नसीब,
माना जिन्हे रक़ीब, 
निकले वो अपने हसीब। 
वक़्त की चुगली में जाने कितना वक़्त बिताया है,
जबसे तेरे अक्स को रहनुमा बनाया है... 

कहना उनको बात पुरानी हो गयी,
बचपन की अंगड़ाई जवानी हो गयी,
बिना पाबंदी मन की मनाही। 
दरख्तों की खुरचन पर दौर की स्याही,
12 सालों पर भारी जैसे एक कुम्भ छाया है,
जबसे तेरे अक्स को रहनुमा बनाया है...

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#ज़हन

Thumbnail Art - Gaston S Garcia‎
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Sunday, December 3, 2017

सड़ता हुआ मांस क्या कहेगा? (वीभत्स रस) #nazm #tribute


Revolutionary and Hindi writer Yashpal's 114th birth anniversary, The Government of India issued a commemorative Yashpal Centenary postage stamp (2003).
आज क्रांतिदूत, लेखक यशपाल जी का जन्मदिवस है। इस अवसर पर देशभर में कार्यक्रम आयोजित होते हैं। वैसे तो यशपाल जी हमें 41 वर्ष पहले छोड़ कर जा चुके हैं पर उनका लेखन अबतक देश का मार्गदर्शन करता रहा है और आगे जाने कितनी ही पीढ़ियों की उंगली पकड़कर उन्हें चलना सिखाता रहेगा। उनकी स्मृतियों को याद करते हुए उनके सुपुत्र आनंद जी बताते हैं कि वो लेखन को एक नौकरी की तरह नियम और समय से करते थे। अनेक शैलियों में लिखते हुए अगर उन्हें ऐसी बातों पर लिखना पड़ता जिनसे लोगो को घिन आती है या जिनपर बात करने से लोग बचते हैं तो वे निडरता से लिखते। वहीं आजकल अधिकतर लेखक, कवि खुद पर किसी लेबल लगने के डर से आम जनता के स्वादानुसार लिखने की कोशिश करते हैं। यशपाल जी काव्य नहीं लिखते थे पर हर कला की तरह पद्य में रूचि लेते थे। अपने रचे पागलपन की दौड़ में परेशान समाज की कुत्सित मानसिकता "अच्छा-अच्छा मेरा, छी-छी बाकी दुनिया का" पर चोट करती 'वीभत्स रस' में लिखी नज़्म-काव्य। यशपाल जी को मेरी नज़्म-काव्यांजलि। यह नज़्म आगामी कॉमिक 'समाज लेवक' में शामिल की है (आशा है मैं उनकी तरह निडरता से लिखना सीख सकूँ) नमन! -
सड़ता हुआ मांस क्या कहेगा?
सड़ता हुआ मांस क्या कहेगा? 
बिजबिजाते कीड़ों को सहेगा,
कभी अपनी बुलंद तारीख़ों पर हँसेगा,
कभी खुद को खा रही ज़मीं पर ताने कसेगा।

जब सब मुझे छोड़ गये,
साथ सिर्फ कीड़े रह गये,
सड़ती शख्सियत को पचाते,
मेरी मौत में अपनी ज़िन्दगी घोल गये।

आज जिनसे मुँह चुराते हो,
कल वो तुम्हारा मुखौटा खायेंगे,
इस अकड़ का क्या मोल रहेगा?
सड़ता हुआ मांस क्या कहेगा?

लोथड़ों से बात करना सीख लो,
बंद कमरों में दिल की तसल्ली तक चीख लो!
सड़ता हुआ मांस सुन लेगा, 
अगली दफ़ा तुम्हे चुन लेगा।

जिसे दिखाने का वायदा किया था हमसे,
वो गाँव तो हमारी लाश पर भी ना बसेगा।
खाल की परत फाड़ जब विषधर डसेगा,
सड़ता हुआ मांस क्या कहेगा?

जिसपर फिसले वो किसी का रक्त,
नाली में पैदा ही क्यों होते हैं ये कम्बख्त?
बाकी तो सब राम नाम सत!
उसपर मत रो... 
सुर्ख़ से काला पड़ गया जो,
ये जहां तो ऐसा ही रहेगा,
सड़ता हुआ मांस कुछ नहीं कहेगा!
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Tuesday, July 11, 2017

पैमाने के दायरों में रहना... (नज़्म) #ज़हन


पैमाने के दायरों में रहना,
छलक जाओ तो फिर ना कहना... 
जो जहां लकीरों की कद्र में पड़ा हो
उस से पंखों के ऊपर ना उलझना...
किन्ही मर्ज़ियों में बिना बहस झुक जाना,
तुम्हारी तक़दीर में है सिमटना...

पैमाने के दायरों में रहना,
छलक जाओ तो फिर ना कहना... 
क्या करोगे इंक़िलाब लाकर?
आख़िर तो गिद्धों के बीच ही रहना... 
नहीं मिलेगी आज़ाद ज़मीन,
तुम दरारों के बीच से बह लेना... 

पैमाने के दायरों में रहना,
छलक जाओ तो फिर ना कहना... 
जिस से हिसाब करने का है इरादा,
गिरवी रखा है उसपर माँ का गहना... 
औरों की तरह तुम्हे आदत पड़ जाएगी,
इतना भी मुश्किल नहीं है चुपचाप सहना... 

पैमाने के दायरों में रहना,
छलक जाओ तो फिर ना कहना...
साँसों की धुंध का लालच सबको,
पाप है इस दौर में हक़ के लिए लड़ना...
अपनी शर्तों पर कहीं लहलहा ज़रूर लोगे,
फ़िर किसी गोदाम में सड़ना...
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- मोहित शर्मा ज़हन
#mohitness #mohit_trendster #freelance_talents #trendyaba

Sunday, May 15, 2016

Nazm : Ab Lagta Hai (अब लगता है....) - मोहित शर्मा ज़हन


*) - अब लगता है.... 

मेरे पहरे में जो कितनी रातों जगी,
कब चेहरा झुकाए मुझे ठगने लगी,
पिछले लम्हे तक मेरी सगी,
जानी पहचानी नज़रें अब चुभने लगीं। 
याद है हर लफ्ज़ जो तुमने कहा था
अब लगता है.... 
इश्क़ निभाना इतना भी मुश्किल न था.... 

अटके मसलात पर क़ाज़ी रस्म निभाए,
उम्मीदों में उलझा वो फिर कि... 
...पुराने कागज़ों में वो ताज़ी खुशबू मिल जाए। 
जाते-जाते एक खत सिरहाने रखा था,
अब लगता है.... 
इश्क़ निभाना इतना भी मुश्किल न था....

कागज़ों से याद आया कभी तालीम ली थी.....
कुछ वायदों के क़त्ल पर मिले रुपयों से...
....आसान कसमें पूरी की थी। 
मासूमियत गिरवी रखकर दुनियादारी खरीदी थी... 
यहाँ का हिसाब वगैरह यहीं निपटा कर मरना था, 
अब लगता है.... 
इश्क़ निभाना इतना भी मुश्किल न था....

किसी का हाथ पकडे,
गलत राह पकड़ी,
पीछे जाने की कीमत नहीं,
उनसे नज़रें मिलाने की हिम्मत नहीं...
आगे जाने से इंकार करता मन बंजारा,
गलत सफर तो फिर भी राज़ी,
गलत मंज़िल इसे न गंवारा....

तो मरने तक यहीं किनारे बैठ जाता हूँ,
कोई भटका मुसाफिर आये तो उसे समझाता हूँ...
दूर राहगीर की परछाई में तेरी तस्वीर बना लेता था,
अब लगता है.... 
इश्क़ निभाना इतना भी मुश्किल न था....
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*) - Ab lagta hai.... 

Mere pehre mey jo kitni raaton jagi,
Kab chehra jhukaye mujhe thagne lagi,
pichhle lamhe tak meri sagi,
Jaani pehchaani Nazren ab chubhne lagi.... 
Yaad hai har lafz jo tumne kaha tha,
Ab lagta hai.... 
Ishq nibhaana itna bhi mushkil na tha.... 

Atke maslaat par Qazi rasm nibhaye,
Ummeedon mey uljha wo phir ki, 
Purane kagazon mey wo taazi khushboo mil jaaye,
Jaate-jaate ek khat sirhaane rakha tha.... 
Ab lagta hai.... 
Ishq nibhaana itna bhi mushkil na tha.... 

Kagazon se yaad aaya kabhi taleem li thi.....
Kuch vaaydo ke qatl par mile rupayon se....
....aasaan kasme poori ki thi,
Masoomiyat girvi rakhkar Duniyadaari khareedi thi....
Yahan ka hisaab wagehrah yahin nipta kar marna tha...
Ab lagta hai.... 
Ishq nibhaana itna bhi mushkil na tha.... 

Kisi ka haath pakde,
Galat raah pakdi,
Pichhe jaane ki keemat nahi,
Unse nazren milane ki himmat nahi...
Aage jaane se inkaar karta mann banjara,
Galat safar to phir bhi raazi,
Galat manzil ise na gawara....

To marne tak yahin kinare baith jaata hun,
Koi bhatka musafir aaye to usey samjhata hun...
Door raahgir ki parchaai mein teri tasveer bana leta tha....
Ab lagta hai.... 
Ishq nibhaana itna bhi mushkil na tha.... 

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#mohitness #mohit_trendster #trendybaba #freelance_talents #freelancetalents 

Friday, November 20, 2015

Kuboolnama (Nazm) - मोहित शर्मा 'ज़हन'


कुबूलनामा (नज़्म)

एक दिलेर कश्ती जो कितने सैलाबों की महावत बनी,
दूजी वो पुरानी नज़्म उसे ज़ख्म दे गयी। 
एक बरसो से घिसट रहा मुकदमा,
दूजी वो पागल बुढ़िया जो हर पेशी हाज़िरी लगाती रही।

मय से ग़म गलाते लोग घर गए,
ग़मो की आंच में तपता वहीँ रह गया साकी,
अपने लहज़े में गलत रास्ते पर बढ़ चले,
.....और रह गया कुछ राहों का हिसाब बाकी।

वीरानों में अक्सर हैरान करती जो घर सी खुशबू ,
आँचल में रखी इनायत घुल रही है परदेसी आबशार में... 
मेरे गुनाह गिनाना शगल है जिसका,
फ़िर भी बैर नहीं करती लिपटी रोटी उस अखबार में। 

रोज़ की शिकायत उनकी, 
बेवजह पुराने सामान ने जगह घेर रखी....
काश अपनी नज़र से उन्हें दिखा पाता,
भारी यादें जमा उन चीज़ों पर धूल के अलावा। 

उलट-सुलट उच्चारण के तेरे मंत्र-आरती चल गए,
रह गए हम प्रकांड पंडित फीके... 
दुनियादारी ने चेहरों को झुलसा दिया,
उनमे उजले लगें नज़र के टीके। 

समाप्त!

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Kubulnama (Nazm)

Ek diler kashti jo kitne sailaabo ki mahavat bani,
Dooji wo purani nazm jo use zakhm de gayi.
Ek barso ghisat raha mukadma,
Dooji wo pagal budhiya jo har peshi haziri lagati rahi.

Mayy se gham galaate log ghar gaye,
Ghamon ki aanch mein tapta wahin reh gaya saaki,
Apne lehze mein galat raaste par badh chale,
.....aur reh gaya kuch raahon ka hisaab baaki.

Veerano mein aksar hairaan karti jo ghar si khushboo,
Aanchal mein rakhi inayat ghul rahi pardesi aabshar mein...
Mere Gunaah ginana shagal hai jiska,
Phir bhi bair nahi karti lipti roti us akhbar mein.

Roz ki shikayat unki,
Bewajah puraane samaan ne jagah gher rakhi....
Kaash apni nazar se unhe dikha paata,
Bhaari yaaden jama un cheezon par dhool ke alawa.

Ulat-sulat uchchharan ke tere mantra-aarti chal gaye,
Reh gaye hum prakaand pandit pheeke...
Duniyadaari mein jhulse chehre,
Unme ujle lage nazar ke teeke....

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 बहुत समय बाद कुछ शायरी की है, वैसे निरंतर कुछ ना कुछ लिख रहा हूँ पर यह ब्लॉग कम अपडेट कर रहा हूँ। वैसे नेट पर मेरा पिछले कुछ महीनो का काफी काम मिलेगा। 
#mohitness #mohit_trendster #freelance_talents

Tuesday, December 23, 2014

Aaj phir us dar se lautna hua.... - मोहित शर्मा (ज़हन)



Aaj phir us dar se lautna hua….
Ek Raah mujrim tang thi,
Do musafiron ka saath chalna hua,
Ek pyaar betarteeb yun…
Kitne shikven aur ek muflis shukriya,
Aaj phir us dar se Lautna hua !

Koshish rahegi umr bhar,
Ek naam par nikle dua…
Jin kamro mey Tanhaai thi,
Wahin yaadon se milna hua..
Aaj phir us dar se lautna hua !

Jo vaayda aankhon mey hua,
Veeranon mein Armaano ka majma laga
Parda naa hone ka malaal unhe,
Jab shafaaq-O-shabhnam thi darmiyaa,
Aaj phir us dar se lautna hua !

Khudgarz kab patjhad laga,
Saawan kasam dene laga…
Ek khwaab dil ke kareeb tha,
Khwaishon mein jo shaheed hua…
Tab himmat se haara karte the…
Ab kismet se haare jua…
Aaj phir us dar se lautna hua !

Jiske shafugta hone par jashn tha,
Jaane kahan wo gum hua,
Jinse rooh wabasta thi,
Kis mod wo Tanha hua,
Aaj phir us dar se lautna hua….

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आज फिर उस दर से लौटना हुआ

आज फिर उस दर से लौटना हुआ
एक राह मुज़रिम तंग थी,
2 मुसाफिरों का साथ चलना हुआ,
एक प्यार बेतरतीब यूँ
कितने शिक़वे और एक मुफ़लिस शुक्रिया,
आज फिर उस दर से लौटना हुआ

कोशिश रहेगी उम्र भर,
एक नाम पर निकले दुआ,
जिन कमरो में तन्हाई थी,
वहीं यादों से मिलना हुआ,
आज फिर उस दर से लौटना हुआ….

जो वायदा आँखों में हुआ,
वीरानों में अरमानों का मजमा लगा,
पर्दा ना होने का मलाल उन्हें,
जब शफ़ाक़ ओ शभनम दरमियाँ
आज फिर उस दर से लौटना हुआ

खुदगर्ज़ कब पतझड़ लगा,
सावन कसम देने लगा,
एक ख्वाब दिल के करीब था,
ख्वाइशों में जो शहीद हुआ
तब हिम्मत से हारा करते थे,
अब किस्मत से हारे जुआ
आज फिर उस दर से लौटना हुआ

जिसके शगुफ़्ता होने पर जश्न था,
जाने कहाँ वो गुम हुआ,
जिनसे रूह वाबस्ता थी,
किस मोड़ वो तन्हा हुआ?
आज फिर उस दर से लौटना हुआ….

- मोहित शर्मा (ज़हन)

#mohitness #trendster #trendybaba #freelancetalents