Freelance Falcon ~ Weird Jhola-Chhap thing ~ ज़हन

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Tuesday, September 1, 2020

लेखक की कहानी, लेखक की ज़ुबानी-29 - आलोक कुमार और मोहित शर्मा ज़हन


लेखक अलोक कुमार जी के साथ मेरी बातचीत। 🎙️ 
काफ़ी मुद्दों पर बात हुई, जो रह गए उन्हें निपटाते रहेंगे। आप लोग स्नेह और आशीर्वाद बनाए रखें। #ज़हन
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Saturday, July 13, 2019

शहर के पेड़ से उदास लगते हो...(नज़्म)

दबी जुबां में सही अपनी बात कहो,
सहते तो सब हैं...
...इसमें क्या नई बात भला!
जो दिन निकला है...हमेशा है ढला!
बड़ा बोझ सीने के पास रखते हो,
शहर के पेड़ से उदास लगते हो...

पलों को उड़ने दो उन्हें न रखना तोलकर,
लौट आयें जो परिंदों को यूँ ही रखना खोलकर।
पीले पन्नो की किताब कब तक रहेगी साथ भला,
नाकामियों का कश ले खुद का पुतला जला।
किसी पुराने चेहरे का नया सा नाम लगते हो,
शहर के पेड़ से उदास लगते हो...

साफ़ रखना है दामन और दुनियादारी भी चाहिए?
एक कोना पकड़िए तो दूजा गंवाइए...
खुशबू के पीछे भागना शौक नहीं,
इस उम्मीद में....
वो भीड़ में मिल जाए कहीं।
गुम चोट बने घूमों सराय में...
नींद में सच ही तो बकते हो,
शहर के पेड़ से उदास लगते हो...

फिर एक शाम ढ़ली,
नसीहतों की उम्र नहीं,
गली का मोड़ वही...
बंदिशों पर खुद जब बंदिश लगी,
ऐसे मौकों के लिए ही नक़ाब रखते हो?
शहर के पेड़ से उदास लगते हो...

बेदाग़ चेहरे पर मरती दुनिया क्या बात भला!
जिस्म के ज़ख्मों का इल्म उन्हें होने न दिया।
अब एक एहसान खुद पर कर दो,
चेहरा नोच कर जिस्म के निशान भर दो।
खुद से क्या खूब लड़ा करते हो,
शहर के पेड़ से उदास लगते हो...
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#ज़हन

Wednesday, May 23, 2018

ख्याल...एहसास (ग़ज़ल) #ज़हन


एक ही मेरा जिगरी यार,
तेरी चाल धीमी करने वाला बाज़ार...
मुखबिर एक और चोर,
तेरी गली का तीखा मोड़। 
करवाये जो होश फ़ाख्ता,
तेरे दर का हसीं रास्ता...
कुचले रोज़ निगाहों के खत,
बैरी तेरे घर की चौखट। 

दिखता नहीं जिसे मेरा प्यार,
पीठ किये खड़ी तेरी दीवार...
कभी दीदार कराती पर अक्सर देती झिड़की,
तेरे कमरे की ख़फा सी खिड़की। 
शख्सियत को स्याह में समेटती हरजाई
मद्धम कमज़र्फ तेरी परछाई...
कुछ पल अक्स कैद कर कहता के तू जाए ना...
दूर टंगा आईना। 
जाने किसे बचाने तुगलक बने तुर्क,
तेरे मोहल्ले के बड़े-बुज़ुर्ग। 

...और इन सबके धंधे में देती दख़्ल,
काटे धड़कन की फसल,
मेरी हीर की शक्ल...
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Tuesday, July 11, 2017

पैमाने के दायरों में रहना... (नज़्म) #ज़हन


पैमाने के दायरों में रहना,
छलक जाओ तो फिर ना कहना... 
जो जहां लकीरों की कद्र में पड़ा हो
उस से पंखों के ऊपर ना उलझना...
किन्ही मर्ज़ियों में बिना बहस झुक जाना,
तुम्हारी तक़दीर में है सिमटना...

पैमाने के दायरों में रहना,
छलक जाओ तो फिर ना कहना... 
क्या करोगे इंक़िलाब लाकर?
आख़िर तो गिद्धों के बीच ही रहना... 
नहीं मिलेगी आज़ाद ज़मीन,
तुम दरारों के बीच से बह लेना... 

पैमाने के दायरों में रहना,
छलक जाओ तो फिर ना कहना... 
जिस से हिसाब करने का है इरादा,
गिरवी रखा है उसपर माँ का गहना... 
औरों की तरह तुम्हे आदत पड़ जाएगी,
इतना भी मुश्किल नहीं है चुपचाप सहना... 

पैमाने के दायरों में रहना,
छलक जाओ तो फिर ना कहना...
साँसों की धुंध का लालच सबको,
पाप है इस दौर में हक़ के लिए लड़ना...
अपनी शर्तों पर कहीं लहलहा ज़रूर लोगे,
फ़िर किसी गोदाम में सड़ना...
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- मोहित शर्मा ज़हन
#mohitness #mohit_trendster #freelance_talents #trendyaba

Sunday, May 15, 2016

Nazm : Ab Lagta Hai (अब लगता है....) - मोहित शर्मा ज़हन


*) - अब लगता है.... 

मेरे पहरे में जो कितनी रातों जगी,
कब चेहरा झुकाए मुझे ठगने लगी,
पिछले लम्हे तक मेरी सगी,
जानी पहचानी नज़रें अब चुभने लगीं। 
याद है हर लफ्ज़ जो तुमने कहा था
अब लगता है.... 
इश्क़ निभाना इतना भी मुश्किल न था.... 

अटके मसलात पर क़ाज़ी रस्म निभाए,
उम्मीदों में उलझा वो फिर कि... 
...पुराने कागज़ों में वो ताज़ी खुशबू मिल जाए। 
जाते-जाते एक खत सिरहाने रखा था,
अब लगता है.... 
इश्क़ निभाना इतना भी मुश्किल न था....

कागज़ों से याद आया कभी तालीम ली थी.....
कुछ वायदों के क़त्ल पर मिले रुपयों से...
....आसान कसमें पूरी की थी। 
मासूमियत गिरवी रखकर दुनियादारी खरीदी थी... 
यहाँ का हिसाब वगैरह यहीं निपटा कर मरना था, 
अब लगता है.... 
इश्क़ निभाना इतना भी मुश्किल न था....

किसी का हाथ पकडे,
गलत राह पकड़ी,
पीछे जाने की कीमत नहीं,
उनसे नज़रें मिलाने की हिम्मत नहीं...
आगे जाने से इंकार करता मन बंजारा,
गलत सफर तो फिर भी राज़ी,
गलत मंज़िल इसे न गंवारा....

तो मरने तक यहीं किनारे बैठ जाता हूँ,
कोई भटका मुसाफिर आये तो उसे समझाता हूँ...
दूर राहगीर की परछाई में तेरी तस्वीर बना लेता था,
अब लगता है.... 
इश्क़ निभाना इतना भी मुश्किल न था....
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*) - Ab lagta hai.... 

Mere pehre mey jo kitni raaton jagi,
Kab chehra jhukaye mujhe thagne lagi,
pichhle lamhe tak meri sagi,
Jaani pehchaani Nazren ab chubhne lagi.... 
Yaad hai har lafz jo tumne kaha tha,
Ab lagta hai.... 
Ishq nibhaana itna bhi mushkil na tha.... 

Atke maslaat par Qazi rasm nibhaye,
Ummeedon mey uljha wo phir ki, 
Purane kagazon mey wo taazi khushboo mil jaaye,
Jaate-jaate ek khat sirhaane rakha tha.... 
Ab lagta hai.... 
Ishq nibhaana itna bhi mushkil na tha.... 

Kagazon se yaad aaya kabhi taleem li thi.....
Kuch vaaydo ke qatl par mile rupayon se....
....aasaan kasme poori ki thi,
Masoomiyat girvi rakhkar Duniyadaari khareedi thi....
Yahan ka hisaab wagehrah yahin nipta kar marna tha...
Ab lagta hai.... 
Ishq nibhaana itna bhi mushkil na tha.... 

Kisi ka haath pakde,
Galat raah pakdi,
Pichhe jaane ki keemat nahi,
Unse nazren milane ki himmat nahi...
Aage jaane se inkaar karta mann banjara,
Galat safar to phir bhi raazi,
Galat manzil ise na gawara....

To marne tak yahin kinare baith jaata hun,
Koi bhatka musafir aaye to usey samjhata hun...
Door raahgir ki parchaai mein teri tasveer bana leta tha....
Ab lagta hai.... 
Ishq nibhaana itna bhi mushkil na tha.... 

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#mohitness #mohit_trendster #trendybaba #freelance_talents #freelancetalents 

Tuesday, December 23, 2014

Aaj phir us dar se lautna hua.... - मोहित शर्मा (ज़हन)



Aaj phir us dar se lautna hua….
Ek Raah mujrim tang thi,
Do musafiron ka saath chalna hua,
Ek pyaar betarteeb yun…
Kitne shikven aur ek muflis shukriya,
Aaj phir us dar se Lautna hua !

Koshish rahegi umr bhar,
Ek naam par nikle dua…
Jin kamro mey Tanhaai thi,
Wahin yaadon se milna hua..
Aaj phir us dar se lautna hua !

Jo vaayda aankhon mey hua,
Veeranon mein Armaano ka majma laga
Parda naa hone ka malaal unhe,
Jab shafaaq-O-shabhnam thi darmiyaa,
Aaj phir us dar se lautna hua !

Khudgarz kab patjhad laga,
Saawan kasam dene laga…
Ek khwaab dil ke kareeb tha,
Khwaishon mein jo shaheed hua…
Tab himmat se haara karte the…
Ab kismet se haare jua…
Aaj phir us dar se lautna hua !

Jiske shafugta hone par jashn tha,
Jaane kahan wo gum hua,
Jinse rooh wabasta thi,
Kis mod wo Tanha hua,
Aaj phir us dar se lautna hua….

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आज फिर उस दर से लौटना हुआ

आज फिर उस दर से लौटना हुआ
एक राह मुज़रिम तंग थी,
2 मुसाफिरों का साथ चलना हुआ,
एक प्यार बेतरतीब यूँ
कितने शिक़वे और एक मुफ़लिस शुक्रिया,
आज फिर उस दर से लौटना हुआ

कोशिश रहेगी उम्र भर,
एक नाम पर निकले दुआ,
जिन कमरो में तन्हाई थी,
वहीं यादों से मिलना हुआ,
आज फिर उस दर से लौटना हुआ….

जो वायदा आँखों में हुआ,
वीरानों में अरमानों का मजमा लगा,
पर्दा ना होने का मलाल उन्हें,
जब शफ़ाक़ ओ शभनम दरमियाँ
आज फिर उस दर से लौटना हुआ

खुदगर्ज़ कब पतझड़ लगा,
सावन कसम देने लगा,
एक ख्वाब दिल के करीब था,
ख्वाइशों में जो शहीद हुआ
तब हिम्मत से हारा करते थे,
अब किस्मत से हारे जुआ
आज फिर उस दर से लौटना हुआ

जिसके शगुफ़्ता होने पर जश्न था,
जाने कहाँ वो गुम हुआ,
जिनसे रूह वाबस्ता थी,
किस मोड़ वो तन्हा हुआ?
आज फिर उस दर से लौटना हुआ….

- मोहित शर्मा (ज़हन)

#mohitness #trendster #trendybaba #freelancetalents

Tuesday, January 28, 2014

मेरा समाज गिरवी...गवारा नहीं!

अखंड भारत एक शब्द ही नहीं एक मिसाल भी है कि विविधता से भरा देश खुद में कितने घटक समाये हुये है।  पर आज़ादी के बाद से ही राजनैतिक मतलबों के लिए और प्रगति कि आड़ में किसानो, कबीलो के मौलिक अधिकारो का हनन होता रहा है। जिसने आवाज़ उठायी उसको हिंसा कि विचारधारा का समर्थक बता कर जेल भेजा गया, मार दिया गया या वो गायब हो गया। अशिक्षा और जागरूकता कि कमी के कारण से ये सिलसिला निरंतर चलता रहा। कुछ इलाको में समानांतर सरकारो, विद्रोह के जन्म से सरकार को अपनी गलत, एकतरफा नीतियों के बचाव के साथ उनको बढ़ाने का मौका भी मिल गया। भारत कि जनसँख्या में 8.6 प्रतिशत अनुपात के अनुसार इन पर सरकारी मदद, खर्च एवम योजनायें नहीं चलायी गयी। बड़ी अर्थव्यवस्था में आदिवासी वर्ग के अधिकार निजी-कॉर्पोरेट संस्थानो के लिए बलि चढ़ाये जा रहे है। देश का विकास इन लगभग 11 करोड़ देशवासियों को साथ लेकर कि किया जा सकता है, इनकी अनदेखी करके या इनसे लड़कर नहीं। एक आदिवासी नेता कि इसी व्यथा पर ये कविता प्रस्तुत है, जहाँ लगने लगे अपने देश में ही अपना वर्ग राजनीति द्वारा किसी और मतलब के लिए गिरवी रखवा दिया हो।  - 



मेरा समाज गिरवी...गवारा नहीं! 

(14 December 2013)

समां गिरवी गवारा नहीं,
जहाँ गिरवी गवारा नहीं।

आसमाँ फिरोज़ी ना लगता,
कहीं सुर्ख यह नज़ारा तो नहीं ?

शायद गुस्ताखी है सियासत से दूर...मिट्टी के पास रहना,
यूँ रह-रह कर नज़रियों का फर्क सहना,
अपनी नज़र में माँ सी ज़मीनो कि कीमत नहीं,
उनकी नज़र में हमारी कागज़ी जानो कि हैसियत नहीं।

बगावत फितरत में नहीं किस्मत में घुली।
वो कबीला खुद में खूबसूरत रहा, 
उन पीढ़ियों कि रूह जाने कब फ़िज़ाओ में मिली?

क़ातिल लगे आदिवासी सीरत भोली,
लगती रही कबसे जिनकी कीमत-बोली।
हक़ में आवाज़ अगर उठ जाये..… 
चलवा दो दूर उस गुमनाम गाँव पर गोली।

ऊँची हैसियत से मेरी गलतियों कि मिसाल दो..... 
देखो अब बारिश साथ मे तेज़ाब ले आयी,
इसको दोष भी हम पर डाल दो। 

दूर है पर गूँगे नहीं,
अपनी पहचान को भटकतें कहीं।
हक़ कि जंग तो है ही डायन,
हमसफ़र सैलाबों में किनारा नहीं।

समां गिरवी गवारा नहीं,
जहाँ गिरवी गवारा नहीं।

- मोहित शर्मा (ज़हन)


Wednesday, October 16, 2013

रूह गुलाम-ए-हिन्द दिवानी...

Dedicated to Kargil War Heroes!



रूह गुलाम-ए-हिन्द दिवानी, 
सजी दुलहन सी बने सयानी।

फसलों की बहार फिर कभी ....
गाँव के त्यौहार बाद में ...
मौसम और कुछ याद फिर कभी ....
ख्वाबो की उड़ान बाद में। 
मांगती जो न दाना पानी,
जैसे राज़ी से इसकी चल जानी?
रूह गुलाम-ए-हिन्द दिवानी। 

वाकिफ है सब अपने जुलेखा मिजाज़ से, 
मकरूज़ रही दुनिया हमारे खलूस पर,
बस चंद सरफिरो को यह बात है समझानी, 
रूह गुलाम-ए-हिन्द दिवानी। 


वक़्त की धूल ज़हन से झाड़,
शिवलिंग से क्यों लगे पहाड़?
बरसो शहादत का चढ़ा खुमार,
पीढ़ियों पर वतन का बंधा उधार,
काट ज़ालिम के शीश उतार। 
बलि चढ़ा कर दे मनमानी,
रूह गुलाम-ए-हिन्द दिवानी। 

यहीं अज़ान यहीं कर कीर्तन,
यहीं दीवाली और मोहर्रम,
मोमिन है सब बात ये जानी,
रूह गुलाम-ए-हिन्द दिवानी। 

काफिर कौन बदले मायने,
किसी निज़ाम को दिख गए आईने। 
दगाबाज़ जो थे ....चुनिन्दा कर दिये,
आड़ लिए ऊपर दहशत वाले ...कुछ दिनों मे परिंदा कर दिये। 
ज़मीन की इज्ज़त लूटने आये बेगैरत ....
जुम्मे के पाक दिन ही शर्मिंदा हो गये। 

बह चले हुकुम के दावे सारे ....जंग खायी बोफोर्स ....
छंट गया सुर्ख धुआं कब का....दब गया ज़ालिम शोर ....
रह गया वादी और दिलो में सिर्फ....Point 4875 से गूँजा "Yeh Dil Maange More!!"
ज़मी मुझे सुला ले माँ से आँचल में ....और जिया तो मालूम है ...
अपनी गिनती की साँसों में यादों की फांसे चुभ जानी ...
रूह गुलाम-ए-हिन्द दिवानी। 



Friday, January 25, 2013

वो कोई पीर रहा होगा... (Netaji Subhash Chandra Bose Tribute)


A Tribute to Netaji Subash Chandra Bose 

ग़ुलामी के साये मे जो आज़ाद हिन्द की बातें करता था...
किसी दौर मे खून के बदले जो आज़ादी का सौदा करता था...
बचपन मे ही स्वराज के लिये अपनों से दूर हुआ होगा...
बस अपनी सोच के गुनाह पर जो मुद्दतों जेल गया होगा...
वो कोई पीर रहा होगा....

क्या बरमा...अंडमान..
क्या जर्मनी...जापान...
शायद ये जहाँ था उसके लिए छोटा...
किसी दौर ने गोरो पर बंगाली जादू चढ़ते देखा होगा..
फरिश्तो ने जिसका सजदा किया होगा....
वो कोई पीर रहा होगा....

अंदर सरपरस्त साधू ....बाहर पठान का चोगा...
खुद की कैद को उसने अपनी रज़ा पर छोड़ा था..
अंग्रेजो की आँखों का धोखा....
कहाँ ऐसा हिन्द का हमनवां होगा..
वो कोई पीर रहा होगा...

जहान को कुछ बताने..रविन्द्र सी ग़ज़ल सुनाने...
या शायद धूप-छाँव का हिसाब करने ज़मी पर यूँ ही आ गया..
न उसके आने का हिसाब थ ..और न जाने का...
और कहने वाले कहते है वो 1945 के आसमां मे फ़ना हो गया...
काश रूस पर सियासी बर्फ़ न जमा होती...
अगर ये बात सच होती तो अनीता-एमिली की आँखों ने दगा दिया होगा...
गाँधी से जीतकर भी जिसने महात्मा को जिया होगा...
वो कोई पीर रहा होगा...

वाकिफ जिंदगी मे जो कभी रुक न सका....
गुमनामी मे दरिया पार किया होगा...
दूर कहीं या पास यहीं कितनी मायूसी मे मुल्क को जीते-मरते देखा होगा...
आज़ाद होकर अपने ज़हन से दूर हुआ होगा...
 वो कोई पीर रहा होगा...


 वो कोई पीर रहा होगा...

Sunday, April 22, 2012

रूठी माँ



तेरे मना करने पर..
हाथ छुड़ाया मैंने...
दर्द पड़े जो सहने..
तुझको रुलाया मैंने..
दे चाहे मुझको जो सज़ा...

माना मेरी गलती है...
आँखें मेरी जलती है...
रूठी रहेगी कब तक ये बता..

छूना तेरा फबता है..
भीड़ मे डर लगता है..
संग लगा ले माये...

जादू तेरे हाथो मे..
मधु जो तेरी बातों मे..
नींद न आये माये..
झूला झुला दे माये...

खाऊं मै या मै खेलूँ...
एकटक निहारती तू क्यों..
जैसे मै तुझसे हूँ जुड़ा.. 

छाँव हो या हो धूप..
कितने तेरे जो रूप..
ममता मे तेरी ठंडक...
आँचल मे तेरे रौनक...
साये मे इसके होना मुझे रवां...

जो तू कहे मानूँगा...
तेरी रजा जानूँगा..
बस एक बार फिर से गोद मे ले सुला...


...समाप्त!

Poet Notes:

i) - Poem from my upcoming story "Maa ka Monologue".

ii) -  क्योकि ये कविता ऐसे विषय पर थी...इसलिए दिमाग पर ज्यादा जोर नहीं देना पड़ा.....और समय भी कम लगा. :)

iii) - Pic Source - jpsuess.blogspot.com 


iv) - 400 Likes on my Facebook Page. http://www.facebook.com/Mohitness Thank you! everyone. :)


Thursday, December 23, 2010

मेरे शहर मे हुई सेहर...

हुयी जो रौशनी कम तेरी यादों से नम आँखों मे, 

उसको भी मौसम की धुंध मान लिया...

दरो-दिवार रंगी कालिख से शहर वालो ने,

उसी कालिख से शहर भर मे तेरा नाम लिखा.... 


मिली बरसात ज़मी से तेरी महक लायी,

क़ुदरत भी सीख गयी इंसानों सी रुसवाई. 

देखी हर रस्म सरे-आम पस्त होते हुए, 

कितने ज़हरीले लफ्ज़ ज़ेहन मे पेवस्त होते हुए. 


दिवाली-ईद तन्हाई मे मना ली, 

कोई मिलने आया नहीं तो तेरी याद की जिल्द ख़ुद पर चढ़ा ली! 

मिलने की उम्मीद कभी न छूटी...

वो तो ज़माने की मसखरी से हिम्मत टूटी...


बरसो सिर्फ सपने जो देखे तेरे,

आँखें रोज़ तेरा धोखा दिखाती...तो कैसे मान लूँ की अब तू इतने पास है मेरे? 

तेरे अक्स को खुद मे कहीं कैद रखा था, 

पता नहीं की अब तू सामने है...या तेरा अक्स कैद से रिहा हुआ?

Wednesday, November 17, 2010

...अब वक़्त है जाने का!



हर ख्वाइश मे अक्स था इस अफसाने का,
हर कोशिश मे सपना था तुझे पाने का!
कल तलक मौके मिले तो दिल नादान बना,
आज हालत ने मौको को किया पल मे फ़ना!

माना की आज गर्दिश मे सफ़र करता हूँ,
ज़हन मे मेरे है पेवस्त हर अफसाना तेरा!
छुपाया था जिस गम को बड़ी खूबी से,
बरस गए बादल तेरी आँखों से वही नमी लेके!

जशन की आड़ मे रुखसत हुआ...साजिश थी मेरी,
बिना रुलाये तुझसे हाथ जो छुड़ाना था!
मुड़ा जो तुझसे तो खुदगर्ज़ क्यों मान लिया?
ये भी एक जरिया है गम को छुपाने का!

ज़माने भर की बुराई लादे फिरता हूँ फिर भी मगर....
पाक साफ़ दिखता है आँखों मे तेरी अक्स दीवाने का?
अपनी हस्ती पर जो हँसती फिरती...
अब वक़्त है उस दुनिया को आइना दिखाने का!

Wednesday, August 25, 2010

ये उनका शहर है!





भोपाल स्थित यूनियन कार्बाइड कम्पनी के कारखाने से एक हानिकारक गैस का रिसाव हुआ जिससे लगभग 15000 से अधिक लोगो की जान गई तथा बहुत सारे लोग अंधापन के शिकार हुए. भोपाल गैस काण्ड विश्व इतिहास का ऐसा नासूर है जो हर दिसम्बर मे बहुत बुरी टीस देता है. हालाँकि, इस घटना से पीड़ित लोगो की संख्या लाखो मे है और वहाँ जन्म लेने वाले बच्चे अब भी अपंग पैदा होते है. मुझे ये नहीं जानना की किसकी गलती है है.....मुझे बस 26 सालो के दर्द की दवा और उन करोडो आंसुओ को पोछने वाले हाथ चाहिए जिनसे सत्ता और पैसे की गंध ना आये.

जब भोपाल गैस काण्ड के दोषियों की बात होती है तो ऐसा लगता है हर चीज़ उन्होंने खरीद ली है...शायद ये शहर भी! ये ग़ज़ल भोपाल गैस त्रासदी पर लिखी है.


ये उनका शहर है!

कातिल आँधियों मे किसका ये असर है?
दिखता क्यों नहीं है हवा मे जो ज़हर है?
चीखें सूखती सी कहाँ मेरा बशर है?
ये उनका शहर है....

धुँधला आसमां क्यों शाम-ओ-सहर है?
आदमखोर जैसा लगता क्यों सफ़र है?
ढलता क्यों नहीं है ये कैसा पहर है?
ये उनका शहर है....

जानें लीलती है ख़ूनी जो नहर है.
माझी क्यों ना समझे कश्ती पर लहर है?
हुआ एक जैसा सबका क्यों हषर है?
ये उनका शहर है...

रोके क्यों ना रुकता...हर दम ये कहर है?
है सबके जो ऊपर..कहाँ उसकी मेहर है?
जानी तेरी रहमत किस्मत जो सिफर है!
ये उनका शहर है....

इंसानों को तोले दौलत का ग़दर है!
नज़र जाए जहाँ तक मौत का मंज़र है!
उजड़ी बस्तियों मे मेरा घर किधर है?
ये उनका शहर है...