Freelance Falcon ~ Weird Jhola-Chhap thing ~ ज़हन

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Wednesday, October 15, 2025

किताबें ज़रा हटके उत्सव: वे लोग जिन्होंने इसे मुमकिन बनाया

 

किसी आयोजन को सफल बनाने से भी पहले एक प्रयास होता है...कि कम से कम आयोजन तो हो जाए। दिमाग में आया विचार सही मूर्त रूप ले ले ऐसा तो लाखों में कुछ मामलों में हो पाता है। लेकिन एक आयोजन को सफल बनाने के पीछे कुछ ऐसे निस्वार्थ लोगों का योगदान होता है जो इस हद तक उसमें लग जाते हैं जैसे उनकी बहन की शादी हो! खैर, ऐसे ही लोग इस टॉक्सिक, दम घोंटू समाज के लिए ऑक्सीजन का काम करते हैं। 11 अक्टूबर, 2025 को सत्यवती कॉलेज, अशोक विहार, दिल्ली में हुए फ्लाईड्रीम्स पब्लिकेशंस के किताबें ज़रा हटके उत्सव में मुझे कुछ ऐसे ही लोगों से मिलने का सौभाग्य मिला।  

Saturday, July 8, 2023

एक लड़की जो कला और रंगों से जादू करती है - ज्योति सिंह (साक्षात्कार)


मोदीनगर निवासी ज्योति सिंह कई सालों से और कई विधाओं, शैलियों में कला के क्षेत्र में सक्रिय हैं। पेंटिंग, कॉमिक्स, डिजिटल आर्ट, कलरिंग में अक्सर उनका कोई न कोई काम प्रकाशित होता रहता है। वे एक फ्रीलांस आर्टिस्ट के तौर पर एक समय में कई प्रकाशनों के लिए काम करती रही हैं। ज्योति कई नए कलाकारों का मार्गदर्शन भी करती हैं। विश्व पुस्तक मेला 2023 में उनसे फिर मिलना हुआ और काफ़ी बातें हुई। 

Q. अपने परिवार के बारे में बताएं।

ज्योति - परिवार में माता पिता भैया भाभी हैं। पिताजी का फोटोग्राफी का बिज़नेस है और मां अध्यापिका हैं। पिताजी ने हमेशा बहुत प्यार किया है और करते हैं और मां तो फिर मां होती है । मुझे शिक्षित करने में मां ने हमेशा प्रेरित किया है। घर में सारे लोग बहुत caring and supportive हैं। 



Q. कला से लगाव कब से है और इस बीच आपको क्या क्या उपलब्धियां मिली?


ज्योति - बचपन से कला के साथ एक अलग रिश्ता रहा है। मैं बचपन से इंट्रोवर्ट रही हूं शांत रहती थी लेकिन peace of mind के लिए हमेशा आर्ट का सहारा लिया। कभी दुखी होती थी तो किसी को नहीं बताती थी बस पेपर पेंसिल मेरे लिए थेरेपी का काम करते थे। हालांकि इसे करियर की तरह नहीं सोचा था it was something i loved to do in my leisure time but when I was in my last semester of BBA मैंने कुछ फेमस आर्टिस्ट का काम देखा social media पर और उन्हें कॉपी करने की कोशिश की और धुन कुछ ऐसी लगी कि Institute of fine arts से एक साल का diploma कर लिया। और उसके बाद my hobby became my addiction. Mental peace achieve करने के साथ साथ मैंने नेशनल लेवल पर अलग अलग states में group exhibition में participate किया है जिसमे 15 से ज़्यादा certificates and medals हैं।

I have worked as a digital colorist with some renowned children book publishers while studying at college and currently doing digital colorist freelancing.



Q. आपके करियर में बड़ा बदलाव / टर्निंग पॉइंट कब आया?


ज्योति - After completing my post graduation I worked for an MNC for three years but उसकी वजह से आर्ट को ज़्यादा वक्त़ नहीं दे पा रही थी सिर्फ वीकेंड पर ही कुछ काम हो पाता था चूंकि मेरा रहना गुड़गांव में था तो ज़्यादा वक्त़ मिलता नहीं था लेकिन lockdown में मुझे आर्ट के साथ रिश्ता बहाल करने का मौका मिला और मैंने महसूस किया कि इसके अलावा कोई काम मेरे लिए ऐसा नहीं है जो मैं इतनी खुशी से कर सकूं जितना कि आर्ट तब से इसे फुल टाइम जॉब बना लिया। मैं समझती हूं ये मेरी ज़िंदगी या करियर का टर्निंग पॉइंट था।


Q. किन क्रिएटिव लोगों का आपके जीवन पर बड़ा प्रभाव पड़ा है?


ज्योति - बहुत से लोग रहे है जो ज़िंदगी के किसी न किसी मोड़ पर मेरी प्रेरणा बने हैं सब के नाम ले पाना मेरे लिए मुश्किल है मगर कुछ लोग हैं जिन्हें मैं समझती हूं कि अपनी फील्ड के माहिर लोग हैं और उनका impact मेरे ऊपर बहुत ज़्यादा है जिनमें Lalit Sharma ji, Pradeep Sherawat ji, Vijay Sharma ji, Jagdish Kumar Ji,  Dildeep Singh ji, Abhishek Malsuni ji, Hemant ji, Vinod uncle आदि है। 



 Q. अपने शहर मोदीनगर के बारे में कुछ बताएं। यहां की कौनसी बातें और जगहें आपको पसंद हैं?  


ज्योति - Honestly speaking मैंने मोदीनगर ज़्यादा explore नहीं किया है मगर कुछ ऐसी जगहें हैं जहां मैं अक्सर जाती रहती हूं उनमें से एक मशहूर मोदी मंदिर है जहां सुकून है शांति है cultural parks हैं यहां जहां मैं evening walk करती हूं। मोदी नगर में काफी अच्छे collages हैं। अब तो मेट्रो भी शुरू होने वाली है। I am happy कि मेरा शहर तेज़ी से तरक्की कर रहा है। 




Q. बहुत से आर्टिस्ट को पता नहीं होता कि वे नौकरी या काम के लिए कहां से सही शुरुआत करें, उनको आप क्या सलाह देंगी?


ज्योति - ये सभी के साथ होता है क्योंकि एक आर्टिस्ट आर्ट को बिजनेस समझ कर शुरू नही करता लेकिन वक्त के साथ उसे अहसास होता है कि वो अपने passion को profession में तब्दील कर ले। इसके लिए ज़रूरी है कि आप ये determine करे आप जॉब करना चाहते हैं या अपना आर्ट वर्क करना चाहते हैं। जॉब के लिए आपको market scenario पता करना पड़ेगा कि किस तरह की आर्ट relevent है कौन से courses और certificates आपके लिए helpful हो सकते हैं आपका forte क्या है linkedin नौकरी. कॉम जैसे पोर्टल्स पर कनेक्शन बनाना वगैरह मतलब कि बहुत कठिन है डगर पनघट की। मगर आपका कला के प्रति समर्पण ज़रूरी है । Everything thrives on gradually तो हो जायेगा करते करते। आर्ट के सफर का मज़ा लीजिए हो जायेगा you just need to be dedicated and aware about what you are upto. 



Q. ट्रेडिशनल आर्ट और डिजिटल आर्ट में से आपको क्या ज़्यादा पसंद है और क्यों?


ज्योति - हर फूल की अपनी खुशबू होती है इसलिए मुझे तो दोनों ही बहुत पसंद है। अलग तरह का फील है दोनो forms में । हालांकि शुरू शुरू में मुझे डिजिटल बिल्कुल पसंद नहीं था शायद इसलिए कि मेरा ज़्यादा वक्त पेंसिल पेपर के साथ बीता लेकिन अब मेरी सोच बदली है डिजिटल में आपके पास एक्सपेरिमेंट करने की आज़ादी है टाइम की बचत है कभी भी कर सकते हैं। Earning के chances डिजिटल में ज़्यादा और आसान हैं वहीं ट्रेडिशनल आर्ट में focus imagination time dedication आदि की ज़रूरत पड़ती है so i am comfortable in both forms now.



Q. कलरिंग करते समय आप किन बातों का ध्यान रखती हैं?


ज्योति - I m just a learner तो मैं आजकल सीख रही हूं कि theme के according कौनसे colour selection लेने चाहिए और grey scale पर कैसे काम किया जाता है. Story और mood के according कैसे colour choose करने चाहिए।



Q. आपके सबसे हिट प्रोजेक्ट्स कौनसे रहे हैं और आने वाले समय में आपके कौनसे प्रोजेक्ट्स आ रहे हैं?


ज्योति - मेरे लिए तो मेरी हर आर्ट मेरे दिल के करीब है लेकिन मैं समझती हूं कि आपका सबसे अच्छा काम वो है जिसमें आप अपने भाव को देखने वाले तक पहुंचाने में कामयाब हुए हैं। ऐसी ही एक painting जो मैंने अपने drawing room में लगाई हुई है भगवान कृष्ण और मीरा की । It was also my first painting on Canvas.


आने वाले प्रोजेक्ट्स की फेहरिस्त लंबी है मैने कई कॉमिक्स प्रकाशन के लिए cover page design किए है कई कॉमिक्स जिनकी कलरिंग मैंने की है आने वाले हैं लेकिन खास तौर पर मैं Reva 2 और shadow blade के लिए excited हूं।



Q. ऐसे आर्टवर्क या प्रोजेक्ट जो आपके दिल के करीब हों, लेकिन ज़्यादा लोगों तक नहीं पहुंच पाए?


ज्योति - जी हैं कुछ ऐसी पेंटिंग्स जो मैंने लॉकडाउन में बनाई है और कुछ पहले की भी है जो शायद अधूरी अधूरी ही हैं मुझे लगता है कि भविष्य में वो भी किसी exhibition का हिस्सा बनें। 



Q. आपकी पसंदीदा कॉमिक्स कौनसी हैं?


ज्योति - अब तो कॉमिक्स पढ़ने का मामला कम कम ही होता है ज़्यादा तर तो मैं उसके आर्टिस्टिक पहलुओं पर गौर करती हूं मगर बचपन में काफी कॉमिक्स पढ़ी हैं जिनमें चाचा चौधरी बिल्लू पिंकी ध्रुव नागराज वगैरा मेरी पसंदीदा कॉमिक्स रही हैं।



Q. आपकी सबसे मशहूर पेंटिंग के बारे में बताएं।


ज्योति - मेरे लिए तो मीरा और कृष्ण की पेंटिंग मेरी सबसे ज़्यादा मशहूर पेंटिंग है बहुत सारी exhibition का हिस्सा रही बहुत से लोगों ने इसे खरीदने की इच्छा ज़ाहिर की मगर मेरा इसे बेचने का बिल्कुल भी मन है क्योंकि मेरा मानना है कि आपका सबसे अच्छा काम आपके सामने होना चाहिए जिससे आपको और अच्छा करने का मोटिवेशन मिले तो फिलहाल ये पेंटिंग घर के ड्राइंग रूम की शोभा बढ़ा रही है।




Q. फुल टाइम जॉब और फ्रीलांस काम में क्या अंतर है और इनमें आप किसे बेहतर मानती हैं?


ज्योति - सबसे बड़ा अंतर आज़ादी का है फुल टाइम जॉब में आप एक schedule से bound होते है जबकि फ्रीलांस में अपनी साहूलत और शर्तों के साथ आप जीविका अर्जित करते हैं। लेकिन मैं नए आने वालों को मशवरा दूंगी कि वे ज़रूर जॉब करें ताकि उन्हें ज़्यादा लोगों से मिलने का और उनके काम को और उसे करने के तरीक़े को देखने का मौक़ा मिले। ये उनके लिए काफी फायदेमंद learning experience रहेगा। 



Q. कोविड-19 के बाद आपके जीवन में क्या बदलाव आए हैं?


ज्योति - सबसे बड़ा बदलाव तो ये कि nothing is permanent in this world इसी वजह से शायद मैं ज़्यादा down to earth हों रही हूं  चूंकि मैंने अपने करीबी लोगों को खोया है इसलिए अब ज़्यादा देर नाराज़ नहीं रहती किसी से। शायरी की तरफ झुकाव हुआ है जिसकी वजह से imagination level increase हुआ है। Work from home की वजह से आर्ट वर्क ज़्यादा कर पाई। Overall mixed experience रहा post कोविड 19। शायद इसी का नाम ज़िंदगी है सुख और दुख के समागम का नाम। बदलाव आए है लेकिन ज़रूरी ये है कि हम हर गुज़रते दिन के साथ अपने आपको सकारात्मक बदलाव की तरफ ले कर चलें।



Q. आर्ट के अलावा आप कुछ अन्य कम्युनिटी से भी जुड़ी हुई हैं, उनके बारे में बताएं।


ज्योति - जी आर्ट के अलावा और कुछ NGOs हैं जिनसे मैं जुड़ी हुई हूं जिसमें स्पाइनल कॉर्ड इंजरी से related awareness प्रोग्राम और दिव्यांग लोगों की मदद की जाती है। इसी तरह मोटिवेशनल मॉडलिंग भी करती रहती हूं मेरे साथ काफी लोग जुड़े हुए है जिनकी वजह से इस तरह के अच्छे कामों का मैं भी हिस्सा बन जाती हूं। मेरे कुछ मित्र para athlete international players भी है जिनकी वजह से sports events से भी जुड़ाव है।

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#ज़हन

Tuesday, July 19, 2022

जब बादशाह अकबर से मिले महाराणा प्रताप

ध्यान दें - ये उस कालखंड और तब हुई घटनाओं के अनुसार लिखी एक काल्पनिक कहानी (Historical Fiction) है। एक प्रोजेक्ट का रिजेक्टेड ड्राफ़्ट, सोचा यहाँ इस्तेमाल कर लूँ।

महाराणा प्रताप और अकबर की मुलाकात

मेवाड़ की मिट्टी ने निकली थी वो ज्वाला,
हल्दीघाटी को जिसने लाल कर डाला!

हमलावरों की हिम्मत का हर कतरा डिगा,
चेतक पर उन्हें वो शूरवीर यमराज दिखा!

सुन चेतक के कदमों की छाप,
उड़ गए शत्रु जैसे भाप, रूद्र ज्वाला की वो ताप,
मेवाड़ की अटल दीवार...महाराणा प्रताप!

मध्यकालीन भारत...15वी शताब्दी का समय! कई राजाओं के झंडों के तले भारत अनेक छोटे-बड़े राज्यों में बंटा था जिनमें से एक थी राजपूतों की भूमि मेवाड़! मेवाड़ पर राज कर रहे शिशोदिया खानदान के राजा उदय सिंह भी अपनी स्वतंत्रता को बचाने के लिए जूझ रहे थे। इसी दौरान समय एक योद्धा को आने वाला समय बदलने के लिए तैयार कर रहा था।
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आज राजमहल में उत्सव जैसा माहौल था। सिर्फ महल ही नहीं मेवाड़ की हर गली मानो किसी दुल्हन की तरह सजी हुई थी। निराशा के दौर में जैसे मेवाड़ का दामन थामने के लिए एक उम्मीद की किरण आई थी।

इस हलचल से अनजान राजवैद्य मूल सिंह ने सेनापति उत्कर्ष से पूछा, “सेनापति जी, ये किस आयोजन की तैयारियां चल रही हैं? इस मौसम में तो कोई त्यौहार भी नहीं होता है।”

सेनापति उत्कर्ष ने एक सैनिक को कुछ थमाते हुए कहा, “आज कुंवर प्रताप गुरुकुल से लौट रहे हैं। यह आयोजन उन्हीं के स्वागत के लिए किया गया है।”

मूल सिंह ने द्वार की तरफ होती सजावट को देखते हुए कहा, “लेकिन किसी राजकुमार का कुछ दिनों के अवकाश पर गुरुकुल से महल आना तो आम बात है। इसमें उत्सव जैसा क्या है?”

सेनापति उत्कर्ष मुस्कुराकर बोले, “राजवैद्य जी, कुंवर प्रताप अवकाश के लिए महल में नहीं आ रहे हैं। इससे पहले की आप किसी और आशंका से घबराएं, आपको बता दूँ कि गुरु वेदांत ने उन्हें गुरुकुल से नहीं निकाला है। वो गुरुकुल की सभी शिक्षाएं ख़त्म करके आ रहे हैं।”

मूल सिंह अवाक रह गए, “असंभव! एक 16-17 साल का किशोर 24-25 साल में पूरी होने वाली सभी शस्त्र विद्याएं और शिक्षाएं कैसे खत्म कर सकता है?”

उत्कर्ष ने मूल सिंह के कंधे पर हाथ रखकर कहा, “ये केवल आपकी ही नहीं हम सबकी प्रतिक्रिया थी। कुंवर प्रताप सिंह ने ये साबित कर दिया है कि मेवाड़ की गद्दी के लिए उनके अलावा कोई विकल्प नहीं है।”

तभी उनकी करीब एक तेज़ आवाज़ गूंजी, “सेनापति उत्कर्ष!”

दोनों ने पलटकर देखा तो महाराज उदय सिंह की दूसरी रानी सज्जा बाई उन्हें घूर रही थीं जिनका बेटा कुंवर शक्ति सिंह, प्रताप से कुछ ही महीने छोटा था। गुरुकुल में प्रताप की सफलता से जहाँ पूरा मेवाड़ खुश था वहीं इस खबर से रानी सज्जा बाई के मन पर सांप लोट रहे थे।

इससे पहले सेनापति कुछ कहते, रानी सज्जा बाई ने अपना गुस्सा दबाते हुए कहा, “मेवाड़ की राजगद्दी किसको मिलेगी यह समय बताएगा, बेहतर होगा कि आप इस समय अपने काम पर ध्यान दें।

सकपकाये सेनापति के मुंह से सिर्फ एक शब्द फूटा, “जी!” और वे सैनकों को निर्देश देने के काम में लग गए।
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इधर कुंवर प्रताप और गुरु वेदांत के काफिले पर मेवाड़ की गलियों में फूलों की बारिश हो रही थी। राणा प्रताप में सबको अपना मसीहा दिखाई दे रहा था।

बीच-बीच में कहीं से ये आवाज़ भी आ जाती, "राजा प्रताप सिंह की जय!"

जहाँ गुरु वेदांत अपने युवा शिष्य के लिए जनता के इस स्नेह को देख कर फूले नहीं समां रहे थे वहीं प्रताप को मन ही मन ये बात अखर रही थी कि उसके पिता के रहते हुए कई लोग उसे राजा क्यों कह रहे हैं। वो रथ पर लोगों की भीड़ के बीच थे इसलिए उनके मन की ये बात किसी से पूछने का सही समय नहीं था।

राजमहल पहुँचने पर कई सैनिकों के साथ सेनापति उत्कर्ष और अन्य मंत्री, प्रताप की माता रानी जयवंता बाई, सौतेली माता सज्जा बाई और कुंवर शक्ति सिंह उनके स्वागत में खड़े थे। एक बार फिर से "राजा राणा प्रताप की जय!" का उद्घोष होने लगा।

कुंवर प्रताप कबसे इस क्षण का इंतज़ार कर रहा था। अपनी गुरुकुल शिक्षा इतनी कम उम्र में पूरी कर वो अपने पिता का सर गर्व से ऊँचा करना चाहता था। भीड़ में उसकी आँखें केवल अपने पिता को ही ढूंढ रही थीं। उसके लिए लगते नारे उसे परेशान कर रहे थे।

अपने स्वागत कार्यक्रम में सबका अभिवादन करने के बाद प्रताप माँ के पास बैठा। उसने रानी जयवंता बाई से पूछा, “माँ, पिता जी कहाँ हैं? ये कई लोग और सैनिक मुझे राजा क्यों बोल रहे हैं?”

जयवंता बाई प्रताप के सर पर हाथ फिरा कर बोली, “तुम्हारे पिता की तबियत बहुत ख़राब है। उनकी ऐसी हालत देख हमने ये आयोजन नहीं करने का फैसला लिया था, लेकिन उन्होंने ज़िद करके ये आयोजन करवाया। वो अपनी हालत की वजह से तुम्हारी इतनी बड़ी उपलब्धि का जश्न टालना नहीं चाहते थे।”

माँ की बात ने प्रताप का जश्न और फीका कर दिया, उसने बुझे मन से रानी से कहा, “माँ, लेकिन…”

जयवंता बाई ने उसका चेहरा पढ़कर कहा, “तुम घबराओं मत, हमारे साथ-साथ वैद्य मूल सिंह दिन-रात उनकी सेवा में लगे रहते हैं।”

इस उत्सव के माहौल के बीच मेवाड़ का ख़ास दूत महल में आता है। इस दूत को राजा उदय सिंह ने मेवाड़ राज्य की शर्तों के साथ मुगल दरबार भेजा था। बादशाह अकबर ने उन सभी शर्तों को नामंज़ूर कर दिया और मेवाड़ के दूत को गंजा कर, उसकी पिटाई और बेज़्ज़ती कर दरबार से निकलवा दिया।

ये खबर सुन और राजदूत का हाल देख हंसी-ख़ुशी का माहौल ग़मगीन हो गया। आज से पहले किसी राजदूत की ऐसी बेइज़्ज़ती नहीं हुई थी। राजा उदय सिंह के घटते प्रभाव और बिगड़ती तबियत के कारण सबको लगने लगा था कि मुग़ल जल्द ही हमला कर देंगे और भारत के अन्य राज्यों की तरह मेवाड़ भी उनके अधीन होगा।

राजा उदय सिंह की अनुपस्तिथि में किसी को समझ नहीं आ रहा था कि मुगलों की इस हरकत का क्या जवाब दिया जाए।

स्थिति भांप कर सबसे वरिष्ठ राजसदस्य गुरु वेदांत अपनी जगह पर खड़े हुए और बोले, “इस समय हमारी तैयारी और सेना कम है। ये एक गंभीर घटना है, लेकिन हमें किसी भी तरह के आवेश में नहीं आना है!”

दूत की बात सुनने के बाद से ही आँखों में अंगार लिए बैठे कुंवर प्रताप से रहा नहीं गया, “माफ़ कीजिये, गुरुदेव लेकिन मुझे पिता जी का ऐसा अपमान स्वीकार नहीं है। आपके मार्गदर्शन में मैंने सभी शिक्षाएं पूरी कर ली हैं और मेवाड़ की सेना न सही, मैं तो तैयार हूँ।”

गुरु वेदांत परेशान होकर बोले, “तुम किस बात के लिए तैयार हो?”
प्रताप उसी स्वर में बोला, “बदले के लिए!”

गुरु वेदांत बोले, “...लेकिन प्रताप”

प्रताप अब जैसे अपने मन में शपथ ले चुका था, “गुरुवर, आपने ही हमें सिखाया था कि राजपूतों को कोई जितना देता है, हम उसका सूद समेत उसे लौटाते हैं। मेरा खून इतना ठंडा नहीं कि मैंने अपनी आँखों से महाराज का अपमान देखने के बाद भी कुछ न करूँ!”

रानी सज्जा बाई के इशारे पर सेनापति उत्कर्ष ने कहा, “कुंवर प्रताप, अभी आपकी उम्र कम है। ऐसे मामलों में आपके लिए बड़ों का मार्गदर्शन ज़रूरी है।”

प्रताप आज किसी की नहीं सुनने वाला था, “उम्र तो उस अकबर की भी मेरे बराबर ही है जो पूरे भारत का बादशाह बना बैठा है। अगर उसके लिए उम्र केवल एक अंक है, तो मेरे लिए क्यों नहीं। और अगर हमें आगे उससे ही युद्ध करना है, तो क्यों न उसे पहले से ही जान लें!”

रानी जयवंता बाई ने प्रताप को टोका, “कुंवर प्रताप, अब आप मेवाड़ के प्रतिनिधि भी हैं। जल्दबाज़ी में हुई आपकी किसी भूल का परिणाम पूरे मेवाड़ को चुकाना पड़ सकता है।”

प्रताप ने माँ को समझाया, “माता, मेरा ये जोखिम सिर्फ़ मेरे लिए है। मैं आपको वचन देता हूं कि अपनी किसी हरकत का नुक्सान मेवाड़ वासियों को नहीं झेलने दूंगा।”

अब दरबार में मौजूद हर किसी को समझ आ चुका था कि प्रताप का फैसला अटल है।

तभी प्रताप के पास आकर कुंवर शक्ति बोला, “दादाभाई अगर आप पिता जी के अपमान का बदला लेने जाएंगे, तो मैं भी साथ चलूंगा!”

प्रताप ने मुड़कर शक्ति से कहा, “नहीं, शक्ति। ये मेरा फैसला है और मुझे ही इसे पूरा करना है। मुग़ल दरबार तक पहुँचने की डगर खतरों से भरी हुई है। मैं अपने अलावा किसी और को उन खतरों में नहीं डालना चाहता।”

रानी सज्जा बाई ने अपने पुत्र कुंवर शक्ति को पीछे खींच लिया और मन ही मन सोचा, “प्रताप कौनसा मुगलों के चंगुल से वापस आ सकेगा। जब शक्ति की राजगद्दी का रास्ता अपने आप खाली हो रहा है, तो और भी अच्छा!”

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उसी रात प्रताप अपने पिता के कक्षा में अपनी माँ रानी जयवंता बाई से बातें कर रहा था।

रानी स्नेह से उसके मुंह पर हाथ फिराते हुए बोलीं, "कितना बड़ा हो गया है मेरा पुत्र! अभी कल ही तो अपने नन्हे क़दमों से इस कक्ष में भागता और मेरे आँचल में छुपता था। आज अपने निर्णय खुद लेता है।"

प्रताप नम आँखें लिए बोला, "माँ, आपको पता है मैं कितने दिन से चैन से नहीं सोया हूँ। जब तक आपके आँचल में नहीं आ जाता तो चैन की नींद नहीं आती।"

रानी ने कहा, "...और आते ही दूर जाने का प्रबंध भी कर लिया।"

प्रताप ने भावुक होकर कहा, "एक पुत्र माँ से कितना भी दूर चला जाए, लेकिन फिर भी पास ही रहता है। आज मुग़ल बादशाह द्वारा पिता का अपमान मैं सह न सका।"

माँ तो जैसे पहले ही प्रताप का फैसला जानती थी, “पता है मुगल सेनापति ने मेवाड़ के बारे में और क्या कहा?”

प्रताप ने उत्सुक होकर पूछा, “क्या कहा?”

रानी बोलीं, “मेवाड़ की मिट्टी अब बंजर हो चुकी है, उसमे अब राणा सांगा जैसे शूरवीर नहीं होते जो दिल्ली के बादशाह को धूल चटा सकें।”

प्रताप का गुस्सा फिर जाग गया, “मेवाड़ की मिट्टी के गुण केवल इस मिट्टी से निकले लोग ही जान सकते हैं। इन्हें इतनी पीढ़ी बाद भी राणा सांगा याद हैं, तो राणा प्रताप भी हमेशा याद रहेगा।”

रानी जयवंता बाई ने सवाल किया, “वहां कैसे और कब जाओगे?”

प्रताप मुस्कुराकर बोला, “वैसे तो आपके आशीर्वाद से ये रास्ता पार ही समझो। लेकिन मेवाड़ के अलावा दिल्ली तक का सारा इलाका मुगलों के राज में है। कुछ दिनों में जब भी बरसात होती है, तो मुझे विषम मौसम में एक अच्छे घोड़े के साथ जाना होगा, ताकि वहां का ज़्यादा से ज़्यादा रास्ता मैं बिना किसी की नज़रों में आये पार कर सकूँ।
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अगले दिन कुंवर प्रताप और गुरु वेदांत घोड़ों का निरिक्षण कर रहे थे। प्रताप को एक घोडा कुछ पसंद आया, तो वही घोड़ा कुंवर शक्ति ने अपने लिए पसंद कर लिया। घोड़ों की देखभाल कर रहे सैनिक ने उन्हें चेताया,
“कुंवर सा, ये घोड़ा नया और शक्तिशाली है। किसी के संभाले नहीं संभलता। इसको रहने दें। आज वैसे भी मौसम ख़राब है।”

कुछ दिनों से हर किसी की जुबान पर सभी को प्रभावित करने के लालच में कुंवर शक्ति बिना कुछ सोचे समझे उस घोड़े कि अचानक बिजली कड़कने से घोड़ा बिदक गया और बाड़े को फांद कर जंगल की और भागने लगा। कुंवर शक्ति ने अभी घुड़सवारी का प्रशिक्षण शुरू ही किया था, तो आत्मविश्वास में घोड़े पर बैठने का फैसला उसे भारी पड़ गया था।

किसी के कुछ सोचने से पहले ही वो महल की सीमा से बहुत दूर जा चुका था। प्रताप फुर्ती दिखाते हुए एक घोड़े पर सवार हुआ और शक्ति का पीछा करना शुरू किया, प्रताप के घोड़े की गति सामान्य थी जबकि शक्ति का घोड़ा बहुत तेज़ दौड़ रहा था। प्रताप ने घोड़े की दिशा से अनुमान लगाते हुए अपने घोड़े को दूसरी ओर मोड़ा जहाँ से वो कुंवर शक्ति के घोड़े के पास पहुँच सकता था। कुछ ही देर में प्रताप जंगल में उस पगडंडी से कुछ ऊपर पहाड़ी पर था जहाँ से कुंवर शक्ति का घोड़ा गुज़रने को था। शक्ति के घोड़े को पास आता देख प्रताप ने अपने घोड़े से उतरकर एक सधी हुई छलांग लगाईं और शक्ति के घोड़े पर उसके साथ बैठ गया। उस मोड़ पर प्रताप के ऐसे आने के कारण घोड़े की गति कुछ कम हुई और प्रताप, शक्ति को लेकर नीचे आ गया। घोड़ा भी अब तक शांत हो चुका था।

शक्ति अपनी इस हालत और सबके सामने हुई बेइज़्ज़ती से बहुत गुस्से में था। वो अपनी कटार निकाल कर उस घोड़े की तरफ बढ़ा। प्रताप ने तुरंत उसे पकड़ा, “रुको शक्ति, ये क्या कर रहे हो?”

शक्ति गुस्से में बोला, “हट जाइये, दादाभाई। इस अड़ियल घोड़े को मैं सबक सिखाऊंगा।”

प्रताप सख्त होकर बोला, “इसमें इस घोड़े की कोई गलती नहीं है, अचानक कड़की बिजली और महल की भीड़ ने इसे परेशान कर दिया होगा। तुमने देखा ये कितनी सरपट भागता है और तेज़ी से मुड़ता है जैसा इसका अपना ही इंसानी दिमाग हो।”

शक्ति को प्रताप का तर्क अच्छा नहीं लगा, “...पर दादाभाई इसके दिमाग की वजह से मेरी जान जा सकती थी! इसको सज़ा तो मिलनी ही चाहिए।”

कुंवर प्रताप ने हामी भरते हुए कहा, “ठीक है, अगर तुम ऐसा चाहते तो तो ये ही होगा। वापस जाने के बाद इसे राजमहल के अस्तबल से निकाल देंगे।”

अपनी बात मानी जाने पर शक्ति को कुछ संतोष हुआ। लेकिन खराब मौसम और कड़कती बिजलियों से सिर्फ़ वो घोडा ही नहीं बल्कि जंगल के कई जानवर भी विचलित हुए थे। धरती में कंपन और दूर के शोर को सुन प्रताप को आने वाले खतरे का अंदेशा हो गया था।

उसने घोड़े पर बैठते हुए कहा, “शक्ति, लगता है इस मौसम से हाथियों का झुंड भी बिफर गया है। अब ये घोडा मेरे काबू में है, जल्दी पीछे बैठों।”

लेकिन इतनी देर में ही एक किशोर हाथी शक्ति के बिलकुल पीछे आ चुका था। प्रताप ने जादूगर की तरह घोड़े की कमान घुमाई और घोड़े ने अपनी पूरी लंबाई का इस्तेमाल कर एक अंकुश की तरह झुके हुए हाथी के माथे पर अपने पैर गड़ा दिए। हाथी शांत होकर दूसरी दिशा में चल पड़ा।

प्रताप ने घोड़े पर प्यार से हाथ फिराते हुए कहा, “अरे वाह मित्र, तुम शायद पिछले जन्म में कोई विद्वान रहे होंगे। लेकिन अभी खतरा टला नहीं है।”

प्रताप और वो घोड़ा किसी खेल प्रतियोगिता की तरह मदमस्त हाथियों के बीच से चतुराई से निकल रहे थे। जहाँ किसी और का इतने खतरों से बच के निकल पाना बहुत मुश्किल था वहीं प्रताप कुछ ही देर में महल पहुँच चुके थे।

गुरु वेदांत और कई सैनिक ये देखने दौड़े कि कुंवर प्रताप और कुंवर शक्ति ठीक तो हैं।

घोड़े से उतरकर प्रताप ने घोड़े को अस्तबल के बाहर खड़ा किया और मुस्कुराहट के साथ शक्ति से पूछा,
“कुंवर शक्ति, तो जैसा तय हुआ था क्या वैसा ही करें? इस घोड़े को अस्तबल से निकाल दें?”

शक्ति ने झेंपते हुए ना में सर हिला दिया और दो सैनिकों के साथ अपनी चोट का इलाज करवाने चला गया।

प्रताप घोड़े के पास आकर बोला, “डरो मत मित्र, मैं तुम्हें कहीं नहीं छोड़ने वाला था। तुम तो मुझे पहले ही भा गए थे। बस तुमने ही मेरी मित्रता ज़रा देर में स्वीकार की। लेकिन जब की, तो क्या खूब की!”

घोड़े ने प्रताप के कंधे पर अपना सर रख लिया। प्रताप ने बोलना जारी रखा,

“पता नहीं चलता कि तुम्हारी फुर्ती ज़्यादा तेज़ है या तुम्हारा दिमाग…चेतना से भरे हो तुम। तो आज से तुम्हारा नाम चेतक! कमर कस लो, चेतक। हम आज रात ही मुगलों के गढ़ में जा रहे हैं।
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बड़ों का आशीर्वाद लेकर प्रताप ने चेतक पर कुछ सामग्री बांधी और रात के अँधेरे में एक लंबे सफर पर निकल पड़ा। महारानी जयवंता बाई कमरे के झरोखे से भारत की गौरवगाथा लिखने जा रहे अपने पुत्र को उसके नज़र से गायब होने तक निहारती रहीं।

इधर प्रताप और चेतक तेज़ बारिश को चीरते हुए आगे बढ़ रहे थे। प्रताप के साथ जैसे चेतक में नयी ऊर्जा दौड़ रही थी। एक बिजली में बिदक जाने वाला चेतक अब बादल, बिजली, तेज़ बहाव के बरसाती नालों तक से परेशान नहीं हो रहा था।

प्रताप, अपनी योजना अनुसार सतपुड़ा के जंगलों में पहुँच चुका था। खबर के अनुसार बादशाह अकबर कुछ समय के लिए ग्वालियर में था। प्रताप गुरु वेदांत की सिखाई गई दिशाओं, भारत के जंगलों और पर्वतमालाओं की जानकारी के बल पर अपने लक्ष्य की ओर बढ़ रहा था।

जहाँ उसके पीछे कुछ स्थानीय गुप्तचर या सैनिक लगते वो उन्हें जंगलों की भूल-भुलैया में फंसा देता था। कुछ दिनों में ही प्रताप ग्वालियर में अकबर के महल के पास पहुँच गया था।

उसने अपनी पोटली से गोह प्रजाति की दो छिपकलियां निकाली। किले के बाहर सैनिकों की गतिविधि पर नज़र रखते हुए प्रताप सही मौके के इंतज़ार में था। मुगल दरबार की समयसारिणी के अनुसार वो अकबर का दरबार लगने के समय वहां पहुंचना चाहता था।

तभी किले के पास गश्त कर रहे गुप्तचर सैनिकों की नज़र उसपर पड़ गई। वो लोग उसकी तरफ बढ़ने लगे। प्रताप ने चेतक को वापस जंगल की तरफ मोड़ लिया। कुछ दूर अंदर जाने के बाद प्रताप उन सैनिकों की नज़र से गायब हो गया और इससे पहले वो कुछ कर पाते, वो घोड़ो समेत प्रताप के बिछाए बड़े जाल में फँस गए थे। प्रताप जानबूझकर उनकी नज़रों में आया था। जंगल का ये हिस्सा किले के पास होकर भी वीरान था। प्रताप फिर से किले के पास पहुंचा और उसके इशारे पर रस्सी से बंधी गोह छिपकलियां किले पर चढ़कर चिपक गईं। प्रताप एक झटके में चेतक समेत किले की ऊपरी दीवार पर आ चुका था।

पहरा दे रहे सिपाहियों में शोर मच गया। चेतक प्रताप के साथ दो छलांगों में अकबर के दरबार के बीचोंबीच पहुँच गया था। अचानक एक राजपूत किशोर को सभा के बीच देखकर सब भौचक्के रह गए। किसी को समझ नहीं आ रहा था कि क्या हुआ है। केवल एक इंसान की वजह से अकबर के दरबार में युद्ध जैसा माहौल हो गया था। इस बीच कुछ सैनिक जो प्रताप की तरफ बढे भी उन्हें प्रताप ने आसानी से चित्त कर दिया।

मुग़ल सेनापति शेर खान को ये बात नागवार गुज़री, “खत्म कर दो इस गुस्ताख़ को!”

तभी वहां एक और आवाज़ गूंजी, “रुक जाओ! कोई कुछ नहीं करेगा।”

ये अकबर की आवाज़ थी। बादशाह अकबर का हुक्म मान सभी सैनिक शांत हो गए और प्रताप भी अपनी तरफ किसी हमलावर को न बढ़ते देख रुक गया।

शेर खान दांत पीसते हुए बोला, “मैं इसे जानता हूँ, ये मेवाड़ का शहज़ादा प्रताप है।”

ऐसा पहली बार हुआ था जब कोई राजकुमार इस तरह बादशाह के दरबार में पहुंचा था। सबके लिए प्रताप और चेतक किसी सपने के किरदारों जैसे थे। मुगल सैनिकों के रुक जाने के बाद प्रताप ने भी अपनी तलवार मयान में रख ली थी।

शेर खान के रोकने के बाद भी अकबर अपनी उम्र के प्रताप के सामने खड़ा था। आने वाले भारत की तकदीर लिखने वाले दो योद्धा एक-दूसरे को देख रहे थे।

“क्या मैं इस तरह हमारे दरबार में आने की वजह जान सकता हूँ, शहज़ादे?"

“वजह आप ही हैं!”

दरबार में मौजूद मंत्री, सैनिक मुंह फाड़े प्रताप और अकबर को देख रहे थे।

अकबर ने दिलचस्पी से पूछा, "हमारी वजह से...हमने ऐसा क्या किया?"

प्रताप बोला, "आपने मेवाड़ के राजदूत का अपमान किया, उसकी पिटाई करके उसे गंजा तक कर दिया, और मेवाड़ की सारी शर्तें नामंज़ूर कर दी।"

अकबर ने सोचते हुए कहा, "हमने मेवाड़ की शर्तें ज़रूर नामंज़ूर की थी, लेकिन दूत को कुछ नहीं कहा था। ये किसकी हरकत थी?"

दरबार में नज़र दौड़ाते हुए अकबर को समझ आ गया की ये शेर खान ने किया था। उसने कहा, "शहज़ादे प्रताप, इस बात का हमें दुख है! दोषी को सज़ा मिलेगी। हम राजपूत शौर्य से वाकिफ हैं। मेवाड़ के राजदूत का अपमान हम कभी नहीं कर सकते!"

अकबर के जवाब ने प्रताप को चौंका दिया। उसके मन में जो अकबर की छवि थी वो एक क्रूर शासक की थी जबकि अकबर धैर्य से उसकी बातें सुन रहा था और दूत का अपमान भी उसने नहीं किया था।

शेर खान फिर बोल पड़ा, "बादशाह सलामत, इस हिमाकत के लिए शहज़ादे को कैद कर लीजिये। हो सकता है ये आपको मारने की साजिश हो।"

शेर खान की गंभीर बात पर अकबर के चेहरे पर मुस्कान आ गई, "आपको नहीं लगता शेर खान कि अगर शहज़ादे प्रताप का मकसद हमें मारने का होता तो वो दरबार में आते ही हमें ख़त्म कर देते?" शेर खान के पास इसका जवाब नहीं था।

अकबर ने चुप खड़े प्रताप से कहा, "आपके साथ आई सैनिक टुकड़ी कहाँ ठहरी है, शहज़ादे? हम अपने जासूसों और सैनिकों को बता देंगे कि उन्हें नुक्सान न पहुंचाएं।"

अब मुस्कुराने की बारी प्रताप की थी, "कौनसी टुकड़ी, सम्राट अकबर? मैं मेवाड़ से अकेला आया हूँ...सिर्फ अपने मित्र चेतक के साथ!"

प्रताप की बात से अकबर अचरच में दो कदम पीछे हट गया जैसे वो कोई कुदरत का करिश्मा देख रहा हो।

अकबर चेतक पर हाथ रखता हुआ बोला, "बहुत खूब! राजपूतों की बहादुरी के किस्से हमने सुने ही थे, आज देख भी लिया। कहिये आपको क्या चाहिए?"

प्रताप अकबर की आँखों में देखकर बोला, "मेवाड़ और आस-पास के क्षेत्र पर अफगान और मुग़ल सल्तनत के आक्रमण का खतरा रहता है। इन लड़ाइयों में निर्दोष जनता और कई सैनिकों की बलि चढ़ती है। मैं चाहता हूँ की आप मेवाड़ को मुगल सल्तनत में मिलाने का सपना छोड़ दें। इसमें ही हम सबकी भलाई है। अन्य मामलों को बातचीत से सुलझाया जा सकता है।"

अकबर ने प्रताप की बात पर सोचकर कहा, “शहज़ादे प्रताप, मुगल सल्तनत के लिए, वो जगह व्यापार और सफर के लिए बहुत अहम है। लेकिन आज आपके सम्मान में हम वचन देते हैं कि हम मेवाड़ की ज़मीन पर कदम नहीं रखेंगे। अगर कोई और मुगल झंडे तले मेवाड़ की तरफ आयेगा तो उसे रोकेंगे भी नहीं…”

प्रताप ने अकबर की बात जारी रखते हुए कहा, “....ऐसे किसी भी कदम को रोकने के लिए राणा प्रताप है। लेकिन आपने मेवाड़ राज्य और मेरे पिता महाराज उदय सिंह की बात का सम्मान रखा, इसका मैं आभारी हूँ। आपके कुछ जासूस सैनिकों को मैंने पूर्व दिशा के जंगल में बंदी बनाया था, उन्हें छुड़ा लें।”

अकबर और प्रताप को एक-दूसरे की हिम्मत और उसूल पसंद आ रहे थे। अगर वो दुश्मन राज्यों से ना होते तो शायद बहुत अच्छे दोस्त होते। अकबर का मन प्रताप को मेहमान बनाने का था लेकिन ये मौका ठीक नहीं था। उसने सोचा कि कभी बेहतर स्थिति में वो प्रताप के साथ बैठेगा।

फिर कुंवर प्रताप ने वहां से विदा ली। कुछ देर बात हवा से बातें करते चेतक पर सवार महाराणा प्रताप मेवाड़ का सम्मान वापस लेकर लौट रहा था।

दो दिन बाद मेवाड़ के किले का एक प्रहरी रात के अँधेरे में चिल्लाया।

“कुंवर प्रताप, वापस आ गए!”

इतने दिनों से इंतज़ार में बैठे ऊंघते किले में जैसे जान आ गयी। हर झरोखे से एक नारा गूँज उठा!

“महाराणा प्रताप की जय!”

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Friday, May 25, 2018

सच्चा सैल्यूट (कहानी) #ज़हन


सर्दी का एक शांत दिन। इस मौसम में तापमान और अपराध काफी कम हो गये थे। वार्सा जंगली देहात में नियुक्त हुए नये थानेदार बिमलेश शर्मा ने फाइलों में गुम दीवान से कहा - "इस बार सरकार सख्त है। आप भी कंप्यूटर सीख लो दीवान जी, नहीं तो 60 से पहले रिटायरमेंट पकड़ा देंगे कप्तान साहब।"

"4-5 साल बचे हैं सर। अब दिमाग खपा के क्या करेंगे? जब तक वो ऑडिट-शॉड़िंत करेंगे तब तक वैसे ही रिटायर होने का समय आ जाएगा।"

विमलेश - "अच्छा, थाने के आस-पास ये बुढ़िया कौन घूमती रहती है? इतना मन से सैल्यूट तो सिपाही नहीं मारते जितने मन से वो सैल्यूट करती है।"

दीवान - "अरे वो पागल है सर कुछ भी बड़बड़ाती रहती है। डेढ़ साल से तो मैं ही देख रहा हूँ और सिपाही तो बताते हैं कि मेरे आने से पहले से है। किसी को उसकी बात भी नहीं समझ आती। शायद बच्चा मर गया करके कुछ कहती रहती है। इसके अलावा कोई शब्द कभी, कोई कभी। पता नहीं चलता कि कौन है, कहाँ की है। बोली से यहाँ की तो लगती नहीं। छोड़ो सर, क्यों टाइम ख़राब करना।" 

इस से आगे सवाल करना "सामान्य दुनिया" के लिए बचकाना माना जाता है इसलिए जिज्ञासा होते हुए भी विमलेश चुप हो गया। थाने में जीप से आते जाते हुए बुढ़िया का दिल से किया हुआ सैल्यूट विमलेश का दिल चीर देता था और उन भोली, सच्ची सी आँखों में झाँकने की तो जैसे उसमे हिम्मत ही नहीं थी। नज़रें फेर कर विमलेश ड्राइवर से बात करने या फ़ोन पर व्यस्त होने का नाटक करता। आखिर सिपाहियों और जूनियर अफसरों के सामने उसे खुद को बचकाना थोड़े ही दिखाना था। 

शहर से दूर स्थित इस जंगली क्षेत्र में सरकार और निजी कंपनियों के विस्तार से वन संपदा नष्ट हो रही थी। जंगल की जनजातियों का निवासस्थान और भोजन के स्रोत कम होते जा रहे थे। बड़े शहरों के न्यायालयों में अंट-शंट विस्तारीकरण तोलना आसान है। पहले तो वहाँ पहुँचते-पहुँचते जंगलों की आवाज़ गुम हो जाती है...उसपर बड़े लोगो के पास अपने अनुसार परिष्कृत चिकनी-चुपड़ी भाषा में न्याय की देवी को बरगलाने का पुराना अनुभव है। आदिवासी रोष का फूलता गुब्बारा फोड़ने के लिए एक दुर्घटना काफी थी। दुर्भाग्य से वो बहुत जल्द हो गयी। निर्माणाधीन बांध का हिंसा टूटने से बहे गाँव से आदिवासियों में बहुत गुस्सा भर गया। उन्होंने आस-पास के सरकारी और निजी संस्थानों को घेरकर तोड़फोड़, आगजनी और वहाँ नियुक्त कर्मचारियों को मारना शुरू कर दिया। दंगे जैसी स्थिति में वार्सा थाना भी चपेट में आ गया। थाने के कुछ सिपाही और सीमित संसाधन आदिवासी फ़ौज के सामने पर्याप्त नहीं थे। बाढ़ से अस्त-व्यस्त हुए रास्तों और बाहर से कट चुके वार्सा की भौगोलिक स्थिति के कारण मदद आने में समय लगता। ऊपर से हिंसा बड़े क्षेत्र में फैली थी इसलिए कुछ दिनों तक वहाँ नियुक्त पुलिस बल को खुद ही जूझना था...पर क्या उनके पास कुछ घंटे भी थे या नहीं? 

भीड़ ने थाने के आस-पास आग लगा दी और धीरे-धीरे अपने और ढाई दर्जन पुलिस बल के बीच दूरी कम करने लगे। स्थानीय लोगों और आदिवासी कर्मचारियों को बक्शा जा रहा था बाकी सभी 'शहरी दानवों' को ख़त्म किया जा रहा था। डाकघर, बांध, नरेगा दफ्तर आदि कार्यालयों को पहले ही स्वाहा कर चुके आदिवासीयों का सामना पहली बार बंदूकधारी 'दुश्मन' से था। हवाई फायरिंग बेअसर रही। कुछ सिपाही जंगलों में भागे और कुछ लड़ते हुए मारे गये। पीछे से उड़ती ईंट लगने के बाद विमलेश बेहोश हो गया। बंद होती आँखों को ये एहसास था कि शायद अब वो दोबारा नहीं खुल पायेंगी। 

आँखें दोबारा खुलीं...सूरज की किरणों को रोकता बुढ़िया का मुस्काता चेहरा विमलेश को देख रहा था। जब उसकी आँखें रौशनी के हिसाब से देखने लायक हुई तो बुढ़िया वापस सैल्यूट की मुद्रा में आ गयी। विमलेश को बीते चार दिनों की कुछ बातें याद आ रही थी। इन 4-5 दिनों में बुढ़िया ने झाड़ियों में टिन-प्लास्टिक के सहारे बने अपने छोटे से बसेरे में विमलेश को आदिवासियों की नज़रों से बचा कर रखा था। उस दिन धुएँ, ऊहापोह के बीच बुढ़िया भगदड़ में जगह-जगह से चोटिल, बेहोश थानेदार को खून के प्यासे आदिवासियों के बीच से घसीट लायी थी। बुखार में तपते, कभी होश में आते तो कभी बेसुध होते विमलेश को बुढ़िया अपने गुज़ारे वाला चीनी का पानी और अपने मुँह से चबाये चने खिला रही थी। 

स्थिति अब काबू में थी और अर्धसैनिक बल, आपातकालीन दल क्षेत्र में फ़ैल चुके थे। बूढी अम्मा के सहारे घिसटता हुआ वह किसी तरह अपने स्टेशन तक पहुँचा। विमलेश पागल बुढ़िया को माँ की तरह अपनाकर उसकी देखभाल करने का फैसला कर चुका था। एम्बुलेंस का इंतेज़ार करते स्ट्रेचर पर पड़े विमलेश की नज़रें बूढी अम्मा को ढूँढ रही थीं, जो लोगो की भीड़ में जाने कहाँ गायब हो गयी थी? मन में कुछ आशंका जन्मीं - "कहीं किसी ने उसे दुत्कार कर भगा तो नहीं दिया? भीड़ देखकर वो दूर तो नहीं चली गयी? नहीं-नहीं!" इतने में भीड़ को किनारे करती बुढ़िया विमलेश को पिलाने अपनी चीनी के पानी वाली पन्नी लेकर आयी। झर-झर बहती आँखों से विमलेश स्ट्रेचर पर लड़खड़ा कर खड़ा हुआ...और  बुढ़िया को सैल्यूट करने लगा। 

समाप्त!
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Art - Nikola S.

Thursday, April 5, 2018

रोग में मिला जोग...स्वर्ग में बनी शादी (कहानी) #ज़हन

Artwork - Vinj Gagui

मानसिक रोग विशेषज्ञ डॉक्टर जैना गर्भावस्था में ली कुछ महीनों की छुट्टी के बाद हॉस्पिटल काम पर लौटी थीं। रोज़ के काम के बीच कुछ कागज़ों ने जैना का ध्यान खींचा। शाम तक उन कागज़ों की बात जैना के मन में गोते लगा रही थी। आखिरकार उसने विभाग की नर्स से अपनी शंका का समाधान करना उचित समझा। 

"ये रिटायर्ड मेजर उत्कर्ष और मिस कोमल कैसे गायब हो गये? दोनों की मानसिक हालत दयनीय थी। मुझे तो लगा था...अभी कम से कम मेरे प्रसव के कई महीनों बाद तक इनका इलाज चलेगा।"

नर्स को ज़्यादा जानकारी नहीं थी, उसने इतना ही बताया - "डॉक्टर, उन दोनों ने शादी कर ली। उसके कुछ समय बाद दोनों का ट्रीटमेंट बंद हो गया।"

जवाब में जैना विस्मित सी केवल "क्या!" बोल पायी। 

अब तो इन दोनों में उसकी जिज्ञासा और बढ़ गयी थी। अन्य डॉक्टर एवम कर्मचारियों से संतोषजनक जानकारी ना मिल पाने की वजह से पूरी बात जानने के लिए जैना ने उनके घर जाने का फैसला किया। कोमल सालों तक घरेलु हिंसा की शिकार तलाकशुदा औरत थी और उत्कर्ष पड़ोसी देश से युद्ध की विभीषिका झेल चुका पूर्व-सैनिक था। इतने मानसिक और शारीरिक शोषण के बाद कोमल टूटकर गंभीर अवसाद में रहा करती थी। वहीं उत्कर्ष जंग में खून की नदियों में नहाकर पी.टी.एस.डी. (पोस्ट ट्रॉमेटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर) से पीड़ित होकर अवसाद, घुटन से जूझ रहा था। दोनों के उपचार में जैना ने न जाने कितने जतन किये थे पर उसे अधिक सफलता नहीं मिल पायी थी। अब ऐसा क्या हो गया जो इतने कम वक़्त में ना सिर्फ दोनों ठीक हो गये बल्कि दो से एक हो गये। जैना नवदंपत्ति के घर पहुँची। दोनों ने अपने दुख की घड़ियों के एक पुराने साथी का स्वागत किया। औचारिकताओं के बाद जैना मुद्दे पर आयी। 

"...तो जो काम इतने टाइम मैं और मेरी टीम नहीं कर सकी वो प्यार ने कर दिया? जबसे आप दोनों के बारे में सुना है तबसे ये सवाल परेशान कर रहा है।"

कोमल चहक कर बोली - "हाँ डॉक्टर, प्यार ने भी और नफरत ने भी।"

जैना की उलझन और बढ़ गयी - "नफरत? मैं समझी नहीं। हॉस्पिटल में मानसिक रोगियों को ऐसे नकारात्मक शब्द तो हम लोग बोलने भी नहीं देते थे। तो फिर  इस से इलाज कैसे हो गया?"

उत्कर्ष ने मुस्कान देते हुए समझाया - "डरिये मत, हम दोनों ने आपकी कही हर बात पर अमल किया है। कहते हैं किसी एक बात के लिए प्यार होना...दो लोगो को करीब ला सकता है। जैसे घूमने के शौक में, कला के शौक में या किसी एक विषय के पागलपन में पड़े दो लोग कब एक दूसरे की तरफ आकर्षित हो जाएं पता भी नहीं चलता। हम लोग हॉस्पिटल में मिले और एक चीज़ के लिए दोनों की नफरत हमें पास ले आयी।"

जैना की जिज्ञासा के शांत होते ज्वालामुखी में से आख़री भभका निकला - "कौनसी चीज़?"

उत्कर्ष - "हिंसा!....हिंसा के प्रति हम दोनों का गुस्सा, उस से जन्मी घुटन से दोनों की दुश्मनी में कब हम एक-दूजे का दर्द समझने लगे...और मरहम लगाने लगे पता ही नहीं चला। कुछ ही हफ़्तों में जैसे पूरी ज़िन्दगी का लदा बोझ उतर गया और हम सामान्य जीवन जीने लगे। डॉक्टर, कभी-कभी दो दर्द एक-दूसरे का ध्यान बँटाकर ख़त्म हो जाते हैं। 

समाप्त!
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Saturday, July 15, 2017

झुलसी दुआ (कहानी) #ज़हन


सरकारी नौकरी की तैयारी में कई वर्ष बिताने के बाद सोमेश का चयन अग्निशमन कर्मी पद पर हुआ। जहाँ घरवालों में जोखिम भरी नौकरी को लेकर सवाल और चिंता थी वहीं सोमेश के तो जैसे मन की मुराद पूरी हो गयी थी। बचपन में वो सुपरहीरो बनना चाहता था, फ़िल्मी हीरो नहीं बल्कि लोगो की मदद करने वाला असली हीरो। बड़े होते-होते उसे दुनिया की ज़मीनी सच्चाई पता चली और उसने हीरो बनने का विचार तो छोड़ दिया पर लोगो की मदद करने वाले किसी क्षेत्र में जाने की बात ने उसके बचपन का सुपरहीरो फिर से जगा दिया। समाजसेवा के साथ-साथ जीविका कमाना और क्या चाहिए?

साधारण वेतन और जान के खतरे वाली नौकरी पर असमंजस में पड़े माँ-बाप और बड़ी बहन को किसी तरह मनाकर सोमेश ट्रेनिंग पर निकल गया। फायर फाइटिंग के अभ्यास में सोमेश अपने बैच में सबसे आगे था। उसके पास रहने से उसके साथी जोश, सकारात्मकता से भर जाते थे। सोमेश से पिछड़ने के बाद भी सभी उसे पसंद करते थे। ट्रेनिंग के बाद सोमेश की पहली नियुक्ति दिल्ली में हुई। उसके छोटे कस्बे की तुलना में दिल्ली जैसे पूरी दुनिया था। जहाँ उसे अपनी जगह का आराम पसंद था वहीं महानगर की चुनौती का अपना ही मज़ा था। जब उसने सुना कि दिल्ली के कुछ इलाकों में 1 वर्ग किलोमीटर में 12,000 तक लोग रहते हैं तो किसी छोटे बच्चे की आँखों जैसा अविश्वास भर गया उसमें। गर्मी के मौसम में शहर में ख़ासकर औद्योगिक क्षेत्रों में लगने वाली आग के मामले बढ़ने लगे थे। अपनी शिफ्ट में सोमेश की दमकल वैन रोज़ाना 2-3 जगह जा रही थी, शिफ्ट ख़त्म होने के बाद भी ज़रुरत पड़ने पर सोमेश पास के अपने कमरे से फायर स्टेशन पहुँच जाता था। अपनी ड्यूटी के समय से बाहर या अधिक काम करना उसके लिए इतना सामान्य हो गया था कि उसके सीनियर अधिकारीयों, सहकर्मियों ने यह बात नोट करनी तक बंद कर दी थी। उसके दोस्त हँसते थे कि दुनिया में सबसे पॉजिटिव इंसान सोमेश है, इतना ज़िंदादिल तो फिल्मों के हीरो तक नहीं होते। सोमेश वापस उन्हें कहता कि वो सब भी आशावान बनें, हमेशा अच्छा सोचें, अपने भगवान या उपरवाले पर भरोसा रखें क्योकि जिस भी जगह पर वह गया वहाँ लोग आग, भूकम्प आदि से घायल तो हुए पर किसी की जान नहीं गयी। 

उसकी दिनभर की थकान नींद से कम बल्कि घरवालों से घंटे-आधा घंटे बातें कर ज़्यादा ख़त्म होती थी। अक्सर उसने कितने लोगो को कैसे बचाया, कैसे बीमारी में भी स्टेशन आने वालो में सबसे पहला वो था, कैसे घायल पीड़ित के परिजन उस से लिपट गए, कैसे ट्रैफिक में कुछ देर हो जाने पर उनपर भीड़ ने पत्थर बरसाए या उनकी पिटाई तक की। 

"माँ! आज आप मानोगी नहीं। सीढ़ी पर से झूलकर बिल्डिंग से गिरता हुआ बच्चा पकड़ा मैंने, पूरे मोहल्ले ने आशीर्वाद दिया मुझे। कोई कपडे दे रहा था, कोई वैन में घर पर बनाई मिठाई ज़बरदस्ती रख गया। बच्चे की माँ तो अपना सोने का कड़ा उतार कर दे रही थी पर मैंने लिया नहीं। उसे देख कर आपकी याद आ गयी।"

माँ का मन करता था कि सोमेश बस बोलता रहे। उसकी आवाज़ में जो ख़ुशी झलकती थी वो ही माँ के लिए सबसे बड़ी दौलत थी। 

"....फिर ना माँ ओखला में तुरंत दूसरी जगह जाना पड़ा। हम लोगो की गाडी ख़राब हो गई और पहुँचते-पहुँचते लेट हो गए। भीड़ ने घेर लिया और गुस्से में एक आंटी ने संजय के चप्पल बजा दी, बाकी लोग वैन की तरफ बढ़ने लगे तो मैंने माइक से समझाया कि देर हो गयी पर जो लोग फँसे हैं उन्हें बचा लेने दो फिर पीट लेना। राधे-कृष्ण की जो कृपा रही किसी को ज़्यादा चोट तक नहीं आई, सारे लोग बचा लिए।"

माँ बोली - "अपना ध्यान रखा कर। बेटा हर जगह ऐसे मत बढ़ा कर, कहीं लोग ना सुने... "

सोमेश ने माँ को दिलासा दिया - "माँ भगवान आपकी और मेरी हर बात सुनते हैं। इतने महीने हो गए यहाँ मेरे सामने कोई नहीं मरा, ना मुझे कुछ हुआ। कुछेक  बार जलती बिल्डिंग, भूकंप से तहस-नहस घरों में फँसे लोग देखकर जब सबने उम्मीद छोड़ दी तब भगवान से माँगा बस बचा लो आपका सहारा है। जाने कैसे सबको बचा लाये हम लोग। तुम्हारे साथ-साथ दर्जनों लोगो का आशीर्वाद बटोरता हूँ रोज़। सब अच्छा होगा माँ, तुम चिंता मत किया करो।"

सोमेश पर भगवान की कृपा बनी रही और उसकी नौकरी का एक साल पूरा हुआ। एक दिन उसे शहर के बाहरी इलाके में स्थित अपार्टमेंट में लगी आग के मौके पर भेजा गया। अपार्टमेंट के आग के लिए पहले ही कुछ फायर वैन पहुँच चुकी थी पर भीषण आग बिल्डिंग से आस-पास मज़दूरों की बस्तियों में फ़ैल गयी थी। दूर-दराज़ के इलाके और तंग गलियों के कारण लोगो को बचाने में मुश्किलें आ रहीं थी। एक-एक सेकण्ड से लड़ते हुए दमकल कर्मियों के कुछ दल अलग-अलग स्थानों पर फ़ैल गए। सोमेश भगवान का नाम लेता हुआ बस्ती के अंदरूनी हिस्से में फँसे लोगो को बचाने लगा। कुछ देर में स्थिति काबू में आई पर घायलों के लिए इन अंदरूनी इलाकों तक एम्बुलेंस, अन्य मदद आने में काफी समय लगना। 

तभी सोमेश की नज़र एक औरत के निर्जीव शरीर के पास खड़े 2 दमकलकर्मियों पर पड़ी। वो दोनों बहस कर रहे थे कि क्या यह औरत ज़िंदा है या नहीं। तेज़ धड़कनों के साथ जब सोमेश पास पहुँचा उसे एक पूरी तरह जल चुकी गर्भवती महिला दिखी। उस महिला ने किसी तरह हाथ की ज़रा सी हरकत से जैसे बहस कर रहे बचावकर्मियों को बताया कि अभी उसमे जान थी। तारकोल की तरह चौथी डिग्री के जले के निशानों के साथ उसका मांस जगह-जगह से उतर रहा था और चेहरे की जगह एक अधभुने मांस का चिथड़ा दिख रहा था। उसका एक हाथ पेट से जलकर पेट से चिपका हुआ था, शायद जलते हुए भी वो अपने बच्चे को दिलासा दे रही थी कि सब ठीक हो जाएगा। दर्द में उसका शरीर हल्की फड़कन कर रहा था। सोमेश ने उसको पानी पिलाने की कोशिश की पर पानी की बूंदों के मांस से छूने से भी वो दर्द से और तेज़ हिलने लगी। सोमेश को विश्वास ही नहीं हो रहा था कि उसके साथ ऐसा कुछ हो सकता है। उसके साथ तो अंत में तो सब ठीक हो जाता था। एक सहकर्मी ने बताया कि इस औरत का पूरा परिवार मर चुका है। मदद आने में अभी बहुत समय था और पीड़ित औरत की हालत इतनी ख़राब थी कि सोमेश खुद को उस औरत के बचने की ज़रा सी उम्मीद का दिलासा तक नहीं दे सकता था। बेनाम औरत का दर्द सोमेश से देखा नहीं जा रहा था, नम आँखों से वह घुटनो के बल उसके पास बैठ गया। उसके हाथ बार-बार औरत की तरफ बढ़ते और उसे दर्द ना हो तो शरीर को छूने से पहले ही रुक जाते। 

हमेशा हँसमुख, आशावादी रहने वाला, आज जीवन में पहली बार हार मान चुका सोमेश ऊपर देखते हुए रुंधे गले से बोला -  "भगवान बहुत दर्द सह लिया इसने, प्लीज़ इस औरत को मार दो भगवान। इसे अपने पास बुला लो...प्लीज़ इसे मार दो..."

शायद भगवान ने उसकी पुकार सुन ली थी। उस औरत की नब्ज़ चली गई और साँसों का उतार-चढ़ाव भी बंद हो गया। भारी मन से सोमेश बस्ती के अन्य हिस्सों की तरफ बढ़ गया। 

समाप्त!
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Artwork - Alok Pawar
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