Freelance Falcon ~ Weird Jhola-Chhap thing ~ ज़हन

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Friday, April 28, 2017

तेज़ाबी आँखें (कहानी) #ज़हन

**Warning: Contains Strong Language**

पिछले कुछ समय से सीतापुर स्थित एक स्वयंसेवी संस्था के संचालक अनिक कृष्णन देश और दुनिया की सुर्ख़ियों में छाये थे। एकतरफा प्यार और खुन्दक की वजह से हुए एसिड अटैक के बाद अपनी सूरत की रौनक खो चुकी लड़की रिद्धिमा की सीरत पर अनिक मोहित हो चुके थे। प्रेम परवान चढ़ने पर अनिक ने समाज से दुत्कारी गयी रिद्धिमा को अपने घर और मन में आसरा दिया। अब यह जोड़ा लिव-इन सम्बन्ध में साथ खुश था। किसी स्थानीय पत्रिका द्वारा खबर पकडे जाने पर जैसे गंध लेते हुए अनिक के पास मीडिया का जमावड़ा लगने लगा। हर किसी को अनिक से एक्सक्लूसिव बाईट चाहिए थी, सभी को उसके मन में झांकना था कि दुनिया के घूमने की उलटी दिशा में घूमना कैसा होता है। ऐसे ही एक विदेशी न्यूज़ चैनल के इंटरव्यू में सहजता से अनिक ने अपनी बात का समापन किया...

"...हम सब बाहरी आवरण के पीछे पागल हुए बैठे हैं जबकि आपका, मेरा और सबका जीवन तो अंदरूनी व्यक्तित्व पर टिका है। लोग पूछते हैं कि रिद्धिमा ही क्यों? उसमे ऐसा क्या ख़ास है? अरे झाँकने की हिम्मत तो करो...उस शरीर के 5-7 प्रतिशत जले-खुरदुरे हिस्से की परत के अलावा उसमे पूरी दुनिया समायी है। मेरे लिए रिद्धिमा दुनिया की सबसे सुन्दर लड़की है। जिसे उसकी 'कमी' जितनी बड़ी लगती है, उसके अंदर उतना ही ज़्यादा खोखलापन है।"

झंकझोर देने वाले शब्दों के बाद इंटरव्यू ले रहे अनुभवी एंकर के भी हाथ कांपने लगे और कमरे में उपस्थित सभी लोगो के रोंगटे खड़े हो गये। अनिक को तसल्ली हुई कि यह इंटरव्यू भी अच्छा निकला और उसकी बात प्रभावी ढंग से अधिक लोगो तक पहुँचेगी। 

घर आकर वह एक महिला के साथ बैठकर बातें करने लगा। रिद्धिमा उन दोनों के लिए खाना लेकर आयी और नज़रे बचा कर कमरे से चली गयी। कुछ देर बाद अनिक ने कमरे का दरवाज़ा बंद कर लिया। बंद कमरे में क्या होता था रिद्धिमा को पता था पर उसे दुनिया से अपना चेहरा और अनिक से अपनी नज़रे छुपाने की आदत पड़ चुकी थी। उसके सूट की चुन्नियों पर नाखूनों के कुरेदने से कितने ही पैटर्न बन गये थे। वैसे तो रोज़ का दर्द इतनी टीस नहीं देता पर आज रिद्धिमा के आँसू झर-झर बह रहे थे। 2 साल पहले आज ही के दिन वो अपने 'सच्चे प्यार' से मिली थी, बातें करते हुए बीच-बीच अनिक की भूरी आँखों पर जब पलकों का पर्दा गिरता तो आँखों में न झाँक पाने का मिलीसेकंड का ब्रेक भी रिद्धिमा को परेशान करता रहता। तब अनिक की गहरी आवाज़ और चेहरे में खोई रिद्धिमा अपने चेहरे का पर्दा भूल जाती थी। केवल एक वो ही तो था जो जला चेहरा देखकर अपने चेहरे पर दया, घृणा या परेशानी के भाव नहीं लाता था। अब साथ रहकर बाहरी और अंदरूनी का फर्क वो साफ़ देख सकती थी। कहना, सोचना आसान था कि यह नर्क छोड़ क्यों नहीं देती, पर अब उसमे और संघर्ष की शक्ति नहीं थी। अनाथालय से सामाजिक केंद्र में मौत के इंतज़ार से बेहतर झूठे ही सही अपने प्यार के काम आना। रिद्धिमा के कारण अनिक को देश-दुनिया में शोहरत ही नहीं बल्कि उसकी संस्था को सरकार, विदेशी संस्थाओं द्वारा आर्थिक मदद भी मिल रही थी। हालाँकि, संस्था को मिल रहे पैसे, मदद का अधिकांश हिस्सा अनिक अपने दोस्तों-रिश्तेदारों और अपने शौक पूरे करने में बहा दिया करता था। अक्सर उसे किसी सेमिनार, इवेंट में अथिति के रूप में बुलाया जाता जहाँ ना चाहते हुए भी उसे रिद्धिमा को अपने साथ ले जाना पड़ता। बाहर कहीं भी लोगो से घिरे होने पर अनिक की भूरी आँखों में अपनेआप दिखावटी भोलापन आ जाता था और उनमे फिर से डूबकर रिद्धिमा खुद पर मुस्कुरा देती। अनिक को प्यार से निहारती रिद्धिमा के अनेक फोटो दुनियाभर का दिल पिघला रहे थे। 

रिद्धिमा की कोशिश रहती थी कि अनिक से बचकर वह कुछ पैसे, कपडे आदि ज़रूरतमंद लोगो को दे दिया करे ताकि उसकी वजह से कुछ लोगो को तो राहत मिले। जीते रहने का और आयोजनों में अनिक के साथ चहकते हुए फोटो खिंचवाने की यह एक बड़ी वजह थी। एक दिन रिद्धिमा को पैसे उठाते हुए अनिक ने पकड़ लिया और वो बुरी तरह उसकी पिटाई करने लगा। 

"साली...हरामण शक तो मुझे पहले से था तुझपर आज पकड़ भी लिया। किस चीज़ की कमी है तुझे जो चोरी करती है? तेरे शौक पूरे नहीं होते? यार पाल लिए है तूने? बोल कुत्तिया किस अंधे के साथ रंगरलियां मना रही है? तेरा भी मन करता होगा ना मुझे देख कर? कहाँ जाती है पैसे लेकर, किसको देकर अपनी आग बुझाती है? शक्ल देख अपनी और तसल्ली ना मिले तो किसी छोटे बच्चे को अपना चेहरा दिखा आइयो, डर के मारे वहीं मूत देगा। थू साली हराम की औलाद! मेरे टुकड़ो पर जी रही है ये काफी नहीं है क्या! अभी किसी इवेंट जाने को बोलूंगा तो तबियत ख़राब हो जाती है कमीनी की। पैसा कितने हक़ से उठाती है...जी में आता है तेरा चुड़ैल सा मुँह नोच डालूं! रुक आज तेरी चमड़ी उधेड़ता हूँ।"

लाखों में इक्का-दुक्का कोई रिद्धिमा की तरह होता है जिसे भगवान दर्द सहने के असीम क्षमता देता है। दर्द महसूस ना करना या किसी योगी की तरह अपने ध्यान में दर्द से ध्यान हटा लेना। बेल्ट, चप्पल, हाथ-पैर खाती खूनमखून रिद्धिमा की सिसकियाँ बस सांस लेने का संघर्ष थी, उसे दर्द कहाँ हो रहा था! इतनी हिम्मत कहाँ थी दर्द में? जैसे सात जन्म की पीड़ा इन 5-7 वर्षों में सिमट गयी हो। वो आखरी बार तेज़ाब से जले अपने चेहरे के मवाद में बिलबिलाते कीड़ों को देखकर चीखी थी। उसके बाद तो बस किसी फ़िल्मी दर्शक की तरह वह अपनी कहानी जी और देख रही थी। इतना सब हो जाने के बाद भी वह समझ नहीं  पाती थी कि लोग इतने बुरे कैसे हो सकते हैं?

तीन दिन बाद  दिल्ली में आयोजित सेमिनार जब पत्रकारों के उसकी चोटों का कारण पूछा तो वह बोली - "अपनी लापरवाही में मेरी स्कूटी का एक्सीडेंट हो गया, वो तो वक़्त रहते अनिक ने मुझे बचा लिया। चेहरे के दूसरे हिस्से पर पड़े निशानों की वजह से उन्होंने 3 दिन से ठीक से खाना भी नहीं खाया है।"

स्क्रिप्ट पूरी करने के लिए रिद्धिमा अलग खड़ी हो गयी और अनिक मीडिया के सामने अपनी फिलॉसफी की बीन बजाने लगा। इधर आदत से मजबूर रिद्धिमा अनिक की आँखों में खोकर मुस्कुराने लगी...तेज़ाब फेंकती, झूठी लेकिन भूरी आँखें!

समाप्त!
#mohitness #mohit_trendster #मोहित_शर्मा_ज़हन

Saturday, April 8, 2017

टीनएज ट्रकवाली (कहानी) #ज़हन


थाने में बैठा कमलू सिपाहियों, पत्रकारों और कुछ लोगो की भीड़ लगने का इंतज़ार कर रहा था ताकि अपनी कहानी ज़्यादा से ज़्यादा लोगो को सुना सके। पुलिस के बारे में उसने काफी उल्टा-सुल्टा सुन रखा था तो मन के दिलासे के लिए कुछ देर रुकना बेहतर समझा। 

"हज़ारो किलोमीटर लम्बा सफर करते हैं हम ट्रक वाले साहब! एक बार में पूरा देश नाप देते हैं। जगह-जगह रुकता हूँ, सब जानते हैं मुझे। आपके थाने में 4 ढाबे पड़ते हैं पर रात में केवल एक खुला मिलता है तो अक्सर यहाँ रुकना होता है। एक बार उसके अगले पेट्रोल पंप के बाहर बैठी एक लड़की देखी, यहाँ की नहीं लग रही थी और पता नहीं रात को वहाँ क्या कर रही थी...या शायद मुझे पता था पर मैं मानना नहीं चाहता था। अगली बार जब आया तो वह लड़की मरी आँखों वाली एक औरत  बन गई थी। सोचा 'काश उस दिन रुक जाता! पर रुककर, कर भी क्या लेता...रुक के देख तो ले पगले...शायद कुछ हो जाए।' लोगो और पुलिस की नज़रों से बचने के लिए पेट्रोल पंप वाला धंधे पर एक-दो लड़कियाँ ही रखता था, जब किसी की नज़र पड़ती भी थी तो उसपर पैसे डाल दिया करता। पहले आप लोगो को बताया तो मुझे बाहर से ही भगा दिया फिर अपने जमा रुपयों से ये लड़की खरीदी और हेल्पर हटाकर इसे रख लिया। कुछ हफ्तों बाद यहाँ से जाते हुए एक लड़की दिखी, आदत ऐसे थोड़े ही जाती है। मैंने पंप के मालिक को समझाने की बहुत कोशिश की पर वो नहीं माना, उल्टा मुझे बेची लड़की ज़बरदस्ती वापस लेने की बात करने लगा। किसी तरह वो लड़की भी खरीदी, अब मेरी 2 हेल्पर हो गयीं। फिर महीनेभर बाद के चक्कर में एक और...मैंने कह-कहा के अपने एक दोस्त की शादी उस से करवा दी। जब अगले चक्कर में नई लड़की खड़ी दिखी तो रहा नहीं गया। मोड़ दिया ट्रक पेट्रोल पम्प की ओर और कुचल दिए उसके मालिक और 3 नौकर। फिर एक्सिलरेटर दबा के कूद गया बाहर, ट्रक लड़ा पेट्रोल टंकी में और ब्लास्ट हो गया।"

एक पत्रकार ने पूछा, "यह सही रास्ता नहीं है....तुम्हारे पागलपन में 2 निर्दोष लोग मारे गए और कुछ घायल हुए उनका क्या?"

कमलू मुस्कुराकर बोला - "उनका कुछ नहीं....जैसे रोज़ सबके सामने बिकती इन लड़कियों का कुछ नहीं। सही रास्ते पर चलकर देख लिया बाबू! कहीं नहीं जाता, बस गोल-गोल घुमाते हो तुम लोग और आदमी थक-हार कर लड़ाई छोड़ देता है।"

वह पत्रकार साथी पत्रकारों के सामने अपनी इतनी आसान चेक-मेट कैसे मान लेता, "अब इन लड़कियों का क्या होगा? इतनी ही फ़िक्र थी इनकी तो यह काम करने से पहले इनका तो सोचा होता।"

कमलू - "बाकी 15-16 की हैं पर इनमे एक 19 साल की है, उसको थोड़ा सिखाया है और लाइसेंस दिलवा दिए हैं। अभी छोटे रुट पर ट्रक चलाएगी बाकियों को बैठाकर।"

पत्रकार - "लाइसेंस दिलवा दिए हैं मतलब ट्रक के अलावा और क्या चलाएगी?"

कमलू - "ज़रुरत पड़ने पर बंदूक भी चलाएगी...."

समाप्त!

#मोहित_शर्मा_ज़हन #mohit_trendster
Read Kaash mey Dabi Aah (Story)

Wednesday, February 22, 2017

स्लीपर क्लास पत्नी, फर्स्ट ए.सी. पति (कहानी)


कुंठा अगर लंबे समय तक मन में रहे तो एक विकार बन जाती है। कुंठित व्यक्ति यूँ ही गढ़ी बातों को बिना कारण विकराल रूप दे डालता है। कुछ ऐसा ही हाल विकल को अपने मित्र और बिज़नस पार्टनर चरणप्रीत का लग रहा था। एक बार व्यापार से जुड़े मामले में दोनों मित्र कार से दूसरे शहर जा रहे थे। सफर 6-7 घंटे का था और एक-डेढ़ घंटो में ही दोनों कार के स्टीरियो में पड़ी एकमात्र सीडी के गानो से ऊब गए थे। चरणप्रीत ने रेडियो ट्यून करने की कोशिश की पर बड़ी खरखराहट के साथ आ रही आवाज़ सुनकर उसने रेडियो बंद कर दिया। फिर समय काटने के लिए और जगे रहने के लिए विकल और चरणप्रीत बातें करने लगे। वैसे समय तो दोपहर का था पर चरणप्रीत को इतनी लंबी ड्राइविंग की आदत नहीं थी। 

एक बात से दूसरी बात निकली और चरणप्रीत के घर की बात होने लगी। विकल ने कुछ हिम्मत जुटा कर कहा। 
"भाई! बुरा मत मानना पर भाभी को लेकर तेरी एक आदत नोट की है।"

चरणप्रीत चौंका कि आखिर उसके जीवन की ऐसी कौनसी बात दिख गई विकल को, उत्सुकतावश तुरंत ही वह बोल पड़ा -
"पहले बात बता फिर सोचूंगा कि उसपर बुरा मानना है या नहीं...अरे मज़ाक कर रहा हूँ! तू तो अपना याडी है, तेरी बात का बुरा मानूँगा तो फिर हो लिया काम।"

विकल - "मैंने देखा है तू भाभी के साथ पराया सा बर्ताव करता है। जैसे खुद तू पर्सनल ट्रिप, बिज़नस ट्रिप में प्लेन से जाता है पर पिछले महीने और उस से पहले भी मैंने देखा कि तूने भाभी को ट्रेन में मुम्बई से उनके घर मैनपुरी भेजा। अपने जन्मदिन पर ऑफिस के चपरासी तक को तूने होटल में पार्टी दी थी और अपने घर तू किशन चाइनीज कार्नर से सस्ता खाना पैक करवाकर ले गया था। ये तो वो कुछ बातें जो मुझे याद आ रहीं है ऐसे छोटा-मोटा कुछ न कुछ दिखता है तेरा..."

चरणप्रीत ने गहरी सांस ली और बोला। "थैंक यू भाई, मुझे लगा यह बोझ हमेशा दिल में ही रह जाएगा। अच्छा लगा तूने इतना ध्यान दिया। कभी कोई सीरियल, एड या किताब में देखना अरेंज मैरिज केवल लड़कियों की समस्या की तरह दिखाई जाती है...जैसे हम लड़को को तो सब मनमुताबिक मिल जाता है, कोई समझौता नहीं करना पड़ता। जब मेरी शादी हुई तब मैं तैयार नहीं था पर घरवालो को समझाना मुश्किल हो रहा था। मैं कुछ समय और बिना ज़िम्मेदारी के पढ़ना चाहता था, कुछ बेहतर करना चाहता था पर किसी को मेरी बात समझ नहीं आयी? तो मेरी औकात के हिसाब से शादी हो गई। जैसे मान ले मैं तब रेलवे का 'स्लीपर क्लास' डब्बा था और मेरी औकात के अनुसार एक 'स्लीपर क्लास' टाइप लड़की से मेरी शादी हुई। समय के साथ धूप में खाल जलाकर, धुएं से धुँधले हुए शहर में अपने फेफड़े ख़राब कर, बीमारियां पालकर मैंने बिज़नस बनाया और आज मैं स्लीपर क्लास की औकात से ऊपर आकर 'फर्स्ट क्लास ए.सी.' डब्बा बन गया पर मेरी पत्नी तो स्लीपर क्लास ही रही ना, जब उसने स्लीपर का टिकेट लेकर मुझसे शादी की तो उसे किसलिए मैं फर्स्ट ए.सी. में सफर कराऊँ?"

विकल - "हाँ तेरे साथ गलत हुआ। लाइफ इज नॉट फेयर, पर यार जीवन में कदम-कदम पर हर किसी के साथ गलत होता है। तू समाज का बदला अपनी जीवनसंगिनी से क्यों ले रहा है? भाभी तो बेचारी कभी शिकायत नहीं करती, नहीं तो कोई और होती तो तू शायद चैन से सो तक नहीं पाता। यह कोई खेल थोड़े ही है कि जीवन में तेरे विरुद्ध कुछ पॉइंट्स हुए तो तू अपनी शर्तो पर जीवन से बदला लेकर उसके विरुद्ध पॉइंट्स बनाएगा। अपनों को बेवजह दुश्मन मत बना, कुंठा के पर्दे हटाकर एक बार उनकी आँखों का समर्पण, प्रेम देखना वो तुझसे शादी करते समय भी फर्स्ट ए.सी. था और अब भी!"

विकल की बातों से चरणप्रीत की आँखें नम होने को थी इसलिए उसने बहाने से अपना मुँह फेर लिया।

समाप्त!

- मोहित शर्मा ज़हन

Tuesday, January 7, 2014

Postpartum Health (India) Book by Mohit Sharma & Shanu Sharma


Postpartum Reproductive Health (India) - A Sociological study on postpartum health and related issues (North Indian Women).
ISBN - 9781310602597

Pages - 116
Area of Study – Saharanpur, Uttar Pradesh.
*) – Smashwords 
*) – Readwhere
*) – Drive 
*) – SCRIBD
*) – Mediafire 
*) – ISSUU
*) – Slideshare
*) – Docstoc
*) – 4Shared 
*) – PDF Archive
*) – SPB 
Also available on Pothi, Myebook, Ebook3000 & allied networks.
- Mohit Sharma (Trendster) & Shanu Sharma
Cover Art – Jyoti Singh
 in Saharanpur.