Freelance Falcon ~ Weird Jhola-Chhap thing ~ ज़हन

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Saturday, August 15, 2026

Two Stories, Two Very Different Worlds

 Towards the end of my journey at Pocket FM, I had the opportunity to work on a couple of experimental shows that explored very different storytelling directions. One was a spin-off of Super Yoddha, centred around Vidur, one of the show’s biggest supporting characters. 

Pyaar, Paap Aur Power story plot - Betrayed and murdered by his wife and best friend for his revolutionary "Immortality Research," billionaire medical genius Dr. Rudra Singhania awakens one year later in Kolkata reincarnated inside the body of an abusive, debt-ridden street thug. Armed with divine powers granted by the Nav Durga and his peerless medical knowledge, he dominates the city's ruthless underworld, fiercely protects his traumatized new wife Amrita from deadly syndicate debts, and wages a covert, high-stakes war of vengeance against the powerful corporate elites who orchestrated his death.

Working on these projects was a refreshing change and a valuable creative experience. I really enjoyed being part of them.

Saturday, September 13, 2025

Not Every Show Wins, But Every Show Matters

 Not every story is a hit, but every effort teaches us something useful. Maharana Pratap, Mission Zombie, Pakshiraj, Shaadi Ya Sale, The Sword God, and Veer Warrior etc may not have gotten as many views as some of our other shows, but making them was just as important.

 The team spent countless hours behind the scenes coming up with new ideas, rewriting scenes, polishing dialogues, and brainstorming.We tried to match the dialects of our characters to the regions they lived in, we tried out character arcs that were out of the ordinary, and we took risks with formats that weren't always easy to pull off.  These shows taught us how to be strong, how important small things are, and how brave it is to keep coming up with new ideas.

 The process was still worthwhile, even though the results were mixed. It made us feel good, showed us what listeners like, and reminded us that being creative is just as much about trying new things as it is about succeeding.

 We appreciate every writer, editor, and performer who worked on these projects with all their heart.  These trips make me even more sure that every experiment, even the ones that don't work out, brings us one step closer to being better storytellers.


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Thursday, September 11, 2025

Beyond Numbers: Celebrating Creativity and Team Spirit

 

In the last few years, some of our audio shows have reached amazing heights.From Chanakya's wise words to Super Yoddha's epic adventures, Vashikaran's thrilling suspense, Insaani Dragon and Veer Warrior's fantasy worlds, Sherdil's heartfelt grit, and Zero to Hero's rise to fame, each story touched the hearts of millions.

 The numbers speak for themselves, but it's also the love from our fans and the hard work of our whole team that made this happen. Everyone who worked on these projects turned ideas into things that people connected with every day.

 This journey has been about more than just plays and ratings; it's been about working together, being creative, and trusting each other. Each milestone is a reminder that when we work together, we make something that lasts.

 Thank you so much to everyone on the team for putting their heart and soul into every script, sound, and episode.  And thanks to our listeners for letting these stories into your lives.

 Here's to more stories, more milestones, and more memories to come.


Further updates related to this will be shared shortly...
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Tuesday, August 13, 2024

कुछ शामें गुज़रती नहीं...


कुछ लंबी शामें सिरहाने पड़ी...
बीतने का नाम न ले रहीं।
कुछ दबी शिकायतें अनकही,
कुछ रूठी सदाएँ अनसुनी।

एक दुनिया को कहते थे सगी,
हमारे मखौल से उसकी महफ़िलें सजने लगी। 

ज़ख्म रिसते हैं,
मर्ज़ की बात नहीं....
सब तो मालूम है,
पर कुछ हाथ नहीं!

जवाब तैयार रखे थे,
सवालों की बिसात नहीं।
इतने सपनों को ठगने वाली...
इस रात की सुबह नहीं।

खैर. .फिर कभी ये दौर याद करेंगे,
गुमसुम हालातों से बात करेंगे...
कभी चलना सिखाया था दुनिया को. ..
फिर कभी इसकी रफ़्तार में साथ चलेंगे।

जय हिंद!

#ज़हन

Monday, February 13, 2023

भय-कथा संकलन प्रतियोगिता (2022-23) - साहित्य विमर्श प्रकाशन

 

हॉरर कथा संकलन का परिणाम कल साहित्य विमर्श प्रकाशन द्वारा सार्वजनिक किया गया। सभी विजेताओं के साथ-साथ ऐसे अनोखे आईडिया को मूर्त रूप देने के लिए प्रकाशन को बधाई!


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Saturday, May 14, 2022

Readers with Books - Colorblind Balam and Kuch Meter par Zindagi

Mr. Pranav Shashank

Few pics, selfies with books sent by readers and friends. Not including majority of non-selfie-only-books photos. Kindly send your pics, selfies with my books here - letsmohit@gmail.com

Mr. Adamya Amogh, Mr. Seemant Sharma, Mr. Kapil Chandak, Mr. Ashutosh Kaushik

Mr. Abhiraj Thakur, Mr. Manish Tewari and a kind gentleman.

PC - Mr. Nitin Swaroop

PC - Pradyumndev Jodha

Mr. Vikas Nainwal @ekbookjournal

Thank you, everyone!

'कलरब्लाइंड बालम' और 'कुछ मीटर पर ज़िन्दगी' को अपना प्यार देने के लिए बहुत आभार! आशा है आगे भी आप सबका का साथ मिलता रहेगा।

Monday, December 13, 2021

सरकारी संन्यास (हास्य व्यंग)

 

[नोट - यह एक हास्य कहानी है, इसका उद्देश्य किसी की भावनाओं को ठेस पहुंचाना नहीं है। (स्वयं लेखक कई प्रतियोगी परीक्षाओं में असफल हो चुके हैं।)]

आज संवाददाता विकास, झेलम कस्बे की बड़ी खबर को कवर करने आए थे।

रिपोर्टर विकास - " आज झेलम कस्बे के सेलिब्रिटी, श्री डफली कश्यप जी ने 34 साल की उम्र में अपने साढ़े 13 साल के प्रतियोगी परीक्षा के करियर से सन्यास की घोषणा की। डेढ़ साल पहले ही डफली जी ने अपने कस्बे और आस-पास के गाँवों में सबसे ज़्यादा प्रतियोगी परीक्षाओं में बैठने का रिकॉर्ड बनाया था। उनके संन्यास लेने के बयान से उनके परिजनों और दोस्तों में खुशी की लहर दौड़ गई है और उनकी सरकारी नौकरी की आस लगाए बैठी उनकी गर्लफ़्रेंड भी दूसरे बैकअप प्रेमी की और दौड़ गई है। आइए डफली जी से जानते हैं कि कब और कैसे उनकी ऐसी डफली बजी..."

रिपोर्टर विकास - आप अब तक कितनी प्रतियोगी परीक्षाओं में हिस्सा ले चुके हैं?
डफली - मैं 197 बार अलग-अलग भर्तियों के लिए लिखित परीक्षाओं में बैठ चुका हूं।

रिपोर्टर विकास - ओह! बेहतरीन! तो क्या आपके मन में नहीं आया कि दोहरे शतक का जादुई आंकड़ा छुआ जाए?
डफली - हा-हा...अब 99 के फेर में जितना घुसा जाए, उतना कम है। ऐसे तो मेरे दो-चार सीनियर ने 300 का आंकड़ा पार करने के बाद संन्यास लिया था। हां, मैंने करीब 250 फ़ॉर्म भरे होंगे। यह संख्या देखकर लगता है कि मैं दोहरा शतक आसानी से मार सकता था।

रिपोर्टर विकास - तो कहाँ चूक रह गई?
डफली - दरअसल, लगभग सभी प्रतियोगी परीक्षाएं रविवार के दिन होती हैं, इस वजह से कभी-कभी ऐसा हुआ कि एक ही दिन दो परीक्षा पड़ गईं। इसके अलावा कभी अपने आलस्य और लापरवाही, तो कभी परीक्षास्थल बहुत दूर के शहर होने की वजह से कुछ परीक्षाएं नहीं दे पाया।

रिपोर्टर विकास - तेरह साल से ज़्यादा के करियर में अपनी सबसे बड़ी उपलब्धि क्या मानते हैं?
डफली - देखिए, सरकारी नौकरी में चयन होने या न होने के अलावा एक और उपलब्धि होती है जो सालों तक तैयारी करने वाला हर अभ्यर्थी बताता है, लेकिन यह बहुत कम के हिस्से आती है। ज़्यादातर लोग इस बारे में गप्प मारते हैं। वह उपलब्धि है, परीक्षा या साक्षात्कार में चयन होने से सिर्फ़ एक नंबर से रह जाना। मेरा सौभाग्य है कि आम लोगों का गप्प...ऐसा मेरे तैयारी के करियर में एक नहीं दो बार हुआ। पहला शुरुआती दौर में जब मैं 22-23 साल का था, तो बैंक मैनेजर की लिखित परीक्षा में कट ऑफ़ से 1 अंक कम आया। यह परिणाम देखकर सिर्फ़ मैं ही नहीं, मेरा परिवार और दोस्त भी आश्वस्त हुए कि कोई न कोई सरकारी नौकरी मेरे हिस्से ज़रूर आएगी। दूसरा तीन साल पहले बीमा क्लर्क की परीक्षा में ऐसा हुआ था।

रिपोर्टर विकास - ...और सबसे खराब प्रदर्शन कब रहा?
डफली - दो बार, एक बार हवा में दी गई परीक्षा में 150 में से 17 सवाल सही हुए थे और एक बार मुझसे ओएमआर शीट का क्रम गड़बड़ा गया था, तो 120 में से 9 अंक आए होंगे।

रिपोर्टर विकास - आपके प्रदर्शन पर और किन बातों का असर पड़ा?
डफली - जिओ मोबाइल क्रांति का मेरे जैसे करोड़ों युवाओं पर भारी असर पड़ा। सभी कंपनियों ने अपने डेटा और कॉल प्लान सस्ते कर दिए। बस उसके बाद तो गर्ल फ्रेंड से बात करने और दिन में 36 तरीके के ठुमके देखने में ही साल बीत गए। अब बेरोज़गारों को कोई दिनभर का काम मिलेगा, तो वो तो करेंगे ही न? पहले कहाँ सिर्फ़ फ़ोन पर बात करना ही खर्चीला शौक था। कुछ छोटी वजहें भी रहीं, लेकिन उनकी क्या बात करना....

रिपोर्टर विकास - अब बात छिड़ी ही है तो कर लीजिए।
डफली - छोटी मतलब एक परीक्षा पर असर डालने वाली। जैसे, कभी एग्ज़ाम के दिन तेज़ बारिश, बुखार होना या कभी तो खड़ूस परीक्षक द्वारा सू-सू जाने की अनुमति न देना। दो बार सू-सू रोकने के दबाव में आसान पेपर होते हुए भी अच्छे अंक नहीं आए। एक दफ़े तेज़ पहुंचने के चक्कर में टेबल का कोना पेट में लग गया बस पूरा पेपर अपने गुलगुले पेट तो थपथपाता रहा। वैसे 'सेक्सी लेडीज़ इन दी एग्ज़ाम सेंटर' को नक़ल कराने के चक्कर में भी कभी-कभी पेपर छूटे। हालांकि, बाद में न पेपर रहा, न ही वो लेडीज़।

रिपोर्टर विकास - इस दौरान आप कितने साक्षात्कारों वाले चरण तक पहुंचे?
डफली - हर लिखित परीक्षा के साथ साक्षात्कार नहीं होता, कई बार तो लिखित परीक्षा के साथ शैक्षिक डिग्रीयों के अंक जोड़े जाते हैं। फिर में मैंने करीब 2 दर्जन से ज़्यादा साक्षात्कार दिए। सरकारी नौकरी में सालों से सोए कुछ थकेले चेहरे देखने के अलावा इन इंटरव्यू में कुछ खास अनुभव नहीं रहा।

रिपोर्टर विकास - आपको नहीं लगता कि तैयारी करियर के शुरुआती दौर में 1 नंबर से रह जाने से जो लालच की लॉलीपॉप आपने चूसी वह कब की खत्म होने के बाद भी चूसी जाती रही।
डफली - निसंदेह! आपने कैसे जाना?


रिपोर्टर विकास - अरे, हम खुद भुक्तभोगी हैं। वैसे इस दौरान आपने कितने पैसों में आग लगाई?
डफली - जी, फ़ॉर्म भरने का पैसा, परीक्षा केंद्र जाना, कई बार दूसरे शहर ठहरना, कोचिंग, किताबें, नोट्स, प्रिंट आउट फलाने का कोई हिसाब नहीं। इस चक्कर में खैनी-सिगरेट की लत लगी सो अलग। दुनिया तो कहती है कि "टाइम इज़ मनी" और वह तो मैंने थोक के भाव उड़ाया है। फिर भी यह कहा जा सकता है कि मेरे पड़ोसी के पापा ने बारहवीं के बाद उसका ट्रैक्टर का शोरूम खुलवाया था, अगर मैं तैयारी न करता तो आज मेरे पापा के पास ऐसे तीन शोरूम खुलवाने के पैसे होते।

रिपोर्टर विकास - अब आपके पापा किस चीज़ का शोरूम खुलवाएंगे?
डफली - उनके अरमानों और सब्र का शोरूम में उड़ा चुका हूं, अब वे मन में गाली दिए बिना मेरा चेहरा देख लिया करें इतना ही काफ़ी है।

रिपोर्टर विकास - डफली जी, अब आप क्या करेंगे?
डफली - सिस्टम को गाली देंगे, कहीं कोई कुत्ते-गाय-सांड सोते हुए मिलेंगे, तो बिना बात का गुस्सा उन्हें लात मारके निकालेंगे। 8-10 हज़ार महीना वाली कोई एंट्री लेवल प्राइवेट नौकरी करेंगे और सोचेंगे कि यह नौकरी अगर 14 साल पहले शुरू कर देता, तो अभी 80 हज़ार कमा रहा होता और कितना जमा कर लिया होता फलाना ...

रिपोर्टर विकास - क्या कभी आपकी वापसी भी हो सकती है?
डफली - हो तो दुनिया में कुछ भी सकता है। अगर कोई आसान एग्ज़ाम हुआ जिसमें मेरी उम्र के लोग शामिल हो सकते हैं, तो देख लेंगे।

रिपोर्टर विकास - "हमारी टीम आपको सुखद रिटायरमेंट विश करती है, आशा है आप जीवन के अन्य क्षेत्रों में ऐसे ही कीर्तिमान बनाएं।"
डफली - "@#!$%&@"

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#ज़हन

Monday, February 22, 2021

'धन्यवाद' के थोक विक्रेता - लेखक मिथिलेश गुप्ता

लेखक मिथिलेश गुप्ता का रचनात्मक सफर बचपन से ही चालू था। हालांकि, पढ़ाई और फिर नौकरी की वजह से वे अपने कलात्मक शौक जैसे कि लेखन, गायन, नृत्य आदि को ज़्यादा समय नहीं दे पाते थे। आखिरकार, 2015 में उनकी पहली किताब हॉरर थीम वाली "वो भयानक रात" प्रकाशित हुई, जिसका बाद में कॉमिक संस्करण भी आया और साथ ही अगला भाग 11:59 भी प्रकाशित हुआ। उन्होंने 'जस्ट लाइक दैट' और 'तेरी इश्क वाली खुशबू' से रोमांटिक थीम की नब्ज़ पकड़ी। इस बीच कुछ किताबों का संपादन भी किया। 2019 से एक निजी इंटरनेट रेडियो कंपनी में काम कर रहे हैं।

अब उनकी नई किताब 'ऑक्सीजन ऑफ़ लाइफ' प्रकाशित हुई है। इस किताब की ख़ास बात बस यही है कि मिथिलेश, अपनी पहली प्रकाशित किताब के आने से भी पहले इस टाइटल और कहानी की बातें किया करते थे। एक के बाद एक उनकी किताबें आती रहीं, लेकिन उन्हें मलाल रहता कि जो कहानी दिल के सबसे पास है और जिसे सबसे पहले कहना था वह इतने सालों से टल रही है।

...एक बात और है उनमें कि वे काफ़ी काम खुद ही निपटा लेते हैं पर फिर पूरा होने के बाद होलसेल में धन्यवाद बांटते हैं। मतलब ऐसा कि ढूंढ-ढूंढकर शुक्रिया। ऑफिशियल शुक्रिया, ग्रुप में शुक्रिया, पेज पर शुक्रिया...पेस्ट करने के बाद कुल्ला करते हुए शुक्रिया। नई किताब का पहला संस्करण बिकने की मिथिलेश जी को एक बार फिर से...धन्यवाद...मेरा मतलब बधाई!

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Sunday, February 14, 2021

घरेलू अतिक्रमण - जब पौधों ने दी इंसान को गाली

 

कई सालों तक जीतोड़ मेहनत करने के बाद, विशाल का घर बनाने का सपना आखिरकार साकार हो रहा था। ठेकेदार मुख्य जगह के अलावा घर में बगीचा बनाने की बातें कर रहा था। 

विशाल - "अरे वह कहाँ हो पाएगा, घर में बड़ी कार के अलावा, 2 बाइक, साइकल सब हैं, कैसे पार्क करेंगे?"

ठेकेदार - "अरे आप तो परदेसी जैसी बात कर रहे हो, जैसे यहाँ रहे न हों। हर कोई बाहर ही लगाता है यहाँ गाड़ियां, एक आपकी खड़ी जाएगी तो कौन पूछ रहा है?"

विशाल, ठेकेदार का इशारा समझता था। वह अब तक की नौकरी में 3 प्रदेशों के 7-8 शहरों में रह चुका था और कई छोटे शहरों में घूम चुका था। कई जगह लोग अपने घर से बाहर कार, बाइक खड़ी करते थे। आस-पास के लोग, फेरी वाले आदि सब उन वाहनों के हिसाब से रहने की, निकलने की आदत डाल चुके थे। विशाल को यह अजीब लगता और रोज़ असुविधा भी होती पर कुछ सेकंड या एक-दो मिनट की असुविधा की वजह से वह भी कभी किसी से न उलझा। कुछ लोग तो अपने घर के अधिकृत क्षेत्र से बाहर दीवार या लोहे की बॉउंड्री बनवाकर अपनी गाड़ियां या सामान लगाते। ज़्यादातर जगहों पर किरायेदार के तौर पर ऐसा करना उसे ठीक भी नहीं लगा। 

हालांकि, विशाल ने यह ज़रूर ठाना था कि जब उसका घर बनेगा, तब वह घर के अंदर ही कार वगैरह के लिए जगह रखेगा। आखिर, कई विकसित देश, जैसा भारत के लोग भारत को बने देखना चाहते हैं, उनके नागरिक भी तो ऐसी सोच रखते हैं। वही कि सिर्फ अपना भला न देखकर दूसरों के बारे में भी सोचना। विशाल खुद के छोटे स्तर पर ही सही यह बदलाव लाना चाहता था।

विशाल - छोटी सी जगह में कुछ पौधे लगा लेंगे, गार्डन रहने देते हैं। आप कार, बाइक की जगह अंदर ही बनाओ।

ठेकेदार - "आपका घर, आपकी मर्ज़ी। बाकी अभी काम बाकी है, आपका मन बदले तो बता देना।"

घर के हर कोने की तरह यह फैसला भी विशाल की पसंद के हिसाब से हुआ। घर तैयार हुआ और विशाल परिवार के साथ उसमें आ गया। कुछ दिनों बाद विशाल अपने घर के अंदर लगे गिने-चुने पौधों को पानी दे रहा था कि उसे बाहर से किसी ने आवाज़ लगाई। विशाल आवाज़ सुनकर गेट की तरफ गया।

विशाल - "जी?"

"मैं लोमेश कुमार, आपके सामने रहता हूं, यहीं मिल के पास मेरा इलेक्ट्रॉनिक सामान का शोरूम है।"

विशाल - "अरे आप, नमस्ते सर। बड़ा सुना है आपके बारे में।"

लोमेश - "नमस्कार, बस आप जैसे लोगों की दुआ है। एक छोटी सी मदद चाहिए थी।"

विशाल - "ज़रूर, बताएं।"

लोमेश - "अब बच्चा बड़ा हो गया है, तो उसके लिए कार ली है। हमारे घर के बाहर तो मेरी कार और कंपनी का टेम्पो रहता है। मैंने देखा आपके घर के बाहर जगह खाली रहती है, आपका घर हमारे ठीक सामने भी है...तो मैं सोच रहा था कि बच्चे की गाड़ी यहीं आपके घर के बाहर पार्क करवा दिया करें।

यह बात सुनकर, पौधे विशाल को गाली देने लगे।

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#ज़हन

Image Credit - Lucas K.

Thursday, February 4, 2021

राम जन्मभूमि पर काव्य प्रस्तुति ऐनिमेशन


राम जन्मभूमि पर बच्चों और आम जन के लिए आसान शब्दों की मेरी इस कविता पर यह ऐनिमेशन की प्रस्तुति देखना बड़ा सुखद लगा। आशा है आपको यह काव्य और एनिमेशन पसंद आएगा। 
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अबसे दीपावली पर दिये कुछ ज़्यादा झिलमिलाएंगे,
5 शताब्दी बाद राम जी वापस अपने घर आएंगे।

सारे देश की इच्छा का रखा आपने मान,
सबसे बड़ी अदालत के फैसले का किया सम्मान,
तब अयोध्या में संभव हो पाया रघुपति राघव राजा राम।

अयोध्या का हुआ पावन श्रृंगार,
सरयु और तटों पर फिर लौटी बहार।

अबसे दीपावली पर दिये कुछ ज़्यादा झिलमिलाएंगे,
5 शताब्दी बाद राम जी वापस अपने घर आएंगे।  

पर्यटन का बड़ा विकल्प बनाया,
करोड़ों लोगों को उनका तीर्थ लौटाया।

कागज़ों-किस्सों से धूल हटाई,
समुदायों की दूरी घटाई।
दिलों से दिलों को मिलाया,
हर किसी को उसका हक़ दिलाया।

अबसे दीपावली पर दिये कुछ ज़्यादा झिलमिलाएंगे,
5 शताब्दी बाद राम जी वापस अपने घर आएंगे।  

आस-पास के क्षेत्रों में बोये विकास के बीज,
धरा से संभावनाएं छूने लगीं क्षितिज।

सपनों की नगरी को हकीकत में बसाया है,
जहां कहा था...मंदिर वहीं बनाया है,
अफवाहों को काम से उड़ाया है!
राम जन्मभूमि का वायदा निभाया है।

पीढ़ियों ने बलिदान दिया,
ऐसा न अब से पहले न अब के बाद होगा,
जाने क्या अच्छे काम किए हमने,
जो राम मंदिर हमारी आँखों के सामने साकार हुआ।
इस मौके पर हाथ बढ़ाएं,
कुछ भी कम नहीं ...
जो भी दिल से संभव हो वह योगदान कर जाएं।
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#ज़हन

Wednesday, December 23, 2020

Update: Colorblind Baalam (Paperback) available

 

नमस्ते, इस साल ई-बुक संस्करण में प्रकाशित दोनों किताबें अब पेपरबैक में उपलब्ध हैं। लगातार स्नेह बनाए रखने के लिए, आप सबका आभार! आगे के सफर को बेहतर बनाने के लिए भी आपके सहयोग वाले धक्के की आशा है। प्यार से धक्का मार के लगभग 100 कहानियों का लुत्फ़ उठाएं। <3

1) - कलरब्लाइंड बालम (Colorblind Baalam)

2) - कुछ मीटर पर ज़िन्दगी (Kuch Meter par Zindagi)

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Friday, April 24, 2020

साहित्यिक समालोचना पुस्तक में मेरी एक कहानी


"किन्नर समाज - संदर्भ - तीसरी ताली" (साहित्यिक समालोचना) - वाणी प्रकाशन की किताब में मेरी कहानी "किन्नर माँ" को शामिल कर उसपर अपनी राय देने के लिए लेखिका पार्वती कुमारी जी का आभार। हर बार की तरह बस एक शिकायत कि मेरा काम या नाम कहीं आता है, तो उस समय लेखक, प्रकाशक आदि के बजाय कई महीनों या सालों बाद कोई मित्र, प्रशंसक जानकारी देता है। खैर, कोई बात नहीं पार्वती जी का लिटरेरी क्रिटिसिज़्म में ये प्रयास मुझे अच्छा लगा। उन्हें और टीम को बधाई! #ज़हन

Friday, January 3, 2020

भूत बाधा हवन बनाम एक्सोरसिस्म (कहानी)


पुणे से कुछ दूर एक वीरान सी बस्ती में लगभग आधा दर्जन परिवार रहते थे। वहां दो पड़ोस के पुराने घरों में कई सालों से दो भूत रहते थे। एक का नाम था विनायक और दूसरी थी क्रिस्टीन। दोनों बड़े ही शांत किस्म के थे पर उनका थोड़ा-बहुत विचरण या कुछ हरकतें (जिनसे किसी को नुक्सान नहीं होता था) उन घरों में बाद में किराए पर रहने वाले लोगों को डरा दिया करती थी। हालांकि, थोड़े समय बाद इन घरों में रह रहे परिवारों को इनकी आदत पड़ जाती। इस तरह कुछ दशक बीते। जहां विनायक, भगवान गणेश का परम भक्त था वहीं क्रिस्टीन कट्टर कैथोलिक ईसाई। 

मरने से पहले दोनों जितना एक दूसरे से बचते थे, मरने के बाद न चाहते हुए भी बातें करते-करते अच्छे दोस्त बन गए थे। ऐसा नहीं था कि मरने से पहले विनायक और क्रिस्टीन में कोई बात नहीं होती थी। दोनों के जीवनसाथी बहुत पहले दुनिया छोड़ चुके थे। बस्ती में पेड़ लगाना, बिजली की लाइन पाने के लिए धरना देना, बंजर ज़मीन पर सब बस्ती वालों की साझा खेती जैसे कामों में दोनों सबसे ज़्यादा बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेते थे... इस वजह से दोनों मन ही मन एक दूसरे की इज़्ज़त भी करते थे पर जहाँ धर्म, त्यौहार आदि की बात आती थी तो विनायक और क्रिस्टीन उत्तर और दक्षिण ध्रुव बन जाते थे। अपने धर्म के प्रति इनका विश्वास इतना दृढ़ था कि मरने के बाद भी ये एक-दूसरे को अपना धर्म अपनाने के तर्क दिया करते थे।

किस्मत से विनायक के घर में एक ईसाई परिवार किराए पर आया और थोड़े समय बाद क्रिस्टीन के घर में एक गणेश भक्त परिवार। विनायक और क्रिस्टीन बड़ी उत्सुकता से उन परिवारों की दिनचर्या देखते और फिर एक दूसरे को बताते कि कैसे आजकल के तरीके और बच्चे पहले से अलग हो गए हैं, कैसे पुराना धीमापन नई तेज़ी से बेहतर था और कैसे किराए पर आये परिवार के सदस्य बहुत अच्छे हैं। अगर कभी-कभार उन्हें कुछ गलत या दूसरे के धर्म का उल्लंघन दिखता तो वे जानबूझ कर दूसरे को नहीं बताते। न चाहते हुए भी कुछ हरकतों, हल्की खटपट और दूसरी आवाज़ों की वजह से दोनों परिवारों का शक बढ़ने लगा कि इन घरों में भूतों का साया है। हिन्दू परिवार ने अपने घर का भूत (क्रिस्टीन) भगाने के लिए हवन रखा और उसी दिन ईसाई परिवार ने अपने घर से भूत (विनायक) निकालने के लिए बड़े पादरी से एक्सोरसिस्म की योजना बनाई। दोनों परिवार साबित करना चाहते थे कि भूत भगाने के लिए उनके धर्म का तरीका दूसरे धर्म से बेहतर और कारगर है।

विनायक, स्वभाव के अच्छे ईसाई परिवार को नुक्सान नहीं पहुंचाना चाहता था। साथ ही, क्रिस्टीन आहत न हो इसलिए विनायक एक्सोरसिस्म से पहले की शाम घर छोड़कर जंगलों की तरफ उड़ गया। धर्म की छोटी बहस में इतने सालों की दोस्ती इस तरह ख़त्म कर देना उसे गवारा नहीं था। उसने सोचा कि अगर हिन्दू धर्म बेहतर होगा तो उसे खुद से कोई जतन करना ही नहीं पड़ेगा। उसके भूतिया मन में चल रहा था कि क्रिस्टीन क्या सोच रही होगी। पता नहीं वह उसका अचानक गायब होना समझ पाई होगी या नहीं। 

जंगल आकर उसका सिर चकरा गया। शांति और लोगों से दूर जंगल के हर पेड़ पर भूतों ने डेरा जमा रखा था। कोई भी नए भूत-प्रेतों के लिए अपनी जगह छोड़ने को तैयार नहीं था।

"हे गणपति बप्पा! ऐसा तो नहीं सोचा था...आत्मा बनने के बाद भी घर के लिए भटकना पड़ेगा।"

कुछ देर भटकने के बाद, विनायक उस जान-पहचानी आवाज़ पर मुड़ा...

"किराए पर रहने के लिए जगह चाहिए...यह पेड़ छोटा है पर दो भूत एडजस्ट कर लेगा।"

विनायक ख़ुशी से फूल कर कुप्पा होके बोला - "क्रिस्टीन! तुम तो..."

क्रिस्टीन मुस्कुराकर बोली - "हाँ! गणपति बप्पा से पिटाई थोड़े ही खानी थी।"

उधर बस्ती में ज़ोर-शोर से बिना भूत वाले एक्सोरसिस्म और हवन चल रहे थे।

समाप्त!
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#ज़हन

Read Moral Story Kook ki Zaroorat

Wednesday, June 19, 2019

जब क्रिकेट से मिलने बाकी खेल आए...(कविता) #ज़हन


एक दिन सब खेल क्रिकेट से मिलने आए,
मानो जैसे दशकों का गुस्सा समेट कर लाए।
क्रिकेट ने मुस्कुराकर सबको बिठाया,
भूखे खेलों को पाँच सितारा खाना खिलाया।

बड़ी दुविधा में खेल खुस-पुस कर बोले... 
हम अदनों से इतनी बड़ी हस्ती का मान कैसे डोले?
आँखों की शिकायत मुँह से कैसे बोलें?
कैसे डालें क्रिकेट पर इल्ज़ामों के घेरे?
अपनी मुखिया हॉकी और कुश्ती तो खड़ी हैं मुँह फेरे...
हिम्मत कर हाथ थामे टेनिस, तीरंदाज़ी आए,
घिग्घी बंध गई, बातें भूलें, कुछ भी याद न आए...

"क...क्रिकेट साहब, आपने हमपर बड़े ज़ुल्म ढाए!"

आज़ादी से अबतक देखो कितने ओलम्पिक बीते, 
इतनी आबादी के साथ भी हम देखो कितने पीछे!

माना समाज की उलझनों में देश के साधन रहे कम,
बचे-खुचे में बाकी खेल कुछ करते भी...तो आपने निकाला दम!

इनकी हिम्मत से टूटा सबकी झिझक का पहरा, 
चैस जैसे बुज़ुर्ग से लेकर नवजात सेपक-टाकरा ने क्रिकेट को घेरा...

जाने कौनसे नशे से तूने जनता टुन्न की बहला फुसला,
जाने कितनी प्रतिभाओं का करियर अपने पैरों तले कुचला...

कब्बडी - "वर्ल्ड कप जीत कर भी मेरी लड़कियां रिक्शे से ट्रॉफी घर ले जाएं...
सात मैच खेला क्रिकेटर जेट में वोडका से भुजिया खाये?"

फुटबॉल - "पूरी दुनिया में पैर हैं मेरे...यहां हौंसला पस्त,
तेरी चमक-दमक ने कर दिया मुझे पोलियोग्रस्त।"

बैडमिंटन - "हम जैसे खेलों से जुड़ा अक्सर कोई बच्चा रोता है,
गलती से पदक जीत ले तो लोग बोलें...ऐसा भी कोई खेल होता है?"

धीरे-धीरे सब खेलों का हल्ला बढ़ गया,
किसी की लात...किसी का मुक्का क्रिकेट पर बरस पड़ा।

गोल्फ, बेसबॉल, बिलियर्ड वगैरह ने क्रिकेट को लतिआया,
तभी झुकी कमर वाले एथलेटिक्स बाबा ने सबको दूर हटाया...

"अपनी असफलता पर कुढ़ रहे हो...
क्यों अकेले क्रिकेट पर सारा दोष मढ़ रहे हो?
रोटी को जूझते घरों में इसे भी तानों की मिलती रही है जेल,
आखिर हम सबकी तरह...है तो ये भी एक खेल!
वाह, किस्मत हमारी,
यहाँ एक उम्र के बाद खेलना माना जाए बीमारी।
ये ऐसे लोग हैं जो पैकेज की दौड़ में पड़े हैं...
हाँ, वही लोग जो प्लेस्कूल से बच्चों का एक्सेंट "सुधारने" में लगे हैं। 
ऐसों का एक ही रूटीन सुबह-शाम,
क्रिकेट के बहाने सही...कुछ तो लिया जाता है खेलों का नाम।

हाँ, भेड़चाल में इसके कई दीवाने,
पर एक दिन भेड़चाल के उस पार अपने करोड़ों कद्रदान भी मिल जाने!
जलो मत बराबरी की कोशिश करो,
क्रिकेट नहीं भारत की सोच को घेरो!

समाप्त!
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Saturday, May 11, 2019

कई नाम हैं मेरे! (कहानी) - अनुभव पत्रिका मई 2019 में प्रकाशित



कल मेरा चेहरा और मेरी लिखी एक बात इंटरनेट पर वायरल हो गई। इतने सालों में ऐसा पहली बार हुआ है कि मुझे भी इतने लोगों ने जाना है। वायरल हुई बात बताने से पहले अपने बारे में थोड़ा बताता चलूं।

समाज के कायदे-कानून को बकवास बताने वालों को भी उन कायदों में रहकर अपने फायदे देखने पड़ते हैं। जो इन नियमों को नहीं मानते या मजबूरी में मान नहीं पाते उनकी किसी न किसी तरह से शामत पक्की है। 10-12 घंटे की नौकरी, 3-4 घंटे का आना-जाना बाकी नींद, खाने के अलावा क्या किया याद ही नहीं रहा। घर से दूर अजनबी शहर में पुराने यार भी छूट गए। ऐसी जीवनशैली के कद्दूकस में घिसकर जैसे सेहत, जवानी और दिमाग हर बीतते पल के साथ ख़त्म हो रहे थे। बचे समय में दिमागी संतुलन बचाने में सिर्फ़ इंटरनेट, सोशल मीडिया की आभासी दुनिया का सहारा था। यहाँ मैं भी कई लोगों की तरह अपने नीरस जीवन को चमकीली पन्नी में लपेट कर दिखाने में माहिर हो गया था। इस बीच बहुत से आभासी दोस्त भी बन गए। उन्ही में जीतता, उन्ही को जताता इस लत के सहारे जीता रहा। 


उस मनहूस दिन मेरी माँ चल बसीं। कितना कुछ सोच रखा था उनके लिए! क्या-क्या करके उनका कर्ज़ उतारूंगा। अपनी औसत ज़िन्दगी में बेचारी का ज़्यादा कर्ज़ चुका नहीं पाया। मुझे घुटन हो रही थी कि अभी तो समय था, अभी मेरी सोची हुई बातें परवान चढ़नी थी...मेरे साथ ऐसा नहीं हो सकता! जब घुटन का कहीं कोई इलाज नहीं मिला तो माँ की तस्वीरों के साथ कुछ बातें लिख दीं। कलेजा से कुछ बोझ कम हुआ। अपने दर्द में मैं यह देख न पाया कि उन तस्वीरों में एक तस्वीर माँ के पार्थिव शरीर की भी अपलोड हो गई। जब तक वह तस्वीर हटाई तब तक वह कई जगह साझा हो चुकी थी। बस फिर क्या था सोशल मीडिया से वीडियो वेबसाइटों तक सब मेरा मज़ाक उड़ाने लगे, मुझ पर थूकने लगे कि कुछ लाइक्स, टिप्पणियों और लोगों का ध्यान खींचने के लिए मैं अपनी मरी माँ का सहारा ले रहा था। किसी ने ये तक कहा कि लड़कियों की सहानुभूति और उनसे दोस्ती बढ़ाने के लिए मैंने ऐसी गिरी हुई हरकत की। उन्हें क्या बताता...मेरी यह आदत अब मेरी बीमारी बन चुकी थी। न मेरे पास किसी करीबी दोस्त का कंधा था और न गला पकड़ती इस घुटन का कोई और त्वरित इलाज। मुझे माफ़ कर दो माँ!

मेरा नाम...कई नाम हैं मेरे! नहीं-नहीं भगवान नहीं हूँ। बस अपनी फ्रेंडलिस्ट में तो देखो एक बार, मैंने कहा ना...कई नाम हैं मेरे!

समाप्त!

Wednesday, August 8, 2018

गृहणी को इज़्ज़त की भीख (कहानी) #ज़हन

Artist - Ningen Enpi

सरकारी बैंक में प्रबंधक कार्तिक आज कई हफ़्तों बाद अपने अंतरिक्ष विज्ञानी दोस्त सतबीर के घर आया हुआ था। सतबीर के घर रात के खाने के बाद बाहर फिल्म देखने का कार्यक्रम था। खाना तैयार होने में कुछ समय था तो दोनों गृहणियाँ पतियों को बैठक में छोड़ अपनी बातों में लग गयीं। इधर कुछ बातों बाद कार्तिक ने मनोरंजन बढ़ाने के लिए कहा - 

"कितनी बचकानी, बेवकूफ़ी भरी बातें करती रहती हैं ये लेडीज़ लोग।"

अपनी बात पर मनचाही सहमति नहीं मिलने और लंबी होती ख़ामोशी तोड़ने के लिए कार्तिक बोला - 
"...मेरा मतलब यहाँ हम दोनों अगर अंगोला के गृह युद्ध की बात कर रहे होंगे तो वहाँ दोनों चचिया ससुर की उनके पड़ोसी से लड़ाई पर बतिया रही होंगी, यहाँ हिमाचल में हुयी उल्का-वृष्टि पर बात होगी तो वहाँ बुआ जी के सिर में पड़े गुमड़े की, इधर भारत की विदेश नीति तो उधर चुन्नी और समीज का कलर कॉम्बिनेशन मिलाया जा रहा होगा। मतलब हद है!"

सतबीर ने कुछ सोच कर कहा - "हाँ, हद तो है..."

कार्तिक ने सहमति पाकर कुछ राहत की सांस ही थी कि..."

सतबीर - "हद है हमारे नज़रिये की! ग़लती से ही सही ठीक किया था सरकार ने जब जनगणना में गृहणियों का कॉलम भिखारियों के पास लगा दिया था। बेचारी अपना सब कुछ दे देती हैं और बदले में इज़्ज़त की चिल्लर तक नहीं मिलती। बराबर के मौके और परवरिश की बात छोड़ देता हूँ....यह बता ये लोग जैसी हैं वैसी ना होतीं तो क्या आज हम लोग ऐसे होते?"

कार्तिक - "भाई, मैं समझा नहीं?"

सतबीर - "मतलब ये लेडीज़ लोग भी विदेश नीति, आर्थिक मंदी, अंतरिक्ष विज्ञान फलाना में हम जैसी रूचि लेती तो क्या हम दोनों के घर उतने आराम से चल पाते जैसे अब चलते हैं? घर की कितनी टेंशन तो ये लोग हम तक आने ही नहीं देती और उसी वजह से हम अपने पेशों में इतना लग कर काम कर पाते हैं और बाहर की सोच पाते हैं। जहाँ हम प्रमोशन, वेतन, अवार्ड आदि में उपलब्धि ढूँढ़ते हैं....ये तो बस पति और परिवार में ही अपने सपने घोल देती हैं। अगर ये लोग अपने सपने हमसे अलग कर लें तो बहुत संभव है कि ये तो बेहतर मकाम पा लें पर हमारी ऐसी तैसी हो जाये। इस तरह आराम से बैठ कर दुनियादारी की बात करना मुश्किल हो जायेगा, ईगो की लंका लगेगी सो अलग! हा हा...ये तो हम जैसे करोड़ों का लाइफ सपोर्ट सिस्टम हैं जिनके बिना हमारा जीवन कोमा में चला जाये। तो गृहणियाँ ऐसी ही सम्पूर्ण और बहुत अच्छी हैं! इनसे बैटमैन बनने की उम्मीद मत लगा वो तू खुद भी नहीं हो सकता। इन्हें भीख सी इज़्ज़त मिले तो लानत है हमपर!"

कार्तिक - "हाँ, हाँ...सतबीर के बच्चे सांस ले ले, मैं समझ गया। आज तो गूगली फेंक दी मेरे भाई ने...."

सतबीर - "रुक अभी ख़त्म नहीं हुआ लेक्चर! एक बात और बता ज़रा...इतनी दुनिया भर की बातें करता है मुझसे, यहाँ तक की ब्रह्माण्ड तक नहीं छोड़ता। अपने प्रोफेशन के बाहर कितनी तोपें उखाड़ी हैं तूने? शर्ट प्रेस करनी आती नहीं है और अंगोला के गृहयुद्ध रुकवा लो इस से..."

हँसते हुए कार्तिक को आज अपने जीवन का सबसे महत्वपूर्ण लेक्चर मिला था। 

समाप्त!
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#ज़हन #mohit_trendster #freelance_talents #mohitness

Friday, August 3, 2018

Editor - Ibadat Ishq ki Poetry Collection (Vikas Durga Mahto)


Book - Ibadat Ishq ki (Poetry Collection)
Poet - Vikas Durga Mahto
My role - Editor
Publisher: Sooraj Pocket Books; First edition (31 July 2018)
Language: Hindi
ISBN-10: 9388094018
ISBN-13: 978-9388094016
Package Dimensions: 23 x 18 x 3 cm

इस दौर में लोगों को काव्य से बांधना मुश्किल होता जा रहा है। बचपन से उँगलियों पर रखे मनोरंजन के हर साधन के बीच काव्य कहीं रूठ सा गया है। विकास महतो जैसे कवियों के कारण काव्य जैसे कुछ समय के लिए मान जाता है। किसी ग्लेशियर से अभी-अभी पिघली पावन धारा से उनके शब्द मन में घर कर लेते हैं। बाहरी ट्रेंड को देखकर बहुत से कवि खुद को बंदिशों में रखकर रचना सोचते हैं। ऐसी रचनाएँ कभी अच्छी बन सकती हैं पर उनपर दिखावे की परत साफ़ झलकती है, जैसे वो रचनाकार समाज के मानकों को ज़बरदस्ती रिझाना चाहते हों। विकास की कविताओं, ग़ज़ल-नज़्म काव्य की ख़ास बात ये है कि उनमें किसी तरह का बनावट नहीं है। हर रचना में अनेक भावों का अद्भुत घनत्व झलकता है। उनके मन से निकली भावनाओं का पाठक के मन से जुड़ना तय होता है। कविताओं को कुछ श्रेणियों में बांटा गया है और हर श्रेणी अपने में पूरी लगती है। किताब के लिए दो अतिरिक्त रचनाओं को लिखते हुए मैं डर रहा था कि क्या मैं विकास की रचनाओं के साथ न्याय कर पा रहा हूँ...आशा है आपको किताब पढ़ते हुए वैसा रस मिलेगा जैसा मुझे संपादन करते हुए मिला। 


Wednesday, May 23, 2018

ख्याल...एहसास (ग़ज़ल) #ज़हन


एक ही मेरा जिगरी यार,
तेरी चाल धीमी करने वाला बाज़ार...
मुखबिर एक और चोर,
तेरी गली का तीखा मोड़। 
करवाये जो होश फ़ाख्ता,
तेरे दर का हसीं रास्ता...
कुचले रोज़ निगाहों के खत,
बैरी तेरे घर की चौखट। 

दिखता नहीं जिसे मेरा प्यार,
पीठ किये खड़ी तेरी दीवार...
कभी दीदार कराती पर अक्सर देती झिड़की,
तेरे कमरे की ख़फा सी खिड़की। 
शख्सियत को स्याह में समेटती हरजाई
मद्धम कमज़र्फ तेरी परछाई...
कुछ पल अक्स कैद कर कहता के तू जाए ना...
दूर टंगा आईना। 
जाने किसे बचाने तुगलक बने तुर्क,
तेरे मोहल्ले के बड़े-बुज़ुर्ग। 

...और इन सबके धंधे में देती दख़्ल,
काटे धड़कन की फसल,
मेरी हीर की शक्ल...
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Wednesday, April 11, 2018

उल्लास की आवाज़ (कहानी) #ज़हन

Artwork - Igor Vitkovskiy

जीव विज्ञानी डॉक्टर कोटल और उनके नेतृत्व में कुछ अनुसंधानकर्ताओं का दल प्रशांत महासागर स्थित एक दुर्गम द्वीपसमूह पर कई महीनों से टिका हुआ था। उनका उद्देश्य वहाँ रहने वाले कबीलों में बेहतर जीवन के लिए जागरूकता फैलाना था। स्थानीय धर्म सूमा के रीती-रिवाज़ों में हज़ारों कबीलेवासी अपनी सेहत और जान-माल से खिलवाड़ करते रहते थे। इतने कठिन और अजीब नियमों वाले सूमा धर्म में जागरूकता या बदलाव के लिए कोई स्थान नहीं था। अलग-अलग तरीकों से कबीले वालों को समझाना नाकाम हो रहा था। वीडियो व ऑडियो संदेश, कबीलों के पास खाद्य सामग्री या दवाई गिराना, रिमोट संचालित रोबॉट से संदेश आदि काम जंगलियों को जागरूक करने के बजाय भ्रमित कर रहे थे।

जब हर प्रयास निरर्थक लगने लगा तो डॉक्टर कोटल ने स्वयं जंगलियों के बीच जाकर उन्हें समझाने का फैसला किया। इस जोखिम भरे विचार पर दल के बाकी सदस्य पीछे हट गये। किसी तरह डॉक्टर केवल अनुवादक को अपने साथ रहने के लिए समझा पाये। बिना सुरक्षा के जंगली सीमा में घुसते ही दोनों को बंदी बना लिया गया। कुछ कबीलों की संयुक्त सभा में डॉक्टर और अनुवादक को एक खंबे से बाँध कर उनकी मंशा और पिछले कामों के बारे में पूछा गया। 

डॉक्टर ने अपनी तरफ से भरसक कोशिश की, और अपनी बात इस तरह ख़त्म की - "....हम आपके दुश्मन नहीं हैं। बाहर की उन्नत दुनिया में यहाँ फैले कई रोगों के इलाज और परेशानियों के हल हैं। एक बार हमें मौका देकर देखिए।"

अपनी जान के लिए कांपते और डॉक्टर को कोसते अनुवादक ने तेज़ी से कोटल की बात को जंगलियों की भाषा में दोहराया। 


जवाब में कबीलों के वरिष्ठ सदस्य ज़ोर-ज़ोर से हँसने लगे। उन्होंने अनुवादक को बताया की सूमा धर्म सबसे उन्नत है और बाकी बातें व्यर्थ हैं। डॉक्टर कोटल को सूमा के ईश्वर ने उन सबकी परीक्षा लेने के लिए भेजा है।

अचानक अंतरिक्ष से गिरा एक विशालकाय पत्थर डॉक्टर कोटल और उनके अनुवादक पर बरसा और दोनों की मौके पर ही मृत्यु हो गयी। कोई बड़ी उल्का पृथ्वी का वायुमंडल पार करते हुए बड़े टुकड़ो में उस द्वीपसमूह पर बरसी थी। 

इस घटना में कोई जंगली नहीं मरा। उन सबका विश्वास पक्का हुआ कि उनके धर्म से ना डिगने के कारण वो ज़िंदा रहे जबकि बाहरी अधर्मी लोग मारे गये। सभी उल्लास में "हुह-हुह-हुह..." की आवाज़ निकालकर नृत्य करने लगे। 

जंगली नहीं देख पाये कि उल्का के कई टुकड़े सुप्त ज्वालामुखी में ऐसे कोण पर लगे की वह जाग्रत होकर फट गया। गर्म लावे का फव्वारा द्वीपसमूह पर आग की बारिश करने लगा। कुछ देर पहले तक सूमा धर्म के गुणगान गाते जंगली जान बचाकर भागने लगे। अधिकांश गर्म बरसात में मारे गये और जो ओट में बच गये उनकी तरफ आग की नदी तेज़ी से बढ़ रही थी। फिर भी अगर कोई बच गया तो उल्कापिंडो से समुद्र में उठी सुनामी कुछ मिनटों में दस्तक देने वाली थी। ज़मीनी सतह से काफी ढका होने के कारण दबाव में ज्वालामुखी भी उल्लास में "हुह-हुह-हुह..." की आवाज़ निकाल रहा था...शायद मन ही मन सूमा के ईश्वर का गुणगान और नृत्य भी कर रहा हो।

समाप्त!
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Wednesday, April 4, 2018

एड्रनलिन रश वाली झुरझुरी (कहानी) #ज़हन


दिलीप ने चलती गाड़ी से शराब की बोतल सड़क पर पटकी। नशे में कार चला रहे उसके दोस्त हफ़ीज़ ने उसे टोका। 
"ऐसे बोतल नहीं फेंकनी चाहिए! जानवरों और लोगों के पैरों में कांच चुभ सकता है। दुपहिया वालों का एक्सीडेंट हो सकता है।"
दिलीप ने उसे झिड़का - "साले! पापा को मत सीखा और कार भी नशे में नहीं चलानी चाहिए....लोग मर सकते हैं। फ़िर भी चला रहा है ना तू?"

हफ़ीज़ का मूड़ ठीक करने के लिए दिलीप दार्शनिक स्टाइल में आ गया।
"शराब, चरस में टुन्न रहना ही नशा नहीं है। भाई जीवन जी, मौज कर....एड्रनलिन रश को समझ! यूँ बिना देखे कार घुमा देना, बिना सोचे बोतल से लेकर किसी बेवक़ूफ़ की हड्डी तोड़ देना इस सब से जो झुरझुरी मचती है शरीर में उसे महसूस कर। भाड़ में गयी दुनिया!"

हफ़ीज़ की आशंका सच हो गयी और बोतल का बड़ा टुकड़ा अँधेरे में सड़क पार करती एक महिला माया की चप्पल चीरता हुआ उसके पैर में घुस गया। चोट के कारण अगले दिन माया जिस घर की सफाई और बर्तन करने जाती थी वहाँ जाने में लेट हो गयी। इधर सुबह-सुबह दिलीप को अचानक खांसी का दौरा उठा और शराब-गांजे के नशे में उसके मुँह और सांस की नली में उल्टी भर गयी। घर के बाकी सदस्य नींद में होने और माया के देर से आने के कारण जीवन के लिए दिलीप के संघर्ष  को कोई सुन नहीं पाया। दिलीप उसी दुनिया में सांस लेने को तड़प रहा था जिसे अक्सर भाड़ में भेजकर उसे एड्रनलिन रश वाली झुरझुरी मिलती थी। कुछ ही समय में उसकी मौत हो गयी। 

अपने बिगड़ैल बेटे को खोकर बिलख रहे परिवार के बीच माया सिसक रही थी। काम के बहाने खाली कमरे की आड़ में आकर उसकी सिसकारी हल्की हँसी में बदल गयी। आखिर एड्रनलिन रश की झुरझुरी पर केवल अमीरों का हक़ थोड़े ही है।

समाप्त!
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