Freelance Falcon ~ Weird Jhola-Chhap thing ~ ज़हन

Monday, December 13, 2021

सरकारी संन्यास (हास्य व्यंग)

 

[नोट - यह एक हास्य कहानी है, इसका उद्देश्य किसी की भावनाओं को ठेस पहुंचाना नहीं है। (स्वयं लेखक कई प्रतियोगी परीक्षाओं में असफल हो चुके हैं।)]

आज संवाददाता विकास, झेलम कस्बे की बड़ी खबर को कवर करने आए थे।

रिपोर्टर विकास - " आज झेलम कस्बे के सेलिब्रिटी, श्री डफली कश्यप जी ने 34 साल की उम्र में अपने साढ़े 13 साल के प्रतियोगी परीक्षा के करियर से सन्यास की घोषणा की। डेढ़ साल पहले ही डफली जी ने अपने कस्बे और आस-पास के गाँवों में सबसे ज़्यादा प्रतियोगी परीक्षाओं में बैठने का रिकॉर्ड बनाया था। उनके संन्यास लेने के बयान से उनके परिजनों और दोस्तों में खुशी की लहर दौड़ गई है और उनकी सरकारी नौकरी की आस लगाए बैठी उनकी गर्लफ़्रेंड भी दूसरे बैकअप प्रेमी की और दौड़ गई है। आइए डफली जी से जानते हैं कि कब और कैसे उनकी ऐसी डफली बजी..."

रिपोर्टर विकास - आप अब तक कितनी प्रतियोगी परीक्षाओं में हिस्सा ले चुके हैं?
डफली - मैं 197 बार अलग-अलग भर्तियों के लिए लिखित परीक्षाओं में बैठ चुका हूं।

रिपोर्टर विकास - ओह! बेहतरीन! तो क्या आपके मन में नहीं आया कि दोहरे शतक का जादुई आंकड़ा छुआ जाए?
डफली - हा-हा...अब 99 के फेर में जितना घुसा जाए, उतना कम है। ऐसे तो मेरे दो-चार सीनियर ने 300 का आंकड़ा पार करने के बाद संन्यास लिया था। हां, मैंने करीब 250 फ़ॉर्म भरे होंगे। यह संख्या देखकर लगता है कि मैं दोहरा शतक आसानी से मार सकता था।

रिपोर्टर विकास - तो कहाँ चूक रह गई?
डफली - दरअसल, लगभग सभी प्रतियोगी परीक्षाएं रविवार के दिन होती हैं, इस वजह से कभी-कभी ऐसा हुआ कि एक ही दिन दो परीक्षा पड़ गईं। इसके अलावा कभी अपने आलस्य और लापरवाही, तो कभी परीक्षास्थल बहुत दूर के शहर होने की वजह से कुछ परीक्षाएं नहीं दे पाया।

रिपोर्टर विकास - तेरह साल से ज़्यादा के करियर में अपनी सबसे बड़ी उपलब्धि क्या मानते हैं?
डफली - देखिए, सरकारी नौकरी में चयन होने या न होने के अलावा एक और उपलब्धि होती है जो सालों तक तैयारी करने वाला हर अभ्यर्थी बताता है, लेकिन यह बहुत कम के हिस्से आती है। ज़्यादातर लोग इस बारे में गप्प मारते हैं। वह उपलब्धि है, परीक्षा या साक्षात्कार में चयन होने से सिर्फ़ एक नंबर से रह जाना। मेरा सौभाग्य है कि आम लोगों का गप्प...ऐसा मेरे तैयारी के करियर में एक नहीं दो बार हुआ। पहला शुरुआती दौर में जब मैं 22-23 साल का था, तो बैंक मैनेजर की लिखित परीक्षा में कट ऑफ़ से 1 अंक कम आया। यह परिणाम देखकर सिर्फ़ मैं ही नहीं, मेरा परिवार और दोस्त भी आश्वस्त हुए कि कोई न कोई सरकारी नौकरी मेरे हिस्से ज़रूर आएगी। दूसरा तीन साल पहले बीमा क्लर्क की परीक्षा में ऐसा हुआ था।

रिपोर्टर विकास - ...और सबसे खराब प्रदर्शन कब रहा?
डफली - दो बार, एक बार हवा में दी गई परीक्षा में 150 में से 17 सवाल सही हुए थे और एक बार मुझसे ओएमआर शीट का क्रम गड़बड़ा गया था, तो 120 में से 9 अंक आए होंगे।

रिपोर्टर विकास - आपके प्रदर्शन पर और किन बातों का असर पड़ा?
डफली - जिओ मोबाइल क्रांति का मेरे जैसे करोड़ों युवाओं पर भारी असर पड़ा। सभी कंपनियों ने अपने डेटा और कॉल प्लान सस्ते कर दिए। बस उसके बाद तो गर्ल फ्रेंड से बात करने और दिन में 36 तरीके के ठुमके देखने में ही साल बीत गए। अब बेरोज़गारों को कोई दिनभर का काम मिलेगा, तो वो तो करेंगे ही न? पहले कहाँ सिर्फ़ फ़ोन पर बात करना ही खर्चीला शौक था। कुछ छोटी वजहें भी रहीं, लेकिन उनकी क्या बात करना....

रिपोर्टर विकास - अब बात छिड़ी ही है तो कर लीजिए।
डफली - छोटी मतलब एक परीक्षा पर असर डालने वाली। जैसे, कभी एग्ज़ाम के दिन तेज़ बारिश, बुखार होना या कभी तो खड़ूस परीक्षक द्वारा सू-सू जाने की अनुमति न देना। दो बार सू-सू रोकने के दबाव में आसान पेपर होते हुए भी अच्छे अंक नहीं आए। एक दफ़े तेज़ पहुंचने के चक्कर में टेबल का कोना पेट में लग गया बस पूरा पेपर अपने गुलगुले पेट तो थपथपाता रहा। वैसे 'सेक्सी लेडीज़ इन दी एग्ज़ाम सेंटर' को नक़ल कराने के चक्कर में भी कभी-कभी पेपर छूटे। हालांकि, बाद में न पेपर रहा, न ही वो लेडीज़।

रिपोर्टर विकास - इस दौरान आप कितने साक्षात्कारों वाले चरण तक पहुंचे?
डफली - हर लिखित परीक्षा के साथ साक्षात्कार नहीं होता, कई बार तो लिखित परीक्षा के साथ शैक्षिक डिग्रीयों के अंक जोड़े जाते हैं। फिर में मैंने करीब 2 दर्जन से ज़्यादा साक्षात्कार दिए। सरकारी नौकरी में सालों से सोए कुछ थकेले चेहरे देखने के अलावा इन इंटरव्यू में कुछ खास अनुभव नहीं रहा।

रिपोर्टर विकास - आपको नहीं लगता कि तैयारी करियर के शुरुआती दौर में 1 नंबर से रह जाने से जो लालच की लॉलीपॉप आपने चूसी वह कब की खत्म होने के बाद भी चूसी जाती रही।
डफली - निसंदेह! आपने कैसे जाना?


रिपोर्टर विकास - अरे, हम खुद भुक्तभोगी हैं। वैसे इस दौरान आपने कितने पैसों में आग लगाई?
डफली - जी, फ़ॉर्म भरने का पैसा, परीक्षा केंद्र जाना, कई बार दूसरे शहर ठहरना, कोचिंग, किताबें, नोट्स, प्रिंट आउट फलाने का कोई हिसाब नहीं। इस चक्कर में खैनी-सिगरेट की लत लगी सो अलग। दुनिया तो कहती है कि "टाइम इज़ मनी" और वह तो मैंने थोक के भाव उड़ाया है। फिर भी यह कहा जा सकता है कि मेरे पड़ोसी के पापा ने बारहवीं के बाद उसका ट्रैक्टर का शोरूम खुलवाया था, अगर मैं तैयारी न करता तो आज मेरे पापा के पास ऐसे तीन शोरूम खुलवाने के पैसे होते।

रिपोर्टर विकास - अब आपके पापा किस चीज़ का शोरूम खुलवाएंगे?
डफली - उनके अरमानों और सब्र का शोरूम में उड़ा चुका हूं, अब वे मन में गाली दिए बिना मेरा चेहरा देख लिया करें इतना ही काफ़ी है।

रिपोर्टर विकास - डफली जी, अब आप क्या करेंगे?
डफली - सिस्टम को गाली देंगे, कहीं कोई कुत्ते-गाय-सांड सोते हुए मिलेंगे, तो बिना बात का गुस्सा उन्हें लात मारके निकालेंगे। 8-10 हज़ार महीना वाली कोई एंट्री लेवल प्राइवेट नौकरी करेंगे और सोचेंगे कि यह नौकरी अगर 14 साल पहले शुरू कर देता, तो अभी 80 हज़ार कमा रहा होता और कितना जमा कर लिया होता फलाना ...

रिपोर्टर विकास - क्या कभी आपकी वापसी भी हो सकती है?
डफली - हो तो दुनिया में कुछ भी सकता है। अगर कोई आसान एग्ज़ाम हुआ जिसमें मेरी उम्र के लोग शामिल हो सकते हैं, तो देख लेंगे।

रिपोर्टर विकास - "हमारी टीम आपको सुखद रिटायरमेंट विश करती है, आशा है आप जीवन के अन्य क्षेत्रों में ऐसे ही कीर्तिमान बनाएं।"
डफली - "@#!$%&@"

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#ज़हन

Saturday, November 6, 2021

5-book anthology series - "What if..."

Namastey! Happy Diwali! 
Co-authored this series with poems, stories on 5 different themes. Prompt based writing challenges oneself to write on random topics outside one's zone. Sharing one poem from book #01.


1) - What if phone was a person

I don't blink or buzz anymore,
No sunshines - no seashores...
or play that funny song when you call or text!

I saved all your voicemails,
I listen to them sometimes,
but I also grow old...
Out of that utility mould,
my updates no longer come,
my battery too is weak,
Forgot the date I was sold,
and I'm told that I am old...

and I am also dangerous,
On that junkyard billboard,
to talk to, to carry on with, to hold
that I am also used up, and besides...
there is no need of me,
that will never again
connect those special two...

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2) - What if Genie would grant you 3 wishes


3) - What if you had a magical wand


4) - What if there were no restaurants


5) - What if there was an anywhere door

Thursday, September 16, 2021

2 Poems in Red Sunflower (Anthology)


2 poems in this anthology by yours truly (will share few stanzas soon). One of the biggest anthologies in terms of total authors, poets (100). Congratulations to the compiler Bhawna Dewangan and team.

Available - Notion Press =*= * Amazon

Saturday, September 11, 2021

Poem in Deep Silence (Anthology)

 'Stealthy silence' (poem) in Deep Silence (anthology), Paperback: 150 pages

ISBN-10: 1685388396

ISBN-13: 978-1685388393

Editors - Sanoj Kumar and Kiran Baghari

Notion Press:

https://lnkd.in/gKFZXMry

Amazon:

https://lnkd.in/gxzxMiKR

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Friday, June 18, 2021

Story in Anthology: Narratives in Monochrome (June 2021)

My story "Herd Mortality" included in anthology book "Narratives in Monochrome" with 24 talented authors.

Publisher - Flairs and Glairs, Editor - Rashmi Pai Prabhu, ISBN-10: ‎ 9391302270, ISBN-13: ‎ 978-9391302276

https://www.amazon.in/Narratives-Monochrome-Rashmi-Pai-Prabhu/dp/9391302270/

Wednesday, April 21, 2021

ज़रूरी था...

पिछले हफ़्ते मैं और मेरे माता-पिता कोरोना पॉजिटिव हो गए। इस समय मैं अपने पैतृक घर पर उनके साथ हूँ। मेरी पत्नी और पुत्र दूसरे घर में सुरक्षित हैं। 19 अप्रैल को हमारी शादी की तीसरी सालगिरह थी, लेकिन इस स्थिति में उनसे मिलना संभव नहीं था। इस आपदा की घड़ी में, लोगों के इतने बड़े दुखों के बीच यह बात बांटना भी छोटा लग रहा है। बस यह ठीक है कि मेरा बाकी परिवार सुरक्षित है और मैं इस समय माता-पिता के साथ हूँ। मेघा को दिए कुछ उपहारों में हमारे फ़ोटो पर कलाकार Ajay Thapa की बनाई यह पेंटिंग सबसे ख़ास है...

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आगे कभी...पीछे मुड़कर इस साल को देखेंगे,

तुम इससे पूछ लेना..."क्या यह साल ज़रूरी था?"

मैं भी डांट दूंगा..."क्या यह हाल ज़रूरी था?"

ज़िन्दगी के किसी शांत दौर में...फिर इस साल से बात करेंगे।

तब जब तुम मुस्कुरा रही होगी,

बैंक में पड़ी मोटी बचत का हिसाब लगा रही होगी,

बुढ़ापे की दवाई खा रही होगी।

तब जब मैं कहीं फ़ोन नंबर की जगह पिन कोड लिख रहा होऊंगा,

तुम मुझे किसी महीन बात का अंतर समझा रही होगी।

मैं छिप कर मीठा खा रहा होऊंगा,

तुम प्रभव से मेरी शिकायत लगा रही होगी।

उन बातों में कभी इस साल को भी शामिल कर लेंगे,

और मुस्कुराकर इससे कहेंगे,

शायद यह इम्तिहान ज़रूरी था...

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#ज़हन

 Last week, tested positive for Coronavirus along with my parents. I am in home quarantine away from my wife and kid...and today is our third wedding anniversary.

Thursday, March 11, 2021

राज कॉमिक्स का बंटवारा - तीन हिस्से हुए?

बीते दिनों भारतीय कॉमिक्स जगत की एक बड़ी घटना हुई। मैं अचंभित हूं कि अभी तक आधिकारिक रूप से इस बात पर कोई ब्लॉग, लेख आदि पढ़ने को क्यों नहीं मिला। 1986 से सक्रीय प्रकाशन राज कॉमिक्स के तीन हिस्से हो गए।

Nagraj Vritant - 2 Variant Cover (2021), Timeless Classics of Nagraj
Art - Lalit Kumar Sharma, Colors - Pradeep Sherawat
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राजा पॉकेट बुक्स के संस्थापक स्वर्गीय राज कुमार गुप्ता जी का दिसंबर 2020 में निधन हो गया। उनके देहांत से पहले ही उनके पुत्रों (संजय गुप्ता, मनोज गुप्ता और मनीष गुप्ता) के आपस में मतभेद हुए जिनका कुछ अंश सोशल मीडिया पर साझा किया गया। सभी पक्षों की पूरी बात सार्वजानिक तौर पर सामने नहीं आई, इस वजह से उस बारे में बात करना तो ठीक नहीं होगा। हालांकि, इस दौरान 'Raj Comics by Sanjay Gupta' (RCSG) और 'Raj Comics by Manoj Gupta' (RCMG) के विज्ञापन आने लगे। श्री मनीष गुप्ता की ओर से अभी कोई अपडेट देखने को नहीं मिली।

Yugarambh set (2021) - Raj Comics by Sanjay Gupta

RCMG और RCSG के विज्ञापनों और इन कुछ महीनों में बिक्री पर लगी कॉमिक्स को देखकर पता चलता है कि किरदारों के इस्तेमाल के अधिकार साझा कर लिए गए हैं। साथ ही, पुरानी छपी कॉमिक्स को भी क्रम के अनुसार बाँट लिया गया है, ताकि यह साफ़ रहे कि कौनसी कॉमिक का रीप्रिंट किसे प्रकाशित करना है। मंदी के इस दौर में, दोनों प्रकाशन कॉमिक्स के साथ-साथ कलाकारों, संसाधनों का भी साझा इस्तेमाल कर रहे हैं। राजा पॉकेट बुक्स का संचालन भी इसी तरह होगा।

Nagraj Janmotsav 2015 event

अगर तुलना की जाए तो श्री मनोज गुप्ता ज़्यादा प्रयोगात्मक थीम पर काम कर रहे हैं। वहीं श्री संजय गुप्ता जी पर पहले घोषित की गईं कुछ बड़ी सीरीज़ को प्रकाशित करने का दबाव है। कॉमिक बाज़ार में उनकी गुडविल भी ज़्यादा है। टीम की बात करें, तो दोनों ही तरफ़ संतुलित कलाकार और लेखक हैं। वैसे अभी किसी नतीजे पर आना जल्दबाज़ी होगी, क्योंकि इतने किरदारों, हज़ारों कॉमिक्स के कॉपीराइट अधिकार और आय को बराबर बांटना काफ़ी मुश्किल काम है। ऐसा हो सकता है कि भविष्य में यह बात विवाद का कारण बने। आशा है, आने वाले समय में भारतीय कॉमिक्स जगत में फिर से राज कॉमिक्स परिवार की नियमित कॉमिक्स आती रहें।

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#ज़हन

Monday, February 22, 2021

'धन्यवाद' के थोक विक्रेता - लेखक मिथिलेश गुप्ता

लेखक मिथिलेश गुप्ता का रचनात्मक सफर बचपन से ही चालू था। हालांकि, पढ़ाई और फिर नौकरी की वजह से वे अपने कलात्मक शौक जैसे कि लेखन, गायन, नृत्य आदि को ज़्यादा समय नहीं दे पाते थे। आखिरकार, 2015 में उनकी पहली किताब हॉरर थीम वाली "वो भयानक रात" प्रकाशित हुई, जिसका बाद में कॉमिक संस्करण भी आया और साथ ही अगला भाग 11:59 भी प्रकाशित हुआ। उन्होंने 'जस्ट लाइक दैट' और 'तेरी इश्क वाली खुशबू' से रोमांटिक थीम की नब्ज़ पकड़ी। इस बीच कुछ किताबों का संपादन भी किया। 2019 से एक निजी इंटरनेट रेडियो कंपनी में काम कर रहे हैं।

अब उनकी नई किताब 'ऑक्सीजन ऑफ़ लाइफ' प्रकाशित हुई है। इस किताब की ख़ास बात बस यही है कि मिथिलेश, अपनी पहली प्रकाशित किताब के आने से भी पहले इस टाइटल और कहानी की बातें किया करते थे। एक के बाद एक उनकी किताबें आती रहीं, लेकिन उन्हें मलाल रहता कि जो कहानी दिल के सबसे पास है और जिसे सबसे पहले कहना था वह इतने सालों से टल रही है।

...एक बात और है उनमें कि वे काफ़ी काम खुद ही निपटा लेते हैं पर फिर पूरा होने के बाद होलसेल में धन्यवाद बांटते हैं। मतलब ऐसा कि ढूंढ-ढूंढकर शुक्रिया। ऑफिशियल शुक्रिया, ग्रुप में शुक्रिया, पेज पर शुक्रिया...पेस्ट करने के बाद कुल्ला करते हुए शुक्रिया। नई किताब का पहला संस्करण बिकने की मिथिलेश जी को एक बार फिर से...धन्यवाद...मेरा मतलब बधाई!

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Sunday, February 21, 2021

स्वर्गीय कलाकार अनिरुद्ध साईंनाथ कृष्णमणि को श्रद्धांजलि - R.I.P. Anirudh Sainath Krishnamani (Molee Art)


कुछ दिन पहले, मौली (या मोलै) आर्ट - Molee Art, नाम से प्रख्यात डिजिटल आर्टिस्ट अनिरुद्ध साईंनाथ कृष्णमणि हमारे बीच नहीं रहे। वे अवसाद से जूझ रहे थे। भारतीय पुराणों, ग्रंथों, देवी-देवताओं पर उनकी कलाकृतियां देश-विदेश में मशहूर हुई। 


उनके पिता स्वर्गीय एम.एन कृष्णमणि (1948-2017) सुप्रीम कोर्ट के नामी वकील, सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन ऑफ़ इंडिया के पूर्व अध्यक्ष और पद्म श्री (2016) थे और माता राधा कृष्णमणि (देहांत: 2007) भारत नाट्यम नृतक, भजन गायिका थीं।


कई लोगों के लिए तो भारतीय ग्रंथों के पात्रों और हिंदू भगवानों के रूप की कल्पना अनिरुद्ध जी की कलाकृतियां ही थी। उन्होंने देश में कुछ जगह अपनी कला प्रदर्शनियां भी आयोजित की, उन्हीं में से एक जगह उन्हें अपनी 2-3 कलाओं की वजह से कुछ स्थानीय नेताओं और लोगों का विरोध भी झेलना पड़ा। कई कलाकार उन्हें अपना आदर्श मानते हैं और आज भी लाखों लोग, उनका काम इंटरनेट पर खोजते हैं। उन्होंने जीवन के आखिरी सालों में जापानी थीम पर कलाकृतियां बनाई। वे उन कुछ डिजिटल कलाकारों में शामिल थे जिनकी वजह से भारतीय लोगों ने डिजिटल आर्ट के माध्यम को मान्यता दी। 


2014 में उन्होंने एक बच्चे जैसे उत्साह के साथ TEDx पर भारतीय पुराणों पर बात की थी। भगवान राम, हनुमान जी की शक्तियों बारे में बताते हुए उनकी आँखों में जो चमक थी उससे पता चल रहा था कि वे इस विषय के लिए कितने समर्पित थे। अब अनिरुद्ध हमारे बीच नहीं हैं पर उनकी कई कलाकृतियों में उनकी सोच और रचनात्मक अंदाज़ ज़िंदा रहेगा।

कितना अधूरा छोड़ दिया, फिर भी कितना कर गए,
तीस सालों में जैसे सात जन्म जी लिए...

#ज़हन

TEDx Event 2014
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Artist Mrinal Rai on Anirudh

"ARTISTS too can suffer from depression, please please keep encouraging them....

So artist Anirudh Sainath is no more. You must have seen one of his amazing artworks by his art name Molee's Art. Those who draw about Indian scriptures and heritage (hate to call it Mythology!) know his work very well. I remember encountering his work many years ago on Deviantart (where I am now very less active). I was working on my book and was drawing artworks based on Kurukshetra war. I remember drawing the scene of battle between Ghatokatch and Karna and shared it on Orkut. I received a lot of comments that how can Ghatotkatch have hair he was born bald and many more. I took my own pleasure to explain to them that the art is as per description in Drona Parva and was sure that no one else had captured it that way. But was surprised to see Molee not only captured it that way but also art was way superior than mine. I was both surprised and jealous ofcourse! 

From then on i always followed him, his artwork on many Indian scripture incidences are marvelous. I remember many a times a post was forwarded on FB and WhatsApp that he is the "most underrated artist of India" with his famous painting of Rama standing on a flying Hanuman. I also remember someone sharing his and my artwork side by side of Shiva saying that the chillam smoking Shiva (Molee's) is not our culture and the Halahala drinking Shiva is (mine). I was a bit happy that someone chose my art over his but I know it was not because of quality of art. I know in this birth, I may never match to the great artistic mastery of Anirudh. Many of his artworks are my favorites, including one of Nachiketa, Trapjaw, Drona etc. I wish I could get a chance to meet him virtually or in person, discuss with him of our epics and scriptures at length. Heard that he died of depression (not confirmed), How can someone of his stature be under depression? But then again, you never know what the other person is going through. Now Molee Art is among those he loved to draw and its our loss, it felt a personal loss to me.. Much to learn much to learn, May his soul finds moksha."
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Sunday, February 14, 2021

घरेलू अतिक्रमण - जब पौधों ने दी इंसान को गाली

 

कई सालों तक जीतोड़ मेहनत करने के बाद, विशाल का घर बनाने का सपना आखिरकार साकार हो रहा था। ठेकेदार मुख्य जगह के अलावा घर में बगीचा बनाने की बातें कर रहा था। 

विशाल - "अरे वह कहाँ हो पाएगा, घर में बड़ी कार के अलावा, 2 बाइक, साइकल सब हैं, कैसे पार्क करेंगे?"

ठेकेदार - "अरे आप तो परदेसी जैसी बात कर रहे हो, जैसे यहाँ रहे न हों। हर कोई बाहर ही लगाता है यहाँ गाड़ियां, एक आपकी खड़ी जाएगी तो कौन पूछ रहा है?"

विशाल, ठेकेदार का इशारा समझता था। वह अब तक की नौकरी में 3 प्रदेशों के 7-8 शहरों में रह चुका था और कई छोटे शहरों में घूम चुका था। कई जगह लोग अपने घर से बाहर कार, बाइक खड़ी करते थे। आस-पास के लोग, फेरी वाले आदि सब उन वाहनों के हिसाब से रहने की, निकलने की आदत डाल चुके थे। विशाल को यह अजीब लगता और रोज़ असुविधा भी होती पर कुछ सेकंड या एक-दो मिनट की असुविधा की वजह से वह भी कभी किसी से न उलझा। कुछ लोग तो अपने घर के अधिकृत क्षेत्र से बाहर दीवार या लोहे की बॉउंड्री बनवाकर अपनी गाड़ियां या सामान लगाते। ज़्यादातर जगहों पर किरायेदार के तौर पर ऐसा करना उसे ठीक भी नहीं लगा। 

हालांकि, विशाल ने यह ज़रूर ठाना था कि जब उसका घर बनेगा, तब वह घर के अंदर ही कार वगैरह के लिए जगह रखेगा। आखिर, कई विकसित देश, जैसा भारत के लोग भारत को बने देखना चाहते हैं, उनके नागरिक भी तो ऐसी सोच रखते हैं। वही कि सिर्फ अपना भला न देखकर दूसरों के बारे में भी सोचना। विशाल खुद के छोटे स्तर पर ही सही यह बदलाव लाना चाहता था।

विशाल - छोटी सी जगह में कुछ पौधे लगा लेंगे, गार्डन रहने देते हैं। आप कार, बाइक की जगह अंदर ही बनाओ।

ठेकेदार - "आपका घर, आपकी मर्ज़ी। बाकी अभी काम बाकी है, आपका मन बदले तो बता देना।"

घर के हर कोने की तरह यह फैसला भी विशाल की पसंद के हिसाब से हुआ। घर तैयार हुआ और विशाल परिवार के साथ उसमें आ गया। कुछ दिनों बाद विशाल अपने घर के अंदर लगे गिने-चुने पौधों को पानी दे रहा था कि उसे बाहर से किसी ने आवाज़ लगाई। विशाल आवाज़ सुनकर गेट की तरफ गया।

विशाल - "जी?"

"मैं लोमेश कुमार, आपके सामने रहता हूं, यहीं मिल के पास मेरा इलेक्ट्रॉनिक सामान का शोरूम है।"

विशाल - "अरे आप, नमस्ते सर। बड़ा सुना है आपके बारे में।"

लोमेश - "नमस्कार, बस आप जैसे लोगों की दुआ है। एक छोटी सी मदद चाहिए थी।"

विशाल - "ज़रूर, बताएं।"

लोमेश - "अब बच्चा बड़ा हो गया है, तो उसके लिए कार ली है। हमारे घर के बाहर तो मेरी कार और कंपनी का टेम्पो रहता है। मैंने देखा आपके घर के बाहर जगह खाली रहती है, आपका घर हमारे ठीक सामने भी है...तो मैं सोच रहा था कि बच्चे की गाड़ी यहीं आपके घर के बाहर पार्क करवा दिया करें।

यह बात सुनकर, पौधे विशाल को गाली देने लगे।

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#ज़हन

Image Credit - Lucas K.