ना जाने कैसे इस किताब पर मेरी पोस्ट रह गई। चलिए तब नहीं, तो अब सही...
विनोद दूबे जी ने कुछ बेहतरीन रचनाएं पिरोई हैं। मेरा सौभाग्य रहा कि इन्हें आम जन से पहले मैंने पढ़ा और "वीकेंड वाली कविता" से जुड़ा।
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लगे हाथ एक कविता अपनी भी छपवा ली। :D
ना जाने कैसे इस किताब पर मेरी पोस्ट रह गई। चलिए तब नहीं, तो अब सही...
विनोद दूबे जी ने कुछ बेहतरीन रचनाएं पिरोई हैं। मेरा सौभाग्य रहा कि इन्हें आम जन से पहले मैंने पढ़ा और "वीकेंड वाली कविता" से जुड़ा।