Freelance Falcon ~ Weird Jhola-Chhap thing ~ ज़हन

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Tuesday, August 13, 2024

कुछ शामें गुज़रती नहीं...


कुछ लंबी शामें सिरहाने पड़ी...
बीतने का नाम न ले रहीं।
कुछ दबी शिकायतें अनकही,
कुछ रूठी सदाएँ अनसुनी।

एक दुनिया को कहते थे सगी,
हमारे मखौल से उसकी महफ़िलें सजने लगी। 

ज़ख्म रिसते हैं,
मर्ज़ की बात नहीं....
सब तो मालूम है,
पर कुछ हाथ नहीं!

जवाब तैयार रखे थे,
सवालों की बिसात नहीं।
इतने सपनों को ठगने वाली...
इस रात की सुबह नहीं।

खैर. .फिर कभी ये दौर याद करेंगे,
गुमसुम हालातों से बात करेंगे...
कभी चलना सिखाया था दुनिया को. ..
फिर कभी इसकी रफ़्तार में साथ चलेंगे।

जय हिंद!

#ज़हन

Wednesday, May 23, 2018

ख्याल...एहसास (ग़ज़ल) #ज़हन


एक ही मेरा जिगरी यार,
तेरी चाल धीमी करने वाला बाज़ार...
मुखबिर एक और चोर,
तेरी गली का तीखा मोड़। 
करवाये जो होश फ़ाख्ता,
तेरे दर का हसीं रास्ता...
कुचले रोज़ निगाहों के खत,
बैरी तेरे घर की चौखट। 

दिखता नहीं जिसे मेरा प्यार,
पीठ किये खड़ी तेरी दीवार...
कभी दीदार कराती पर अक्सर देती झिड़की,
तेरे कमरे की ख़फा सी खिड़की। 
शख्सियत को स्याह में समेटती हरजाई
मद्धम कमज़र्फ तेरी परछाई...
कुछ पल अक्स कैद कर कहता के तू जाए ना...
दूर टंगा आईना। 
जाने किसे बचाने तुगलक बने तुर्क,
तेरे मोहल्ले के बड़े-बुज़ुर्ग। 

...और इन सबके धंधे में देती दख़्ल,
काटे धड़कन की फसल,
मेरी हीर की शक्ल...
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Thursday, January 25, 2018

रहनुमा अक्स (नज़्म) #mohit_trendster


पिघलती रौशनी में यादों का रक़्स,
गुज़रे जन्म की गलियों में गुम शख़्स,
कलियों की ओस उड़ने से पहले का वक़्त।  
शबनम में हरजाई सा रंग आया है,
जबसे तेरे अक्स को रहनुमा बनाया है...

तेरे दर का सरफिरा रास्ता, 
इश्क़ की डोर में वाबस्ता, 
दिल में मिल्कियत...हाथ में गुलाब सस्ता। 
उपरवाले ने अब मेरी दुआओं का हिसाब बनाया है,
जबसे तेरे अक्स को रहनुमा बनाया है... 

नारियल सा किसका नसीब,
माना जिन्हे रक़ीब, 
निकले वो अपने हसीब। 
वक़्त की चुगली में जाने कितना वक़्त बिताया है,
जबसे तेरे अक्स को रहनुमा बनाया है... 

कहना उनको बात पुरानी हो गयी,
बचपन की अंगड़ाई जवानी हो गयी,
बिना पाबंदी मन की मनाही। 
दरख्तों की खुरचन पर दौर की स्याही,
12 सालों पर भारी जैसे एक कुम्भ छाया है,
जबसे तेरे अक्स को रहनुमा बनाया है...

=======
#ज़हन

Thumbnail Art - Gaston S Garcia‎
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Sunday, December 3, 2017

सड़ता हुआ मांस क्या कहेगा? (वीभत्स रस) #nazm #tribute


Revolutionary and Hindi writer Yashpal's 114th birth anniversary, The Government of India issued a commemorative Yashpal Centenary postage stamp (2003).
आज क्रांतिदूत, लेखक यशपाल जी का जन्मदिवस है। इस अवसर पर देशभर में कार्यक्रम आयोजित होते हैं। वैसे तो यशपाल जी हमें 41 वर्ष पहले छोड़ कर जा चुके हैं पर उनका लेखन अबतक देश का मार्गदर्शन करता रहा है और आगे जाने कितनी ही पीढ़ियों की उंगली पकड़कर उन्हें चलना सिखाता रहेगा। उनकी स्मृतियों को याद करते हुए उनके सुपुत्र आनंद जी बताते हैं कि वो लेखन को एक नौकरी की तरह नियम और समय से करते थे। अनेक शैलियों में लिखते हुए अगर उन्हें ऐसी बातों पर लिखना पड़ता जिनसे लोगो को घिन आती है या जिनपर बात करने से लोग बचते हैं तो वे निडरता से लिखते। वहीं आजकल अधिकतर लेखक, कवि खुद पर किसी लेबल लगने के डर से आम जनता के स्वादानुसार लिखने की कोशिश करते हैं। यशपाल जी काव्य नहीं लिखते थे पर हर कला की तरह पद्य में रूचि लेते थे। अपने रचे पागलपन की दौड़ में परेशान समाज की कुत्सित मानसिकता "अच्छा-अच्छा मेरा, छी-छी बाकी दुनिया का" पर चोट करती 'वीभत्स रस' में लिखी नज़्म-काव्य। यशपाल जी को मेरी नज़्म-काव्यांजलि। यह नज़्म आगामी कॉमिक 'समाज लेवक' में शामिल की है (आशा है मैं उनकी तरह निडरता से लिखना सीख सकूँ) नमन! -
सड़ता हुआ मांस क्या कहेगा?
सड़ता हुआ मांस क्या कहेगा? 
बिजबिजाते कीड़ों को सहेगा,
कभी अपनी बुलंद तारीख़ों पर हँसेगा,
कभी खुद को खा रही ज़मीं पर ताने कसेगा।

जब सब मुझे छोड़ गये,
साथ सिर्फ कीड़े रह गये,
सड़ती शख्सियत को पचाते,
मेरी मौत में अपनी ज़िन्दगी घोल गये।

आज जिनसे मुँह चुराते हो,
कल वो तुम्हारा मुखौटा खायेंगे,
इस अकड़ का क्या मोल रहेगा?
सड़ता हुआ मांस क्या कहेगा?

लोथड़ों से बात करना सीख लो,
बंद कमरों में दिल की तसल्ली तक चीख लो!
सड़ता हुआ मांस सुन लेगा, 
अगली दफ़ा तुम्हे चुन लेगा।

जिसे दिखाने का वायदा किया था हमसे,
वो गाँव तो हमारी लाश पर भी ना बसेगा।
खाल की परत फाड़ जब विषधर डसेगा,
सड़ता हुआ मांस क्या कहेगा?

जिसपर फिसले वो किसी का रक्त,
नाली में पैदा ही क्यों होते हैं ये कम्बख्त?
बाकी तो सब राम नाम सत!
उसपर मत रो... 
सुर्ख़ से काला पड़ गया जो,
ये जहां तो ऐसा ही रहेगा,
सड़ता हुआ मांस कुछ नहीं कहेगा!
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Tuesday, July 11, 2017

पैमाने के दायरों में रहना... (नज़्म) #ज़हन


पैमाने के दायरों में रहना,
छलक जाओ तो फिर ना कहना... 
जो जहां लकीरों की कद्र में पड़ा हो
उस से पंखों के ऊपर ना उलझना...
किन्ही मर्ज़ियों में बिना बहस झुक जाना,
तुम्हारी तक़दीर में है सिमटना...

पैमाने के दायरों में रहना,
छलक जाओ तो फिर ना कहना... 
क्या करोगे इंक़िलाब लाकर?
आख़िर तो गिद्धों के बीच ही रहना... 
नहीं मिलेगी आज़ाद ज़मीन,
तुम दरारों के बीच से बह लेना... 

पैमाने के दायरों में रहना,
छलक जाओ तो फिर ना कहना... 
जिस से हिसाब करने का है इरादा,
गिरवी रखा है उसपर माँ का गहना... 
औरों की तरह तुम्हे आदत पड़ जाएगी,
इतना भी मुश्किल नहीं है चुपचाप सहना... 

पैमाने के दायरों में रहना,
छलक जाओ तो फिर ना कहना...
साँसों की धुंध का लालच सबको,
पाप है इस दौर में हक़ के लिए लड़ना...
अपनी शर्तों पर कहीं लहलहा ज़रूर लोगे,
फ़िर किसी गोदाम में सड़ना...
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- मोहित शर्मा ज़हन
#mohitness #mohit_trendster #freelance_talents #trendyaba

Sunday, May 15, 2016

Nazm : Ab Lagta Hai (अब लगता है....) - मोहित शर्मा ज़हन


*) - अब लगता है.... 

मेरे पहरे में जो कितनी रातों जगी,
कब चेहरा झुकाए मुझे ठगने लगी,
पिछले लम्हे तक मेरी सगी,
जानी पहचानी नज़रें अब चुभने लगीं। 
याद है हर लफ्ज़ जो तुमने कहा था
अब लगता है.... 
इश्क़ निभाना इतना भी मुश्किल न था.... 

अटके मसलात पर क़ाज़ी रस्म निभाए,
उम्मीदों में उलझा वो फिर कि... 
...पुराने कागज़ों में वो ताज़ी खुशबू मिल जाए। 
जाते-जाते एक खत सिरहाने रखा था,
अब लगता है.... 
इश्क़ निभाना इतना भी मुश्किल न था....

कागज़ों से याद आया कभी तालीम ली थी.....
कुछ वायदों के क़त्ल पर मिले रुपयों से...
....आसान कसमें पूरी की थी। 
मासूमियत गिरवी रखकर दुनियादारी खरीदी थी... 
यहाँ का हिसाब वगैरह यहीं निपटा कर मरना था, 
अब लगता है.... 
इश्क़ निभाना इतना भी मुश्किल न था....

किसी का हाथ पकडे,
गलत राह पकड़ी,
पीछे जाने की कीमत नहीं,
उनसे नज़रें मिलाने की हिम्मत नहीं...
आगे जाने से इंकार करता मन बंजारा,
गलत सफर तो फिर भी राज़ी,
गलत मंज़िल इसे न गंवारा....

तो मरने तक यहीं किनारे बैठ जाता हूँ,
कोई भटका मुसाफिर आये तो उसे समझाता हूँ...
दूर राहगीर की परछाई में तेरी तस्वीर बना लेता था,
अब लगता है.... 
इश्क़ निभाना इतना भी मुश्किल न था....
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*) - Ab lagta hai.... 

Mere pehre mey jo kitni raaton jagi,
Kab chehra jhukaye mujhe thagne lagi,
pichhle lamhe tak meri sagi,
Jaani pehchaani Nazren ab chubhne lagi.... 
Yaad hai har lafz jo tumne kaha tha,
Ab lagta hai.... 
Ishq nibhaana itna bhi mushkil na tha.... 

Atke maslaat par Qazi rasm nibhaye,
Ummeedon mey uljha wo phir ki, 
Purane kagazon mey wo taazi khushboo mil jaaye,
Jaate-jaate ek khat sirhaane rakha tha.... 
Ab lagta hai.... 
Ishq nibhaana itna bhi mushkil na tha.... 

Kagazon se yaad aaya kabhi taleem li thi.....
Kuch vaaydo ke qatl par mile rupayon se....
....aasaan kasme poori ki thi,
Masoomiyat girvi rakhkar Duniyadaari khareedi thi....
Yahan ka hisaab wagehrah yahin nipta kar marna tha...
Ab lagta hai.... 
Ishq nibhaana itna bhi mushkil na tha.... 

Kisi ka haath pakde,
Galat raah pakdi,
Pichhe jaane ki keemat nahi,
Unse nazren milane ki himmat nahi...
Aage jaane se inkaar karta mann banjara,
Galat safar to phir bhi raazi,
Galat manzil ise na gawara....

To marne tak yahin kinare baith jaata hun,
Koi bhatka musafir aaye to usey samjhata hun...
Door raahgir ki parchaai mein teri tasveer bana leta tha....
Ab lagta hai.... 
Ishq nibhaana itna bhi mushkil na tha.... 

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#mohitness #mohit_trendster #trendybaba #freelance_talents #freelancetalents 

Wednesday, February 17, 2016

Special Edition Mrig Marichika #update


मृग मरीचिका के ख़ास छमाई दोहरे अंक में मेरी रचना "आज फिर उस दर से लौटना हुआ", टून को जगह मिली। संपादक सुरेन्द्र जी का बहुत आभार! 

Friday, November 20, 2015

Kuboolnama (Nazm) - मोहित शर्मा 'ज़हन'


कुबूलनामा (नज़्म)

एक दिलेर कश्ती जो कितने सैलाबों की महावत बनी,
दूजी वो पुरानी नज़्म उसे ज़ख्म दे गयी। 
एक बरसो से घिसट रहा मुकदमा,
दूजी वो पागल बुढ़िया जो हर पेशी हाज़िरी लगाती रही।

मय से ग़म गलाते लोग घर गए,
ग़मो की आंच में तपता वहीँ रह गया साकी,
अपने लहज़े में गलत रास्ते पर बढ़ चले,
.....और रह गया कुछ राहों का हिसाब बाकी।

वीरानों में अक्सर हैरान करती जो घर सी खुशबू ,
आँचल में रखी इनायत घुल रही है परदेसी आबशार में... 
मेरे गुनाह गिनाना शगल है जिसका,
फ़िर भी बैर नहीं करती लिपटी रोटी उस अखबार में। 

रोज़ की शिकायत उनकी, 
बेवजह पुराने सामान ने जगह घेर रखी....
काश अपनी नज़र से उन्हें दिखा पाता,
भारी यादें जमा उन चीज़ों पर धूल के अलावा। 

उलट-सुलट उच्चारण के तेरे मंत्र-आरती चल गए,
रह गए हम प्रकांड पंडित फीके... 
दुनियादारी ने चेहरों को झुलसा दिया,
उनमे उजले लगें नज़र के टीके। 

समाप्त!

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Kubulnama (Nazm)

Ek diler kashti jo kitne sailaabo ki mahavat bani,
Dooji wo purani nazm jo use zakhm de gayi.
Ek barso ghisat raha mukadma,
Dooji wo pagal budhiya jo har peshi haziri lagati rahi.

Mayy se gham galaate log ghar gaye,
Ghamon ki aanch mein tapta wahin reh gaya saaki,
Apne lehze mein galat raaste par badh chale,
.....aur reh gaya kuch raahon ka hisaab baaki.

Veerano mein aksar hairaan karti jo ghar si khushboo,
Aanchal mein rakhi inayat ghul rahi pardesi aabshar mein...
Mere Gunaah ginana shagal hai jiska,
Phir bhi bair nahi karti lipti roti us akhbar mein.

Roz ki shikayat unki,
Bewajah puraane samaan ne jagah gher rakhi....
Kaash apni nazar se unhe dikha paata,
Bhaari yaaden jama un cheezon par dhool ke alawa.

Ulat-sulat uchchharan ke tere mantra-aarti chal gaye,
Reh gaye hum prakaand pandit pheeke...
Duniyadaari mein jhulse chehre,
Unme ujle lage nazar ke teeke....

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 बहुत समय बाद कुछ शायरी की है, वैसे निरंतर कुछ ना कुछ लिख रहा हूँ पर यह ब्लॉग कम अपडेट कर रहा हूँ। वैसे नेट पर मेरा पिछले कुछ महीनो का काफी काम मिलेगा। 
#mohitness #mohit_trendster #freelance_talents

Wednesday, October 16, 2013

रूह गुलाम-ए-हिन्द दिवानी...

Dedicated to Kargil War Heroes!



रूह गुलाम-ए-हिन्द दिवानी, 
सजी दुलहन सी बने सयानी।

फसलों की बहार फिर कभी ....
गाँव के त्यौहार बाद में ...
मौसम और कुछ याद फिर कभी ....
ख्वाबो की उड़ान बाद में। 
मांगती जो न दाना पानी,
जैसे राज़ी से इसकी चल जानी?
रूह गुलाम-ए-हिन्द दिवानी। 

वाकिफ है सब अपने जुलेखा मिजाज़ से, 
मकरूज़ रही दुनिया हमारे खलूस पर,
बस चंद सरफिरो को यह बात है समझानी, 
रूह गुलाम-ए-हिन्द दिवानी। 


वक़्त की धूल ज़हन से झाड़,
शिवलिंग से क्यों लगे पहाड़?
बरसो शहादत का चढ़ा खुमार,
पीढ़ियों पर वतन का बंधा उधार,
काट ज़ालिम के शीश उतार। 
बलि चढ़ा कर दे मनमानी,
रूह गुलाम-ए-हिन्द दिवानी। 

यहीं अज़ान यहीं कर कीर्तन,
यहीं दीवाली और मोहर्रम,
मोमिन है सब बात ये जानी,
रूह गुलाम-ए-हिन्द दिवानी। 

काफिर कौन बदले मायने,
किसी निज़ाम को दिख गए आईने। 
दगाबाज़ जो थे ....चुनिन्दा कर दिये,
आड़ लिए ऊपर दहशत वाले ...कुछ दिनों मे परिंदा कर दिये। 
ज़मीन की इज्ज़त लूटने आये बेगैरत ....
जुम्मे के पाक दिन ही शर्मिंदा हो गये। 

बह चले हुकुम के दावे सारे ....जंग खायी बोफोर्स ....
छंट गया सुर्ख धुआं कब का....दब गया ज़ालिम शोर ....
रह गया वादी और दिलो में सिर्फ....Point 4875 से गूँजा "Yeh Dil Maange More!!"
ज़मी मुझे सुला ले माँ से आँचल में ....और जिया तो मालूम है ...
अपनी गिनती की साँसों में यादों की फांसे चुभ जानी ...
रूह गुलाम-ए-हिन्द दिवानी। 



Tuesday, October 23, 2012

मेरी आज़ादी का रुआब! (Tibet's Non-Violent Struggle)

Self-immolation earlier today in Tibet. This photo shows 58 year old Dorjee Rinchen who had self-immolated near Labrang Monastery, calling for freedom in Tibet and return of the Dalai Lama. Dorjee Rinchen is the 6th person to have self-immolated in this month alone. Faced with unendurable conditions, Tibetans continue to light themselves on fire as their only means of protest - getting arrested and enduring years of torture in jail not being considered a viable alternative. More than fifty have done so in recent months.

I dedicate this poem to Non-Violent Struggle of the Tibetan People.....


दौर को चंद बातों से लाँघने की बिसात...
खुद मे धूल और चिंगारी समेटे वो किताब..
बंद हाथो की मुट्ठी मे वो ख्वाब...
आ छीन मुझसे मेरी आज़ादी का रुआब!! 

मेरे दिल की लौ से चिढती जो ये रात..
मारा गया जो नहीं चला खूनी कारवाँ के साथ...

कारवाँ से अलग अपने आशिएं मे है एक जिंदा लाश...
तेरा निज़ाम नहीं फ़ब्ता उसे, ओ नवाब..
आ छीन मुझसे मेरी आज़ादी का रुआब!!

जंग तुझसे नहीं तेरे खयालो से है...
बात मेरे ज़हन मे जलते सवालो
से है...
गलत होकर भी सही ठहराये गये जवाबो से है...
जिनके पीछे रहकर तू राज करता उन हिजाबो से है...

अपने लोगो
की झुकी आँखों मे झाँक...उनमे...
...ज़ालिम तेरा अक्स नहीं...
....दिखेगा तुझे...मेरी आज़ादी का रुआब!!

शुक्रिया भी अदा करना है तेरा...
तेरे कायदों की कैद ने ही सिखाया असल जेहाद...

तेरी बंदिशें नाकाफी रहीं.. ..
मेरी आँखें तो कब से खुला आसमाँ देख रहीं...

कभी इस आसमाँ के नीचे हटेगा तेरा संगदिल नकाब...
तब फुर्सत मे देखना...मेरी आज़ादी का रुआब!!

तेरे फ़रेबो से बड़ा...
फितरत से बुजदिल सदा..
हर मौसम मे मनहूस खड़ा..
तेरी हर बुराई पर भारी
पड़ा...
बड़ा
ढीट है यह....मेरी आज़ादी का रुआब!!

- Mohit Sharma (Trendster/Trendy Baba)

Thursday, December 23, 2010

मेरे शहर मे हुई सेहर...

हुयी जो रौशनी कम तेरी यादों से नम आँखों मे, 

उसको भी मौसम की धुंध मान लिया...

दरो-दिवार रंगी कालिख से शहर वालो ने,

उसी कालिख से शहर भर मे तेरा नाम लिखा.... 


मिली बरसात ज़मी से तेरी महक लायी,

क़ुदरत भी सीख गयी इंसानों सी रुसवाई. 

देखी हर रस्म सरे-आम पस्त होते हुए, 

कितने ज़हरीले लफ्ज़ ज़ेहन मे पेवस्त होते हुए. 


दिवाली-ईद तन्हाई मे मना ली, 

कोई मिलने आया नहीं तो तेरी याद की जिल्द ख़ुद पर चढ़ा ली! 

मिलने की उम्मीद कभी न छूटी...

वो तो ज़माने की मसखरी से हिम्मत टूटी...


बरसो सिर्फ सपने जो देखे तेरे,

आँखें रोज़ तेरा धोखा दिखाती...तो कैसे मान लूँ की अब तू इतने पास है मेरे? 

तेरे अक्स को खुद मे कहीं कैद रखा था, 

पता नहीं की अब तू सामने है...या तेरा अक्स कैद से रिहा हुआ?

Saturday, December 11, 2010

साहिल को समीर माना....





मुद्दत से दौड़ा किये जिस जन्नत सी मंजिल की ओर, 
पहुँचने पर एहसास हुआ की सफ़र मे साथ लगी धुल ने उसको बेनूर किया.
और जाना की दस्तूरो ने हमेशा झूठ  कहा.....
रास्ता तो बिन बोले ही धूल बनकर साथ हो लिया....
ओर एक ये मंजिल है जो पास आने पर बहाने बनाती है. 

जिसको रूहानी जान छोड़ी दुनिया सारी, 
उनकी मोहब्बत मे थी दुनियादारी,
आखरी दम तक लड़ने की ख्वाइश मे जाने कहाँ से दरारें आ गयी?
जिसपर नाज़ किया करते थे उस सुर्ख रंग मे कैसे काली बुज़दिली छा गयी?

शायद उस आसमाँ मे फ़रिश्ते अक्सर हमसे बिफरा किये, 
हमसफ़र से हाथ की पकड़ ढीली रखी...फिर भी नसों तक नाखून गड़ गये. 


थम गयी अब रफ़्तार कुछ ऐसे...हम थक गये...
और रुके हुए साहिल को अपना समीर मान बैठे!



मुद्दत से हमने ख्वाबो  को देखना छोड़ दिया, 
कटीली राहों पर हर कदम ने रंगीन निशान छोड़ दिया. 
मंजिलो के सामने मुकद्दर मुकर गया,
ज़माने को साथ लेने के इंतज़ार मे ज़माना ही गुज़र गया.



Wednesday, November 17, 2010

...अब वक़्त है जाने का!



हर ख्वाइश मे अक्स था इस अफसाने का,
हर कोशिश मे सपना था तुझे पाने का!
कल तलक मौके मिले तो दिल नादान बना,
आज हालत ने मौको को किया पल मे फ़ना!

माना की आज गर्दिश मे सफ़र करता हूँ,
ज़हन मे मेरे है पेवस्त हर अफसाना तेरा!
छुपाया था जिस गम को बड़ी खूबी से,
बरस गए बादल तेरी आँखों से वही नमी लेके!

जशन की आड़ मे रुखसत हुआ...साजिश थी मेरी,
बिना रुलाये तुझसे हाथ जो छुड़ाना था!
मुड़ा जो तुझसे तो खुदगर्ज़ क्यों मान लिया?
ये भी एक जरिया है गम को छुपाने का!

ज़माने भर की बुराई लादे फिरता हूँ फिर भी मगर....
पाक साफ़ दिखता है आँखों मे तेरी अक्स दीवाने का?
अपनी हस्ती पर जो हँसती फिरती...
अब वक़्त है उस दुनिया को आइना दिखाने का!

Wednesday, August 25, 2010

ये उनका शहर है!





भोपाल स्थित यूनियन कार्बाइड कम्पनी के कारखाने से एक हानिकारक गैस का रिसाव हुआ जिससे लगभग 15000 से अधिक लोगो की जान गई तथा बहुत सारे लोग अंधापन के शिकार हुए. भोपाल गैस काण्ड विश्व इतिहास का ऐसा नासूर है जो हर दिसम्बर मे बहुत बुरी टीस देता है. हालाँकि, इस घटना से पीड़ित लोगो की संख्या लाखो मे है और वहाँ जन्म लेने वाले बच्चे अब भी अपंग पैदा होते है. मुझे ये नहीं जानना की किसकी गलती है है.....मुझे बस 26 सालो के दर्द की दवा और उन करोडो आंसुओ को पोछने वाले हाथ चाहिए जिनसे सत्ता और पैसे की गंध ना आये.

जब भोपाल गैस काण्ड के दोषियों की बात होती है तो ऐसा लगता है हर चीज़ उन्होंने खरीद ली है...शायद ये शहर भी! ये ग़ज़ल भोपाल गैस त्रासदी पर लिखी है.


ये उनका शहर है!

कातिल आँधियों मे किसका ये असर है?
दिखता क्यों नहीं है हवा मे जो ज़हर है?
चीखें सूखती सी कहाँ मेरा बशर है?
ये उनका शहर है....

धुँधला आसमां क्यों शाम-ओ-सहर है?
आदमखोर जैसा लगता क्यों सफ़र है?
ढलता क्यों नहीं है ये कैसा पहर है?
ये उनका शहर है....

जानें लीलती है ख़ूनी जो नहर है.
माझी क्यों ना समझे कश्ती पर लहर है?
हुआ एक जैसा सबका क्यों हषर है?
ये उनका शहर है...

रोके क्यों ना रुकता...हर दम ये कहर है?
है सबके जो ऊपर..कहाँ उसकी मेहर है?
जानी तेरी रहमत किस्मत जो सिफर है!
ये उनका शहर है....

इंसानों को तोले दौलत का ग़दर है!
नज़र जाए जहाँ तक मौत का मंज़र है!
उजड़ी बस्तियों मे मेरा घर किधर है?
ये उनका शहर है...