Freelance Falcon ~ Weird Jhola-Chhap thing ~ ज़हन

Wednesday, February 21, 2018

Bada Munh, Badi Baat - The Mohit Sharma Podcast Show


Nazariya Now Presents : Bada Munh, Badi Baat
''The Mohit Sharma Podcast Show''
Hindi, English
Coming Soon....

नज़रिया नाउ के सौजन्य से एक ऑडियो-पॉडकास्ट शो शुरू कर रहा हूँ। इस पॉडकास्ट शो में सामाजिक, हास्य, कला, प्रेरणादायक विषयों पर बोलूँगा, कभी काव्य-कहानी भी होंगी। आशा है इस नये माध्यम से आप सबके मन में और अधिक जगह बना सकूँ। 


Available: Vimeo, Soundcloud, 4Shared, Clyp, Dailymotion, Tumblr etc.

Friday, February 16, 2018

Saturday, February 3, 2018

नये उपन्यास में नज़्म


शुभानंद कृत मास्टरमाइंड (जावेद, अमर, जॉन सीरीज) नॉवेल में प्रकाशित नज़्म।


अभी तो सिर्फ मेरी मौजूदगी को माना,
दिमाग में दबे दरिन्दों से मिलकर जाना। 
तुझे तड़पा-तड़पा कर है खाना,
पीछे दरिया रास्ता दे तो चले जाना।

कभी किसी की चीख से आँखों को सेका है?
कभी बच्चे का जिस्म तेज़ाब से पिघलते देखा है?
अभी वक़्त है...रास्ते से हट जाओ,
किसी का दर्द दिखे तो पलट जाओ।
जिसकी दस्तक पर दिलेरी दम तोड़ती है...
मौत से नज़रे मत मिलाओ!

क़ातिल आँधियों मे किसका ये असर है?
दिखता क्यों नहीं है हवा मे जो ज़हर है?
चीखें सूखती सी कहाँ मेरा बशर है?
ये उनका शहर है...

धुँधला आसमां क्यों शाम-ओ-सहर है?
आदमख़ोर जैसा लगता क्यों सफ़र है?
ढ़लता क्यों नहीं है ये कैसा पहर है?
ये उनका शहर है...

जानें लीलती है ख़ूनी जो नहर है.
माझी क्यों ना समझे कश्ती पर लहर है?
हुआ एक जैसा सबका क्यों हश्र है?
ये उनका शहर है...


रोके क्यों ना रुकता...हर दम ये कहर है?
है सबके जो ऊपर..कहाँ उसकी मेहर है?
जानी तेरी रहमत किस्मत जो सिफर है!
ये उनका शहर है....

इंसानों को तोले दौलत का ग़दर है!
नज़र जाए जहाँ तक मौत का मंज़र है!
उजड़ी बस्तियों मे मेरा घर किधर है?
ये उनका शहर है...
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#ज़हन

हाल ही में आयोजित सूरज पॉकेट बुक्स कार्यक्रम में यह नज़्म मंच पर पढ़ी। 

Wednesday, January 31, 2018

Sooraj Pocket Books Event, Delhi (January 2018)


28 जनवरी 2018 को पीतमपुरा, दिल्ली में सूरज पॉकेट बुक्स के पहले आयोजन में शिरकत करने और मंच संचालन का मौका मिला। लेखक शुभानंद जी के नये नॉवेल "मास्टरमाइंड" में मेरी नज़्म शामिल थी। इस तरह सूरज पॉकेट बुक्स में यह मेरी तीसरी पोएट्री थी। भविष्य में इस प्रकाशन के साथ कुछ और किताबों में मेरा काम पढ़ने को मिलेगा। 

with Anadi Shubhanand, Deven Pandey

यह इवेंट सफल रहा...जहाँ कई युवा लेखक, कवि दिख रहे थे, वहीं परशुराम शर्मा जी, आबिद रिज़वी जी, आशा शैली जी और किशोर श्रीवास्तव जी जैसे वरिष्ठ साहित्यकार मौजूद थे। अपनी कुछ नज़्म, काव्य पेश किये और कुछ यादगार साक्षात्कार लिये। पहली एंकरिंग में कई बातें पता चली, आगे ध्यान रखकर और बेहतर करने की कोशिश रहेगी।


with Jai Khohwal, Anshu Dhusia, Mithilesh Gupta

with Co-host Mithilesh Gupta


जल्द ही इवेंट से जुड़ीं अन्य बातें, साक्षात्कार और नज़्म की वीडियो-ऑडियो पोस्ट होंगी। 

Friday, January 26, 2018

Aksar Shab-e-Tanhai mein (Reshma Song Cover) | Mohit Trendster


अक्सर शब-ए तन्हाई में... (स्वर्गीय रेशमा कवर गीत) - मोहित शर्मा ज़हन
बड़ी हिम्मत जुटाकर यह नज़्म गाने की कोशिश कर रहा हूँ। मेरे ऑडियो पॉडकास्ट, वक्तव्य, हास्य और फिक्शन आप सबने पसंद किये हैं, आशा है येकवर आपको पसंद आये।

Aksar shab-e-tanhai mein (Reshma ji cover song) #folk #reshma #mohit_trendster 
Other web-links: VimeoSoundcloudTumblrMediafire4shared etc

Thursday, January 25, 2018

रहनुमा अक्स (नज़्म) #mohit_trendster


पिघलती रौशनी में यादों का रक़्स,
गुज़रे जन्म की गलियों में गुम शख़्स,
कलियों की ओस उड़ने से पहले का वक़्त।  
शबनम में हरजाई सा रंग आया है,
जबसे तेरे अक्स को रहनुमा बनाया है...

तेरे दर का सरफिरा रास्ता, 
इश्क़ की डोर में वाबस्ता, 
दिल में मिल्कियत...हाथ में गुलाब सस्ता। 
उपरवाले ने अब मेरी दुआओं का हिसाब बनाया है,
जबसे तेरे अक्स को रहनुमा बनाया है... 

नारियल सा किसका नसीब,
माना जिन्हे रक़ीब, 
निकले वो अपने हसीब। 
वक़्त की चुगली में जाने कितना वक़्त बिताया है,
जबसे तेरे अक्स को रहनुमा बनाया है... 

कहना उनको बात पुरानी हो गयी,
बचपन की अंगड़ाई जवानी हो गयी,
बिना पाबंदी मन की मनाही। 
दरख्तों की खुरचन पर दौर की स्याही,
12 सालों पर भारी जैसे एक कुम्भ छाया है,
जबसे तेरे अक्स को रहनुमा बनाया है...

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#ज़हन

Thumbnail Art - Gaston S Garcia‎
My second SoundCloud Channel

Sunday, January 14, 2018

#Update Kids Magazine

Hey everyone! :D I have recently started working as a voice-over artist and author (different age groups) for bilingual kids magazine Neev. नींव बाल पत्रिका के विभिन्न आयु वर्गों के लिए वॉइस-ओवर (ऑडियो) और लेखन शुरू किया।

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...also Co-judged Kalamkaar 2017 Contest (RD Magazine)
#neev #mohitness #voicetalent #update #mohit_trendster

Thursday, December 28, 2017

"काश मैं अमिताभ बच्चन का अंतर्मन होता..." (हास्य)


मैंने एक कहानी लिखी और मेरा अपने अंतर्मन से वार्तालाप शुरू हो गया। 

अंतर्मन - "छी! क्या है ये?"

मोहित - "कहानी है और क्या है?"

अंतर्मन - "ये सवाल जैसे जवाब देकर मेरा पैटर्न मत बिगाड़ा करों! 4/10 है ये...इस से तुम्हारा नाम जुड़ा हुआ है। पढ़ के लोग क्या कहेंगे?"

मोहित - "ठीक है, मैं कुछ चेंज करता हूँ।"

बार-बार बदलाव के बाद भी अंतर्मन पर कुछ ख़ास अंतर नहीं पड़ा...

अंतर्मन - "किसी सिद्ध मुनि का घुटना पड़ना चाहिए तुम्हारे खोपड़े पर तभी कुछ उम्मीद बनेगी। 4.75/10 हुआ अब!"

मोहित - "ये दशमलव की खेती का लाइसेंस कहाँ मिलता है? कहानी में सात बार बदलाव कर चुका हूँ। अब और शक्ति नहीं है।"

अंतर्मन - "हाँ तो मुझे क्यों बता रहे हो? कैप्सूल लो...जिसका एड पढ़ने में मज़ा आता है।"

मोहित - "मैं यही फाइनल कर रहा हूँ!"

अंतर्मन - "अरे यार तुम तो बिना बात गुस्सा हो जाते हो...रिलैक्स, अपना ही मन समझो! हमारा एक समझौता हुआ था। याद है? मैंने कहा था कि अगर मुझे कोई रचनात्मक काम 6/10 से नीचे लगेगा तो वो फाइनल नहीं होगा। तुमने लंबे समय तक माना भी वो नियम तो अब क्या दिक्कत है?"

मोहित - "इतनी टफ रेटिंग कौन करता है?"

अंतर्मन - "तेरे भले के लिए ही करता हूँ। तेरे नाम से जुड़े काम अच्छे लगें।"

मोहित - "भक! इस चक्कर में कितने आईडिया मारने पड़े मुझे पता है? आज से कोई नियम-समझौता नहीं!"

अंतर्मन - "काश मैं अमिताभ बच्चन का अंतर्मन होता।"

मोहित - "फिर पूरी ज़िन्दगी में 4 फिल्में करते अमिताभ साहब। इतना सर्व चूज़ी अंतर्मन लेके फँस जाते...कच्छों के डिज़ाइन तक में उलझ जाता है और बात अमित जी की करता है!"

अंतर्मन - "मतलब ये कहानी फाइनल है?"

मोहित - "हाँ! हाँ! हाँ!"

अंतर्मन - "एक मिनट, बाहर की शादी के शोर में सुना नहीं मैंने। ये 'हा हा हा' किया या तीन बार हाँ बोला?"

गुस्से में मोहित के जबड़े भींच गये। 

अंतर्मन - "अच्छा सुनो ना..."

मोहित - "हम्म?"

अंतर्मन - "6/10 हो सकता है। अंत में एक कविता जोड़ दो तो उसके ग्रेस मार्क्स मिलेंगे।"

मोहित - "इस कहानी के साथ काव्य का मतलब नहीं बनता और..."

अंतर्मन - "प्लीज ना जानू!"

मोहित - "अच्छा बाबा ठीक है। जाओ बाहर जाके खेलो और ज़्यादा दूर मत जाना।"

समाप्त!
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Art - Ester Conceiçao‎
#ज़हन

Wednesday, December 27, 2017

एक सीमान्त (लघुकथा)


नम्रता को उसके गायक पति शिबू भोला ने डेढ़ घंटे बाद फ़ोन करने की बात कही थी। बेचैनी में उसने जैसे डेढ़ घंटे के 5400 सेकण्ड्स पूरे होते ही शिबू को फ़ोन मिलाया। 

"हैलो!"

"हाँ हैलो...अभी गाड़ी में हूँ..."

...पर नम्रता को उस सब से कहाँ मतलब था। शिबू की आवाज़ से वो भांप भी चुकी थी कि कॉल जारी रखने से कोई परेशानी नहीं होगी। 

"क्या रहा?"

"हाँ, मेरे साथ 2 रिकॉर्डिंग करेंगे ये लोग।"

नम्रता चहक उठी। काफी समय से खाली और परेशान चल रहे शिबू को एक बार फिर काम मिल गया था। 

कुछ देर बाद शिबू की तेज़ आवाज़ सुनकर नम्रता बाहर आयी। शिबू अपनी बेल्ट से गेट के गार्ड को बुरी तरह पीट रहा था। गार्ड अपने रेडियो पर शिबू का ही मशहूर गाना सुन रहा था। नम्रता और ड्राइवर ने उसे रोका और अचानक इस गुस्से का कारण पूछा। शिबू भोला किसी बच्चे की तरह ज़मीन पर बैठकर रोने लगा। 

शिबू - "7 एल्बम आ गयी हैं! लेकिन बारह साल से सब $@#&*# बस एक हिट "चाइना की चुन्नी" गाना सुने जा रहे हैं और हर जगह मुझसे गवाए जा रहे हैं। ढाई सौ गाने रिकॉर्ड रखे हैं, उन्हें कोई म्यूजिक प्रोडूसर नहीं खरीदता। आज भी चाइना की चुन्नी के 2 रीमिक्स की रिकॉर्डिंग की डील मिली है। 7 रीमिक्स पहले ही हो चुके हैं। मन किया सूअरों को वहीं मार दूँ। फ़िर याद आया तू जो झूठा हँसते हुए इन्वेस्टमेंट, कूपन-डिस्काउंट फलाना की बातें करती है ना...वो साल-दो साल पहले तक तुझे पता भी नहीं था क्या होते हैं। तेरी झूठी हँसी में ढका दर्द हर रात मेरे सीने पर आ जाता है, फिर मैं करवट तक नहीं ले पाता। आज से 50 साल बाद कोई कहेगा की एक-दो गानों पर पूरी ज़िन्दगी रोटी खा गया...गाने तो मैं हज़ार बनाता पर दुनिया ने उस एक-दो के आगे कुछ सुनना ही नहीं चाहा..."

समाप्त!
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#ज़हन
Art - Felix Benjamin 

Saturday, December 23, 2017

जासूस सास (हास्य कहानी)


लक्ष्मी कुमारी स्वेटर बुनने से तेज़ गति से अपनी बहु पर विचार बुन रही थीं।  वैसे उनकी बहु शताक्षी ठीक थी....बल्कि जैसी कुलक्षणी, कलमुँही बहुएं टीवी और अख़बारों में दिखती हैं उनके सामने तो शताक्षी ठीक होने की पराकाष्ठा ही समझो। फिर भी लक्ष्मी को एक बात परेशान करती थी। केवल उन्हें ही नहीं, कॉलोनी की कुछ और सास भी इस मुद्दे पर चिंतित थीं। कई घरों की 25 से लेकर 40 साल की महिलाएं आपस में अक्सर झुंड में घंटों पता नहीं क्या बतियाती रहती थीं। बाहर से लगता कि मानो चुगलियों की कितने पहाड़ चढ़ रही हैं। बड़ा और सभी कोण से ढका घर होने के कारण अक्सर दर्जन भर स्त्रियां शताक्षी के घर पर डेरा जमाती। 

मोहल्ले की सासों से जब रहा नहीं गया और उनकी मिसमिसी का रौला-रप्पा हो गया तो सबने पैसे मिलाकर अच्छी क्वालिटी के माइक्रोफोन और कैमरे लक्ष्मी कुमारी के आँगन में लगवाये, जहाँ बहुओं की चुगलियों का गोरख धंधा चलता था। दो दिन बाद वीकेंड को बहुओं की मैराथन बैठक हुई। अगले दिन सत्संग का बहाना बनाकर वृद्ध जेम्स बांडनियाँ गुप्त अड्डे पर मिलीं। कॉलोनी की सासें अपनी साँसें थाम कर बहुओं की मीटिंग की फुटेज देखना शुरू करती हैं। 

"दीदी, कल छुटकी की वजह से छोटा भीम हार गया। मैं तो दूध उबलने रखने जा रही थी कि मीनू ने बताया कि कालिया को जीत कर टाइटल मिल गया। इतनी झुंझलाहट हुई कि मैं कच्चा दूध ही पी गयी और मीनू की अभ्यास पुस्तिका फाड़ी सो अलग..." 

"हाँ! इस वजह से कल पूरा दिन मेरा भी मूड ऑफ रहा। ऑफिस से लौटे पीकू के पापा पुच्ची करने को बढे तो ऐसी कोहनी मारी मैंने...नील पड़ गया उनके होंठों पर। हुँह! भला कालिया को जिताना कोई बात हुई?"

छोटा भीम पर गंभीर चर्चा के बीच शिवा कार्टून सीरीज की फैन शताक्षी बोली। 

"...पेड़ाराम ने अपनी पड़ोसन के चक्कर में शिवा का फूफा जो किडनैप करवाया उस से मेरा दिल बैठ गया सच्ची। अरे! आपने सुना...शक्तिमान को दोबारा शुरू कर रहे हैं।"

उसके बाद मोटू पतलू, माइटी राजू, गली गली सिम सिम, डोरेमॉन, शिनचैन पर शिद्दत से चर्चा हुई। इतना ही नहीं बीच-बीच में महिलाओं ने कार्टून सीरियल्स के मंगल गीत...टाइटल सांग भी गुनगुनाये। गृहणियों को जब फुर्सत मिलती थी तब टीवी के सामने बच्चे होते, जो कोई और चैनल चलने ही नहीं देते थे। कोई विकल्प ना होने के कारण थोड़े समय बाद कार्टून्स, एनिमेशन में बच्चों की तरह महिलाओं को भी मौज आने लगी और देखते ही देखते यह कार्टून क्रान्ति महिला मोर्चा बन गया। 

बहुओं की बुराई और गप्पों के लिए ब्रेड रोल, पकोड़े तल कर लायी एक सास निराशा में बोली। 

"भक..."

ये केवल एक 'भक' नहीं बल्कि 'खोदा पहाड़ निकली चुहिया' वाली हार की स्वीकृति थी। गुप्त फुटेज देख रही सास मंडली के सारे अंदेशों का मुरब्बा बन चुका था। धूलधूसरित पहलवान की तरह सब अपने कार्टूनी सत्संग से घर लौट आयीं। 

समाप्त! भक!
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Art - Sebastien K.
#ज़हन