Freelance Falcon ~ Weird Jhola-Chhap thing ~ ज़हन

Thursday, November 16, 2017

दो प्रकार के कलाकार (लेख) #freelance_talents

Artwork - Matt S.

एक कला क्षेत्र के प्रशंसक, उस से जुड़े हुए लोग उस क्षेत्र में 2 तरह के कलाकारों के नाम जानते हैं। पहली तरह के कलाकार जिनके किये काम कम हैं। फिर भी उन्होंने जितना किया है सब ऐसे स्तर से किया है कि प्रशंसकों, क्षेत्र के बाहर कई लोगों को उनके बारे में अच्छी जानकारी है। दूसरी तरह के कलाकारों के काम की संख्या बहुत अधिक है पर उनके औसत काम की पहुँच कम है। उदाहरण - मान लीजिए कलाकार #01 ने एक नामी प्रकाशन में इंटर्नशिप की और वहाँ उसे बड़े प्रकाशनों के साथ काम करने का अवसर मिला। उसने अपने जीवनकाल में 31 पुस्तकों में चित्रांकन किया और बड़े प्रकाशन में छपने के कारण उसकी हर पुस्तक के चर्चे देश-दुनियाभर में हुए। साथ ही बड़े नाम के कारण उसकी कलाकृतियों की कई प्रदर्शनियाँ लगीं। अब मिलिए कलाकार #02 से जो बचपन से कला बना रहा है। सीमित साधनों, अवसरों के बीच कुछ स्थानीय प्रकाशनों के साथ लगातार काम कर रहा है। उसे अब खुद याद नहीं कि उसने कला में अपने जीवन के कितने करोड़ क्षणों की आहुति दी है। कभी-कभार इंटरनेट या किसी प्रदर्शनी में वायरल हुई कलाकृति से उसका नाम उस क्षेत्र में रूचि रखने वाले लोगों को दिख जाता है। सालों-साल 15-20 बार यह नाम सुनकर लोग कह देते हैं कि "हाँ, कहीं सुना हुआ लग रहा है ये नाम..." बस ये कुछ सांत्वना मिल जाती है। बाकी क्षेत्र के बाहर तो इतना भी दिलासा नहीं। कलाकृतियों की संख्या और कला में प्रयोग, विविधता की तुलना करें तो कलाकार #02 ने अपने जीवन में जितना काम किया है उसमे से 36 कलाकार #01 निकल आयें। 

कलाकार #01 को घनत्व/नाम/भाग्य श्रेणी और कलाकार #02 को वॉल्यूम (मात्रा) बेस्ड श्रेणी में रखा जा सकता है। ज़रूरी नहीं पूरे जीवन कोई एक श्रेणी में रहे पर अधिकांश कलाकार एक ही श्रेणी में अपना जीवन बिता देते हैं। कई लोगों का तर्क होता है कि अगर किसी में अपने काम को लेकर लगन-पैशन, एकाग्रता है तो उसे सफलता मिलती है बाकी बातें केवल बहाने हैं। यह बात आंशिक सच है पूरी नहीं। यहाँ दोनों श्रेणी के कलाकार सफल हैं। पहला कलाकार अपनी मार्केटिंग और पैसे के मामले में सफल हुआ है लेकिन कला की साधना के मामले में दूसरा कलाकार सफल है, उसके लिए तो यही सफलता है कि सारे जीवन वह कला में लीन रहे। अब ये देखने वाले पर है कि वह दुनियादारी में रहकर देख रहा है या दुनियादारी से ऊपर उठकर। ध्यान देने योग्य बात ये कि कई असफल लोग भाग्य को दोष देते हुए खुद को मात्रा बेस्ड (कलाकार #02) की श्रेणी में मान लेते हैं जबकि उसके लिए भी कई वर्षों की मेहनत लगती है। दो-चार साल या और कम समय कहीं हाथ आज़मा किस्मत को दोष देकर वो क्षेत्र छोड़ देने वाले व्यक्ति को इन दीर्घकालिक श्रेणियों में नहीं गिना जा सकता। 

यहाँ किसी को सही या ग़लत नहीं कहा जा रहा। जीवन के असंख्य समीकरण कब किसको कहाँ ले जायें कहा नहीं जा सकता। अगर आप किसी भी तरह की कला चाहे वो संगीत, लेखन, काव्य, नृत्य, पेंटिंग आदि में रूचि लेते हैं तो कोशिश करें की अपनी तरफ से अधिक से अधिक वॉल्यूम बेस्ड श्रेणी के कलाकारों के काम तक पहुँचे, उन्हें प्रोत्साहित करें, अन्य लोगों को उनके बारे में बतायें क्योकि उनकी कला आपतक आने की बहुत कम सम्भावना है। बड़े मंच के सहारे कलाकार #01 का काम तो आप तक आ ही जायेगा। 
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Tuesday, November 14, 2017

इंटरनेटिया बहस के मादक प्रकार (व्यंग लेख) #ज़हन


दो या अधिक लोगों, गुटों में किसी विषय पर मतभेद होने की स्थिति के बाद वाली चिल्ल-पों को बहस कहते हैं। वैसे कभी-कभी तो विषय की ज़रुरत ही नहीं पड़ती है। दूसरी पार्टी से पुराने बैकलॉग की खुन्नस ही बिना मतलब की बहस करवा देती है। बहस में उलझे लोगों के व्यक्तित्व निर्भर करते हैं कि बहस अनियंत्रित होकर उनकी नींदें ख़राब करेगी, पुलिस में रिपोर्ट करवायेगी, ऑनलाइन माध्यम से जूते-घुसंड तक की नौबत आ जायेगी या दूसरे मत का सम्मान करते हुए बात 2-4 मिनट बाद भुला दी जायेगी। इंटरनेटिया बहस और बहस करने वालों के कई प्रकार हैं....इतने हैं कि लेखक को खुद नहीं पता कितने हैं। जितने पता हैं उनपर मंथन शुरू करते हैं। 

*) - धप्पा बहस - इस बहस में पड़ने वालो के पास बहस के लिए समय नहीं होता पर बहस में पड़ने का अद्भुत नशा वो छोड़ना नहीं चाहते। जिसपर उन्हें गुस्सा आ रहा होता है उन्हें एक या दो रिप्लाई का धप्पा मारकर ये लोग निकल जाते हैं। नोटिफिकेशन नहीं आई तो ये बहस जीत गये और अगर आई तो इन्होने तो अपनी तरफ से धप्पा का फ़र्ज़ निभा दिया न? तो भी ये स्वयं को जीता हुआ मान लेते हैं। 

*) - लिहाज़ बहस - इस बहस को कर रहे लोग ऐसे बंधन या मजबूरी मे होते हैं कि खुलकर सामने वाले को कुछ कह नहीं सकते। कहना तो दूर सार्वजनिक प्लेटफार्म पर कन्विंसिंग रूप से हरा भी नहीं सकते। जैसे कोई व्यापारी और उसका पुराना क्लाइंट, फूफा जी जिनका घर में अक्सर आना होता है, स्कूल का जिगरी यार आदि। लिहाज़ बहस में बातों का दंश तोड़ दिया जाता है कि काटना बस औपचारिकता लगती है, उल्टा पोपले दंश से सामने वाले को गुलगुली होती है। 

*) - शान में गुस्ताख़ी बहस - दुनिया में ऐसे भी लोग हैं जिन्हे लगता है कि उनके जन्म पर ग्रहों का यूँ सधा अलाइनमेंट हुआ कि वो कभी ग़लत हो ही नहीं सकते। उनसे मत भिन्न होना आपके विचार नहीं हैं बल्कि एक महापाप है। "पृथ्वी को भगवान की देन...हमसे बहस!" इस महापाप की सज़ा देने का प्रण लेते हैं और बहस के बाहर आपके पीछे पड़ जाते हैं। बिना बहस के अगर उन्हें उनकी मान्यता से नयी या अलग जानकारी मिलती है तो उनके ट्रांसमीटर की रेंज हाथ जोड़ लेती है। अगर वो अपने सर्किल में सबसे ऊपर हैं तो पूरा जीवन दम्भ में गुज़र जाता है। 

*) - लाचार बहस - एक व्यक्ति के पास अपना संतुलित दिमाग है। उसने आम मुद्दों पर अपना मत बना रखा है पर बॉस, घरवाले, प्रेमी-प्रेमिका के दबाव में उसे मजबूरी में बहस में कूदना पड़ता हैं। कई बार तो ऐसे झगडे में जिसमे उसे सामने वाली पार्टी की बात ज़्यादा सही लग रही होती है। ऐसा लगता है कि 2 मुँह एक ही बात बोल रहे हैं। अगर करीबी व्यक्ति को उसका पासवर्ड पता है तो वह अपने प्रियजन की ओर से खुद को वोट तक डाल आता है। 

*) - छद्म बहस - कुछ लोग अपना खाली समय ऑनलाइन और असल जीवन में गुर्गे बनाने में लगाते हैं। धीरे-धीरे ये लोग अपने बड़े समूह के सदस्यों का ऐसा स्नेह जीतते हैं कि फिर ये बहस में सीधे नहीं पड़ते। सही भी तो है, कौन अपना समय बर्बाद करे? ये लोग अपने सिपाहियों को लड़ने भेजते हैं। इतना ही नहीं अगर सिपाही नौसिखिया हो या जंग हार रहा हो तो उसके गुरु मैसेज और फ़ोन पर उससे अपना अनुभव बाँटकर विजयी बनाते हैं। बाहरी दुनिया के लिए इनकी छवि एक सुलझे हुए, निष्पक्ष व्यक्ति की होती है जबकि अंदर ही अंदर ये पूरा कण्ट्रोल रूम चलाने का आनंद ले रहे होते हैं। 

*) - ग़लतफ़हमी बहस - अगर ग़लत या कम जानकारी की वजह से कोई बहस में पड़ जाये तो सार्वजानिक माफ़ी माँगना भारी लगने लगता है। अब अपना चेहरा बचाने के लिए वह तरह-तरह के ध्यान बँटाऊ टैक्टिस अपनाते हैं। हालाँकि, कुछ लोग संभल जाते हैं पर कई पुरानी गलतियों से सीख ना लेते हुए ग़लतफ़हमी में धूल धूसरित हो अपनी छवि ही ग़लत बनवा बैठते हैं। 


*) - टाइमपास बहस - जीवन से निर्वाण प्राप्त करने के बाद बहुत कम चीज़ें बचती हैं जो एक व्यक्ति को सांसारिक मोह में बाँधे रखती हैं। ज़िन्दगी के हर पहलु से बोर होने के बाद एक ख़ास प्रजाति के लोग बहस कला साधना में लीन होना चाहते हैं। इसके लिए एक सेल्स पर्सन की तरह वो जगह-जगह अपनी बहस की पिच देते हैं और 10 में से एक-दो लोग उनकी कामनापूर्ति कर उनके दिन का रियाज़ करवाते हैं। 

*) - अनुसंधान बहस - हज़ारों लोगो के सामने बार-बार मुँह की खाने के बाद भी कइयों की भूख नहीं मरती। कुछ को हारने की ज़रुरत नहीं पड़ती उनके अंदर कुछ डिग्री का ओ.सी.डी. होता है। तो ये लोग मुद्दों के अलावा बहस में आने वाले संभावित लोगो की जाँच-पड़ताल करते हैं। जैसे कोई व्यस्त रहता है, कोई कम पढ़ा-लिखा है, कोई एक विषय पर एक बार समझाने के बाद वापस नहीं आता, किसी को फलाना क्षेत्र की कम जानकारी है, कोई इस जगह नहीं गया आदि। इस जानकारी के आधार पर कुशल कारीगर की तरह ये अपनी बहस के तर्क बनाते हैं। चाहे इनका मत सही हो या गलत पर कालजयी रिसर्च से बहस के मामले में इनका विन-लॉस रिकॉर्ड बड़ा अच्छा हो जाता है। 

*) - पिकी बहस - मान लीजिये किसी मुद्दे से जुड़े 10 बिन्दुओं में से पाँच साहब #01 के सही हैं और पाँच पर साहब #02 की बातें भारी हैं। अब साहब #01 क्या करते हैं कि अपने सही बिन्दु चुन, हर बिन्दु के सहारे महल खड़ा कर उन्ही पर बातें बढ़ाने के प्रपंच रचते हैं। बाकी साहब #02 की सही बातें गयीं गन्ने की मशीन में...जैसे बचपन में बच्चे को नहलाते हुए मम्मी-पापा बोलते हैं - "अच्छी-अच्छी बाबू की! छी-छी कौवे की!" बड़ो की उस बात को ये ऐसी दिल से लगते हैं कि  हमेशा अपनी अच्छी-अच्छी के गिफ्ट, शाबाशी लेने कूद पड़ते हैं लेकिन छी-छी की ज़िम्मेदारी नहीं लेते। 

इनके अलावा अनगिनत बहसों में ऑफ-टॉपिक बहस जिसमें बातों की धारा का कहाँ से बहकर कहाँ चली जाना, ऑनलाइन ट्रोल सेनाओं की महाभारत बहस, हफ्तों चलने वाली टेस्ट मैच बहस आदि शामिल हैं। अंत में यही सलाह है कि अगर बातें आपराधिक, हिंसा भड़काने वाली नहीं हैं तो दूसरों के विचारों का सम्मान करना सीखें। जैसे संभव है एक व्यक्ति किसी छोटे उद्देश्य में लगा हो जिसके लिए दुनिया में काफी कम लोग चाहिए हों पर इसका मतलब ये नहीं अपने बड़े उद्देश्य (जिसके पीछे करोड़ों लोग हैं) की आड़ लेकर आप उसका उपहास उड़ायें या उसके काम को मान्यता ही ना दें। जीवन को समय दें कोई आपकी बहस जीतने-हारने का स्कोर नहीं रख रहा।  
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Wednesday, November 1, 2017

माँ सरस्वती की शिष्या: स्वर्गीय गिरिजा देवी


1949 में आकाशवाणी, इलाहाबाद में अपनी पहली सार्वजनिक प्रस्तुति देने के बाद, पिछले लगभग सात दशकों से विश्वभर में हिंदुस्तानी शास्त्रीय-उपशास्त्रीय संगीत का परचम में लहरा रहीं पद्म विभूषण गायिका गिरिजा देवी का कोलकाता में (24 अक्टूबर, 2017) दिल का दौरा पड़ने से देहांत हो गया। शायद आप उनका नाम पहली बार सुन रहे हों या कहीं सुना-सुना सा लग रहा हो। अगर हाँ...तो इसमें पूरा दोष आपका नहीं है। कला दो प्रकार की होती है। पहली कला जो आम लोगो के पास आती है और दूसरी कला जिसके पास लोगो को जाना पड़ता है, मतलब यह कि एक कला का आनंद लेने के लिए लोगो को अधिक जानकारी की ज़रुरत नहीं पड़ती जबकि दूसरी कला का रस पीने के लिए पहले उस से जुडी कई बातें समझनी पड़ती है। जैसे 100/200 मीटर दौड़ को कोई भी समझ सकता है जबकि बेसबॉल को समझने के लिए पहले उसके अनेक नियमों, अंको का अर्जन आदि को समझना होगा। शास्त्रीय संगीत ऐसी ही कला है जिसका आनंद लेने के लिए पहले उस से जुड़े स्वर, विधाएँ, घरानों, यंत्र आदि को समझना पड़ता है। वहीं फ़िल्मी संगीत अक्सर अपनी सतह पर धुन, वैरायटी परोस देता है तो सुनने वालो को ज़्यादा दिमाग नहीं लगाना पड़ता। यही वजह है कि हम जितना पॉप, रॉक, फ़िल्मी संगीत के सितारों को जानते हैं उतना शास्त्रीय संगीत के गायक, संगीतज्ञों को नहीं जानते। बॉलीवुड या अब यूट्यूब में 2-4 गानों के बाद ही गायकों की फॉलोइंग लाखों-करोड़ों में पहुँच जाती है। ऐसी पहचान का अंश भर पाने के लिए शास्त्रीय संगीत के साधकों को दशकों साधना करनी पड़ती है।  

अपनों द्वारा गिरिजा जी को प्यार से 'अप्पा जी' कहा जाता था और जीवन के लंबे सफर में अप्पा जी कई शिष्यों, श्रोताओं के लिए अपनी हो गई थीं। वैसे तो उन्हें ठुमरी का चेहरा कहा गया पर उप-शास्त्रीय संगीत, पूरब-अंग गायन की कई विधाओं में उन्हें महारत हासिल थी। ठुमरी, दादरा, छंद, ख्याल, टप्प, कजरी, चैती-होली आदि में उनके कुशल, मोहक गायन का जादू दिखता है। 

बनारस संगीत के दो नामी संगीतज्ञों श्री सरजू प्रसाद मिश्र और श्री चंद मिश्र की छाँव में अप्पा जी ने संगीत ही नहीं हर तरह के गायन से पहले मन में वैसे भाव लाने, वाद्ययंत्रो के साथ तालमेल बैठाने की बारीकी सीखी। वर्षों की मेहनत से मिले कण उन्होंने अपने शिष्यों को प्रदान किये पर शायद फिर भी कुछ कण उनके साथ लोम हो गये। ठुमरी की महारानी! प्रेम के अनगिनत भावों को तराशती हुई वो स्वयं ठुमरी में खो जाती थीं। उनके जीवनकाल में राधा-कृष्णा के प्रेम से लेकर आज के युग की उपमाओं तक ठुमरी का रस बिखरता रहा। अपने गायन में वो वासना, फूहड़पन, ज़बरदस्ती के विद्रोह से दूर शान्ति के भाव रखती थीं। ऐसी शान्ति जिसमे साधक और श्रोता दोनों संसार भूलकर खो जाएँ। 

गिरिजा जी को फ्यूज़न (विलय) संगीत से परहेज़ था। उनका मानना था कि अधिक शोर के साथ काव्य को बारीकी से गाना बहुत कठिन है। इस वजह से वो फ्यूज़न बैंड्स द्वारा भेजे गये निमंत्रणों को स्वीकार नहीं करती थी। गिरिजा जी ख्याल और ठुमरी की कभी तुलना नहीं करती थीं। वो कहती कि एक तरफ राग, लय की आत्मा है जबकि एक तरफ मनोरम काव्य पंक्तियों की राह है और दोनों ही अपने में पूर्ण हैं। उनके परिवार का झुकाव काव्य की तरफ था इसलिए उनकी रूचि भी ठुमरी में अधिक रही। जब नये ज़माने में ठुमरी को तुलनात्मक आसान विधा कहा जाने लगा तो गिरिजा जी ने ख्याल की कठिन पगडंडियों का रियाज़ कर कुछ इस तरह साधा कि कोई उनपर सवाल ना कर सके। अपनी हर प्रस्तुति, कॉन्सर्ट में उन्होंने ख्याल विधा को भी शामिल किया। गिरिजा जी खुद को देवी सरस्वती (ज्ञान और ललित कला की देवी) की सेविका मानती थी। उनके अनुसार वो स्वयं को माँ सरस्वती की शिष्या होने लायक बना रही थीं। आशा है गिरिजा जी के शिष्य उनकी दिखायी राह पर चलकर भारतीय शास्त्रीय संगीत में योगदान देंगे और अब गिरिजा जी माँ सरस्वती के सानिध्य में तीनो लोकों को अपनी ठुमरी से मोहित कर रही होंगी। नमन!
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#ज़हन
(Wrote this article for Roobaru Duniya App)

Monday, October 2, 2017

Vigayapan War (Fan Comic)


इस बार राज कॉमिक्स की कॉमेडी के दो स्तम्भ गमराज और फाइटर टोड्स आमने सामने हैं। हाथापाई के साथ-साथ दोनों में छिड़ी है कॉर्पोरेट वॉर ! पेश है एक अभूतपूर्व फैन वर्क ''विज्ञापन वॉर'' 
Artwork: Anuj Kumar
Story: Mohit Sharma
Coloring and Calligraphy: Shahab Khan
जल्द ही अन्य वेबसाइटस पर भी उपलब्ध होगी।

Thursday, September 28, 2017

समाज को तोड़ती समूह वाली मानसिकता (लेख) #ज़हन


प्राकृतिक और सामाजिक कारणों से हम सभी की पहचान कुछ समूहों से जुड़ जाती है। उदाहरण के लिए एक इंसान की पहचान कुछ यूँ - महिला, भारतीय, अच्छा कद, गेहुँआ रंग, शहरी (दिल्ली निवासी), प्रौढ़, सॉफ्टवेयर क्षेत्र में काम करने वाली, हिन्दू (दलित), मध्यमवर्गीय परिवार आदि। अब पूरा जीवन इन समूहों और उनसे निकले उप-समूहों को जीते हुए उस महिला के मन में इन सबके बारे में काफी अधिक जानकारी आ जाती है जबकि बाकी दुनिया के अनगिनत दूसरे समूहों के बारे में उसे ऊपरी या कम जानकारी होती है। ऐसी ऊपरी जानकारी पर उसके साथ समूह साझा कर रहे लोग नमक-मिर्च लगा कर ऐसा माहौल बनाते हैं कि अधिकांश लोग धीरे-धीरे मानने लगते हैं कि वो जिन समूहों से हैं, दुनिया की सबसे ज़्यादा चुनौतियाँ सिर्फ उन्हें ही देखनी पड़ती हैं और उनका समूह सर्वश्रेष्ठ है। दुनिया की हर खबर, बात, मुद्दे पर वो अपने समूहों के हिसाब से विचार बनाते हैं। 

जहाँ वो महिला कई पुरुषों द्वारा गोरे वर्ण की स्त्रियों को वरीयता देने की समस्या को समझेगी, वहीं खुद छोटे कद के या पतले पुरुषों का सहेलियों में मज़ाक उड़ाने या उन्हें वरीयता ना दिए जाने की गलत बात पर दोबारा सोचेगी भी नहीं। जहाँ उसे सॉफ्टवेयर दुनिया का सबसे कठिन क्षेत्र लगेगा, वहीं अपने पिता द्वारा दिवाली पर डाकिये को दिए इनाम पर वह सवाल करेगी कि साल में 2-4 बार तो आता है (पर उसे यह नहीं पता या शायद वह जानना नहीं चाहती कि इस डाकिया के ज़िम्मे डेढ़ हज़ार हज़ार घर और सौ दफ्तर हैं)। कभी सवाल करने पर वह रक्षात्मक होकर अपने समूह पर अनगिनत रटी हुई दलीलें सुना देगी...बिना यह समझे की संघर्ष तो सबके जीवन में है; कई बार उसके नज़रिये से 'गिफ़्टेड' या 'कम मेहनत' वाले समूहों से जुड़े लोगो में उसके समूहों से अधिक। यह मानसिकता लेकर व्यक्ति जीवनभर कुढ़ता रहता है। मन ही मन ऐसे अनेक लोगो से दूर हो जाता है जिनसे उसका अच्छा नाता बन सकता था और दोनों एक दूसरे के बहुत काम आ सकते थे। एक संभावना यह बनती है कि आपको अपना मित्र पसंद है बस उसकी कुछ बातें नहीं पसंद क्योंकि वो 'कुछ बातें' उसके अंदर दूसरे समूहों से आई हैं, जिनमे आप नहीं हो।  

इस सामाजिक अनुकूलन (सोशल कंडीशनिंग) के जाल से बाहर आकर ही समाज में निष्पक्ष, सकारात्मक योगदान देना संभव है। यहाँ ये मतलब नहीं कि अपने समूह के अधिकारों, बातों पर आवाज़ ना उठायी जाए; पर ऐसा करते हुए बिना जांचे गलत बातों-अफवाहों को बढ़ावा देना, अन्य आवाज़ों को अनसुना करनाउनको अपनी बड़ी कालजयी पहल के आगे छोटा मानना या भ्रान्ति में जीना गलत है। समूहों की तुलना में भावनाओं के बजाय तर्कों और इतिहास की घटनाओं से बने वर्तमान समीकरण के अनुसार बात करना बेहतर है।  
#मोहित_शर्मा_ज़हन #mohitness #mohit_trendster

Friday, September 8, 2017

किसका भारत महान? (कहानी) #ज़हन

Artwork - Martin Nebelong

पैंतालीस वर्षों से दुनियाभर में समाजसेवा और निष्पक्ष खोजी पत्रकारिता कर रहे कनाडा के चार्ली हैस को नोबेल शांति पुरस्कार मिलने की घोषणा हुई। नोबेल संस्था की आधिकारिक घोषणा के बाद से उनके निवास के बाहर पत्रकारों का तांता लगा था। अपनी दिनचर्या से समय निकाल कर उन्होंने एक प्रेस वार्ता और कुछ बड़े टीवी, रेडियो चैनल्स के ख़ास साक्षात्कार किये। दिन का अंतिम साक्षात्कार एशिया टीवी की पत्रकार सबीना पार्कर के साथ निश्चित हुआ। एशिया के अलग-अलग देशों में अपने जीवन का बड़ा हिस्सा बिताने वाले चार्ली खुश थे कि अब उन्हें पाश्चात्य पत्रकारों के एक जैसे सवालों से अलग कुछ बातें मिलेंगी। 

काफी देर तक अलग-अलग मुद्दों पर चर्चा करने के बाद सबीना ने कुछ संकोच से पूछा। 
"मुझे विश्वास नहीं हो रहा कि इतनी समस्याओं में आपने अभी तक भारत का नाम नहीं लिया?"

चार्ली - "क्या आप चाहती हैं कि मैं भारत का नाम लूँ?"

सबीना - "मेरा वो मतलब नहीं था। मैं कहना चाहती हूँ कि भारतीय समाज में इतनी विकृतियाँ सुनने में आती हैं, हर रोज़ इतने अपराध होते हैं....मुझे लगा आपके पास कहने को बहुत कुछ होगा।"

चार्ली - "बिल्कुल! भारतीय समाज में बहुत सी कमियाँ हैं, अक्सर अपराध सुर्खियाँ बनते हैं पर क्या आपको पता है 200 कुछ देशों की दुनिया में लगभग चौथाई देश ऐसे हैं जिनकी अधिकतर आपराधिक ख़बरें, सरकार की गलतियाँ, जनता का दुख सरकारी फ़िल्टर की वजह से वहाँ से बाहर दुनिया में नहीं जा पातीं...वहाँ की तुलना में भारत स्वर्ग है। उन देशों के अलावा कई देशों में शिक्षा और सामाजिक व्यवस्था ऐसी है कि बच्चो में अपने धर्म, देश की निंदा को हतोत्साहित किया जाता है और एक समय के बाद इस सामाजिक अनुकूलन (सोशल कंडीशनिंग) के कारण स्थानीय लोगो, मीडिया द्वारा बाहर के देशों में किसी बड़ी अप्रिय घटना के अलावा अपनी "सामान्य" या "अच्छी" छवि की रिपोर्ट्स भेजी जाती हैं। जबकि भारत में मैंने इस से उलट ट्रेंड देखा है।"

सबीना - "मैं आपकी बात समझी नहीं। कैसा उल्टा ट्रेंड?"

चार्ली - "मान लीजिये अगर दुनिया के किसी हिस्से में हुई त्रासदी में 3 दर्जन लोग मरते हैं, ये हुई पहली खबर और दूसरी खबर में भारत का कोई स्थानीय दर्जे का नेता एक रूढ़िवादी या बेवकूफाना बयान देता है। अब यहाँ ज़्यादा संभावना यह है कि भारत के नेता के गलत बयान वाली खबर, कहीं और हुई 36 लोगो की मौत वाली खबर से बड़ी बन जायेगी और दुनिया के कई हिस्सों में पहुँचेगी। इतना ही नहीं बाकायदा उस खबर का फॉलो अप भी होगा। जब लगातार किसी देश से जुडी नकारात्मक ख़बरें अंतरराष्ट्रीय मीडिया में जाती रहेंगी तो देश-दुनिया के लोगो में भारत की वैसी ही छवि बनेगी जैसी आपके मन में हैं। वर्तमान भारत अपने इतिहास के समय सा महान नहीं है पर दुनिया की नर्क सरीखी जगहों में भी नहीं है....यह देश कहीं बीच में है। किसी बात के औसत में सत्तरवें नंबर पर लटका है तो कहीं बत्तीसवां है, जो इतनी जनसँख्या और कदम-कदम पर दिखती सामाजिक विविधता में अचंभित करने वाली बात है। अब यह भारतीय लोगों पर है वो औसत से ऊपर जाते हैं या नीचे।"

सबीना - "...मतलब आप चाहते हैं भारतीय लोग और मीडिया अपनी कमियों पर बात करना छोड़ दें?"

चार्ली - "मैं चाहता हूँ भारत के लोग, मीडिया अपनी कमियों पर बात करने और कमियों का स्पीकर युक्त ढोल बजाने में अंतर समझें। अगर ऐसा नहीं  होता है तो बाहरी देशों में भारत की छवि धूमिल होती जायेगी जिसका गहरा असर पर्यटन, व्यापर, कई देशों से द्विपक्षीय संबंधों पर पड़ेगा। इतना ही नहीं भारतीय लोगो में एक-दूसरे के प्रति वैमनस्य की भावना बढ़ती जायेगी। फिर यह देश अपनी क्षमता से नीचे जाता रहेगा।"

अपनी असहजता मिटाने के लिए सबीना ने अन्य मुद्दों से जुड़े सवाल पूछने शुरू कर दिए। 

समाप्त!
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#mohitness #मोहित_शर्मा_ज़हन #mohit_trendster #freelance_talents

Saturday, August 12, 2017

चाहे दरमियाँ दरारें सही! (Ishq Baklol Poetry)


कल देवेन पाण्डेय जी की नॉवेल इश्क़ बकलोल की प्रति मिली। :) किताब का अमेज़न हार्डकॉपी लिंक जल्द ही एक्टिव होगा। उपन्यास शुरू होने से पहले किताब के 2 पन्नो पर मेरी कलम है....


दरिया में तैरती बोतल में बंद खतों की,
पलकों से लड़ी बेहिसाब रातों की,
नम हिना की नदियों में बह रहे हाथों की,
फिर कभी सुनेंगे हालातों की...
...पहले बता तेरी आँखों की मानू या तेरी बातों की?
चाहे दरमियाँ दरारें सही!

ये दिल गिरवी कहीं,
ये शहर मेरा नहीं!
तेरे चेहरे के सहारे...अपना गुज़ारा यहीं। 
जी लेंगे ठोकरों में...चाहे दरमियाँ दरारें सही!

नफ़रत का ध्यान बँटाना जिन आँखों ने सिखाया, 
उनसे मिलने का पल मन ने जाने कितनी दफा दोहराया....
जिस राज़ को मरा समझ समंदर में फेंक दिया,
एक सैलाब उसे घर की चौखट तक ले आया....
फ़िजूल मुद्दों में लिपटी काम की बातें कही,
चाहे दरमियाँ दरारें सही!

किस इंतज़ार में नादान नज़रे पड़ी हैं?
कौन समझाये इन्हें वतन के अंदर भी सरहदें खींची हैं!
आज फिर एक पहर करवटों में बीत गया,
शायद समय पर तेरी यादों को डांटना रह गया।
बड-बड बड-बड करती ये दुनिया जाली,
कभी खाली नहीं बैठता जो...वो अंदर से कितना खाली। 
माना ज़िद की ज़िम्मेदारी एकतरफा रही,
पर ज़िन्दगी काटने को चंद मुलाक़ात काफी नहीं....
ख्वाबों में आते उन गलियों के मोड़,
नींद से जगाता तेरी यादों का शोर। 
मुश्किल नहीं उतारना कोई खुमार,
ध्यान बँटाने को कबसे बैठा जहान तैयार!
और हाँ...एक बात कहनी रह गयी...
काश दरमियाँ दरारें होती नहीं!
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#ज़हन

Thursday, August 3, 2017

Kavya Comic - Matlabi Mela (मतलबी मेला)


New poetry Comic "Matlabi Mela" published, based on my 2007 poem of the same name. 
*Bonus* Added an extra poem खाना ठंडा हो रहा है... in the end.
Language: Hindi, Pages: 22
Illustration - Anuj Kumar
Poetry & Script - Mohit Trendster
Coloring & Calligraphy - Shahab Khan


Available (Online read or download):
ISSUU, Freelease, Slideshare, Ebook Home, Archives, Readwhere, Scribd, Author Stream, Fliiby, Google Books, Play store, Daily Hunt, Smashwords, Pothi and Ebook Library etc.

Saturday, July 29, 2017

साक्षात्कार: देवेन पाण्डेय (इश्क़ बकलोल वाले)


देवेंद्र (देवेन) पाण्डेय जी से मेरा परिचय एक कॉमिक कम्युनिटी पर हुआ। वहाँ कई प्रशंसक कॉमिक समीक्षा, फैन फिक्शन, कला, विचार साझा करते हैं। समीक्षाओं, विचारों की सीढ़ी चढ़ते हुए देवेन भाई के लेख कुछ  पत्रिकाओं एवम ऑनलाइन पोर्टल्स पर प्रकाशित हुए और अब "इश्क़ बकलोल" के साथ वह साहित्य की दुनिया में अपनी नई पारी शुरू कर रहे हैं। बड़ी उत्सुकता के साथ उन्होंने मुझसे नॉवेल की कहानी साझा की थी और कहानी सुनकर मुझे लगा कि वाकई इस नज़रिये से "इस" कहानी को कहा जाना बहुत ज़रूरी था। यही कारण था कि इस नॉवेल में मेरी काव्य प्रस्तावना है। आज अपनी प्रोटोकॉल तोड़ते हुए अन्य ब्लॉग्स की जगह अपने मुख्य ब्लॉग पर कोई इंटरव्यू पोस्ट कर रहा हूँ। पेश है उनसे हुई ऑनलाइन बातचीत के अंश।

*) - अब तक दुनिया में बीते लगभग 31 सालों के सफर का सारांश साझा करें।
देवेन - 31 वर्षो का सारांश? जी यह थोडा कठिन प्रश्न है, 31 वर्षो के अनुभवो को भला सारांश में कैसे बता सकता हूँ? जीवन के अपने अब तक के अनुभवों में काफी कुछ सीखा है, काफी कुछ समझा है जिसे सारांश में समझाना थोडा कठिन है। उतार चढ़ाव हर किसी के जीवन में होते है, मेरे भी है, कुछ अच्छे कुछ बुरे काफी गलतियाँ की है, काफी मूर्खताए भी की है जिनका अफ़सोस है, लेकिन यह सब जरुरी भी था, अच्छी बुरी सभी घटनाओं की कड़ियाँ जुडकर ही इंसान को परिपक्व बनाती है,और अपनी गलतियों से काफी कुछ सिखने को प्रेरित भी करती है। लोअर मिडल क्लास में जन्म, भरा पूरा परिवार, अभाव के बावजूद कभी कोई अभाव न महसूस होने देने वाले माता-पिता, पढाई में फिसड्डी, शरारती, किन्तु अंतर्मुखी, फिर पढने का शौक जगा, स्कूल की किताबो के अलावा हर किताब में मन लगता था, इस पढने के शौक ने लेखन को जन्म दिया, बस अभी यह सफर जारी है, उम्मीद करता हु आप यही प्रश्न आज से 30 साल बाद पूछे तो और अच्छे से उत्तर दे पाऊं। 

*) - लेखन का कीड़ा कब आपको काटने में सफल हुआ? उस कीड़े को पोषित करने में किन लोगो का षड्यंत्र मानते हैं आप? (यानी किन लोगो को श्रेय देंगे)
देवेन - लेखन का कीड़ा तो बचपन से ही था, लेकिन वह अलग समय था, उस समय तो बस कल्पनाओं के घोड़े दौडाता और बेसिर पैर की कहानियाँ नोटबुक्स में लिखता। किन्तु किशोरावस्था तक आते आते लेखन स्वयम बंद हो गया,जीवन की आपाधापी काफी कम उम्र में ही आरम्भ हो गई थी, काफी वर्षो बाद जब पहली बार कम्प्यूटर सीखा और शोशल मिडिया से जुड़ा, तब कई लोगो से मित्रता हुई जिनके शौक एक जैसे थे (मेरा मतलब पढने से है), मेरा बचपन चूँकि कॉमिक्स, उपन्यास पढ़ते हुए गुजरा है तो मैंने सबसे पहले उसी संबंधित चीजे इंटरनेट पर खोजी और कुछ ग्रुप्स जो कॉमिक्स फैन्स ने बनाये थे, उनसे जुड़ा, यहाँ आकर पढने का शौक फिर जागा, और इसी के साथ लेखन का कीड़ा कुलबुलाया, यही समय था जब कई अच्छे मित्र बने जिन्होंने अपने मार्गदर्शन से मेरा उत्साह बढ़ाया। यही वह समय था जब मेरा विवाह हुआ, और श्रीमती जी ने मेरे अंदर के लेखक और पाठक को न सिर्फ पहचाना बल्कि मुझे लिखने के लिए प्रोत्साहित भी किया, जिस कारण कुछ फैन फिक्शन लिखे, मोहित शर्मा जी से तभी मित्रता हुई और इनकी बहुमुखी प्रतिभा से बहुत प्रभावित भी हुआ और इन्हें भी फ़ॉलो करता रहा किशोराव्स्था में फिल्मो का बड़ा शौक था (अब भी बरकरार है ), मेरे मित्र किसी भी फिल्म को देखने से पहले मुझसे पूछा करते थे,और मै उन्हें फिल्म की कहानी, इत्यादि किसी समीक्षक की भाँती बताता था, जब शोशल मिडिया से जुड़ा और ब्लोगिंग से परिचय हुआ (मोहित जी के कारण ), तो मैंने सबसे पहले फिल्मो की समीक्षा लिखने का प्रयास किया, जो समिक्षा न होकर केवल व्यग्तिगत नजरिया था, इसी बिच कुछ लेखन प्रतियोगिताओं में हिस्सा लिया जिसके सूत्रधार मोहित जी ही थे, जिसमे आठवा स्थान प्राप्त किया, जिससे काफी उत्साह बढ़ा, फिर दो एक पत्र पत्रिकाओं में लेखन किया, कुछ वेब पोर्टल्स पर भी लिखता रहा, इन सबसे फायदा यह हुआ के लेखन का निरंतर अभ्यास होता रहा और नई नई चीजे सिखने को मिली। तो कह सकता हु के लेखन के कीड़े को जगाने में मेरी पत्नी, मेरे शोशल मीडिया के मित्रो का विशेष सहभाग रहा है। 


*) - कॉमिक्स और साहित्य की ऑनलाइन दुनिया में आपका अनुभव कैसा रहा।
देवेन - ऑनलाइन जुड़ने के बाद से जो सबसे बड़ा फायदा हुआ वह यह के मुझे अपने बचपन का हिस्सा रहे कॉमिक्स निर्माताओ, कथाकारों, साहित्यकारों से रूबरू होने का अवसर प्राप्त हुआ, इस प्लेटफ़ॉर्म पर आकर मैं कॉमिक्स और साहित्य दोनों क्षेत्रो में आते बदलाओ को देखकर हैरान रह गया, सब कुछ तेजी से बदलता जा रहा था, साहित्य अब केवल भारी-कठिन हिंदी भाषा तक ही सिमित न रह गया था, इसका स्वरूप बदलती फिजा के साथ तेजी से बदला और कई अलग अलग शैलियों ने जन्म लिया l  नए-पुराने, जाने-पहचाने,छोटे-बड़े कई लेखको एवं कलाकारों को रूबरू जानने का न केवल अवसर मिला बल्कि इनका काफी सकारात्मक सहयोग एवं मार्गदर्शन भी मिला जिससे मै अभिभूत हुआ। कुल मिला कर यह वह मंच था जिसने मुझे बहुत कुछ सिखाया, समझाया, मार्गदर्शन किया

*) - एक प्रशंसक और एक लेखक की सोच में किस तरह के बदलाव देखते हैं?
देवेन - जहा प्रशंसक पसंद आये किसी भी विधा, लेखन, कला की समिक्षा बेबाकी से कर सकता है, वही लेखक बनते ही यह दायरा न चाहते हुए भी तंग हो जाता है। प्रशंसक उन्मुक्त है, वह अच्छे को अच्छा, बुरे को बुरा, बहुत बुरा कह सकता है, किन्तु लेखक मन इस मामले में थोडा स्वार्थी हो जाता है l वह अपनी राय अब खुलकर नही बल्कि नापतौल कर देता है 

*) - इश्क-बकलोल उपन्यास के शीर्षक की कहानी क्या है? क्या अन्य टाइटल पर भी विचार किया था? अगर हाँ तो शीर्षक क्या था?
देवेन - जी इश्क-बकलोल वह पहला नाम नहीं था जिसपर विचार किया गया था, मैंने जब कहानी लिखी थी तब दिमाग में कोई और ही शीर्षक था, ‘’विथ लव फ्रॉम जौनपुर" भी सोचा था, किन्तु कहानी के अनुसार शीर्षक कुछ जंच नही रहा था और थोडा अलग सा चाहिए था जिसमे कुछ नयापन हो और थोडा कैची लगे l नाम से ही उत्सुकता हो जाये के भला यह क्या नाम हुआ? उपन्यास के नायक की हरकते और कहानी को देखते हुए एक और नाम सुझा जिसकी शुरुवात भी ‘इश्क’ से होती थी, किन्तु यह नाम बड़ा ही अभद्र सा लगा, अब पशोपश में था के क्या नाम रखा जाय जो प्रेम की मूर्खताओ पर जंचे, चूँकि कहानी का परिवेश उत्तर भारतीय था तो मुर्ख का पर्यावर्ची शब्द मिला “बकलोल”। और इस तरह से नामकरण हुआ ‘इश्क-बकलोल’, नाम में माथापच्ची करने का श्रेय हमारे सूरज पॉकेट बुक्स के फाउंडर,सम्पादक शुभानन्द जी को भी दूंगा। 

*) - सूरज पॉकेट बुक्स की टीम के साथ काम करना कैसा रहा?
देवेन - सूरज पॉकेट बुक्स के फाउंडर शुभानन्द जी फेसबुक से बने शुरुवाती मित्रो में से एक है, जिन्होंने मुझे फैन फिक्शन,समिक्षा, ब्लॉग से लेकर अब प्रोफेशनल लेखन करते हुए हर पडाव पर देखा है। मिथिलेश गुप्ता जी भी मेरे शुरुवाती मित्रो में से एक है, और बहुमुखी प्रतिभा के धनी है, इनकी एक एंथोलोजी और एक शोर्ट नॉवेल सूरज पॉकेट बुक्स से प्रकाशित हो चुकी है। इन दोनों से रूबरू पहली बार आज से लगभग डेढ दो साल पहले मिला था, मिथिलेश जी के उपन्यास के ‘’जस्ट लाइक दैट’’ की रिलीज के समय इनसे मिलकर लगा ही नहीं के मै इनसे पहली बार मिल रहा हु, शुभानन्द जी का स्वभाव बेहद आत्मीय है, किन्तु काम के मामले में आवश्यक सख्ती बरतते है,जो के आवश्यक है यदि मै इनसे न मिला होता तो मेरा उपन्यास और लेखन इतना आसान न होता इनके सानिध्य में काफी कुछ सिखने को मिला जो निरंतर जारी है, शुभानन्द जी खुद भी एक जुनूनी लेखक है, जो फैन से प्रोफेशनल लेखक बने है, हमारी टीम में लगभग सभी एक ही जैसे है भले मिजाज अलग अलग हो, किन्तु सभी फैन से लेखक बने हुए है इसलिए एक बॉन्डिंग है, जिस वजह से कभी साथ काम करते हुए अनावश्यक दबाव या औपचारिकता महसूस नही होती और हम खुल कर अपने किसी भी नए कांसेप्ट पर बिना किसी संकोच के वार्ता कर सकते है,बता सकते है

*) - उपन्यास को किस श्रेणी में रखेंगे और क्यों?
देवेन - उपन्यास के शीर्षक में ही “इश्क” है, इसलिए मेरे न चाहते हुए भी उपन्यास रोमांस की श्रेणी में आ जाता है, किन्तु मै इसे रोमांस की श्रेणी में नहीं मानता हूँ। मेरा खुद का मानना है के रोमांस लेखन शैली में मेरा हाथ बड़ा तंग है, रोमांस लिखने के लिए आवश्यक रुमानियत, खयालो की सपनीली दुनिया, लफ्फाजी इत्यादि मेरे बस का नहीं है, मै शहद में चुपड़े एवं नशीले संवाद लिख ही नही सकता, यह मुझसे होता ही नहीं। उपन्यास में इश्क जरुर है लेकिन इश्क में उपन्यास न है, गाँव है, लोग है, यारी-दोस्ती है, ट्रेजेडी है, इश्क है तो उस इश्क से उपजी ‘बकलोली’ भी है इसलिए इसे किसी एक जेनर तले मै परिभाषित नहीं कर सकता, बाकी पाठक पढ़ते समय इसे जो जेनर समझे यह वही है

*) - लेखन के अलावा आपके और क्या-क्या शौक हैं?
देवेन - मैने लेखन से पहले पठन शुरू किया था,इसलिए सबसे प्रथम तो मेरा सबसे बड़ा शौक तो पढना ही है। इसके अलावा मुझे नए नए स्थान देखना समझना बेहद पसंद है, अर्थात मुझे घूमना बेहद पसंद है, स्वभाव से घुमक्कड़ हूँ, इसके अलावा फिल्मे भी मेरा पसंदीदा शौक है, मै ढेर सारी फिल्मे देखता हु, फिल्म किसी भी भाषा की क्यों न हो, बस अच्छी हो

*) - मुंबई और अपने पैतृक गाँव के जीवन के अंतर को देखकर क्या विचार मन में आते हैं? क्या जीवन के ऐसे ही विरोधाभासी,मार्मिक क्षणों को देखकर मन में लिखने की इच्छा प्रबल होती है?
देवेन - जौनपुरी मेरी जन्मभूमि है, मुंबई मेरी कर्मभूमि है। मैं जब अबोध था उसी समय मुम्बई आ गया था माता-पिता के साथ, मै अपने 31 वर्षो के जीवन में बमुश्किल 4 से 5 मर्तबा ही अपने गाँव गया हूँl देखिये मुम्बई जो है वह दौड़ता शहर है, यहाँ रोजी रोटी की ऐसी आपाधापी है के आपको सुकून के क्षण बेहद कम मिलते है,लेकिन फिर भी यह शहर ममतामयी है, हर किसी को अपना लेता है। मुंबई का अपना ही आकर्षण है जो के गलत नहीं है,यहाँ ट्रेवलिंग करना सबसे सस्ता है, यहाँ आपको 5 रूपये से 5000 रूपये तक पेट भरने के साधन मिल जायेंगे, यहाँ के लोग भी काफी अच्छे है मिलनसार है, यहाँ उत्सवो की भरमार है, उल्लास है यह शहर कैसा भी मूड हो आपके मूड के मुताबिक़ कुछ न कुछ ऐसा मिल ही जायेगा जिससे आप सुकून महसूस कर सको। वही उत्तर प्रदेश का मेरा गाँव हर तरह की आपाधापी से कोसो दूर है,यदि आपको सिनेमा देखने की इच्छा हो तो आपको 18 किलोमीटर जाना होगा, छोटा सा शांत गाँव है, खेतो ,नहरों एवं नदी से घिरा हुवा। जब पहली बार गया था तो मै हैरान रह गया था, घर के आंगन में मैंने कभी मोर की कल्पना तक न की थी, किन्तु यहाँ आंगन में मोर घूमते रहते थे, शीतल हवा है, सुख दुःख में एकदूसरे की सहायता करने वाले लोग है, गाँव से 10 किलोमीटर में भी किसी के घर कुछ सुख दुःख हुवा तो सबको खबर हो जाती है,सर्दियों में सरसों के खेत, क्यारियाँ, घने कोहरे इत्यादि कभी मुम्बई में न देखे थे। मुंबई और गाँव के जीवन में जमीन आसमान का अंतर है,विरोधाभास है, मेरे लिए मुंबई और मेरी जन्मभूमि दोनों का समान महत्व है, दोनों का स्वभाव विपरीत है किन्तु एक बात दोनों में समान है, दोनों ही जीवन जीने की कला सिखाती है, एक रोटी तो चैन की नींद देती है गाँव और मुंबई के कई क्षण है जो लिखने की प्रेरणा देते है, मै अपने भाव अपने लेखन के जरिये व्यक्त करने की इच्छा रखता हूँ।

*) - आपकी पसंदीदा किताब और लेखको के बारे में बताएं। 
देवेन - मेरा कोई निर्धारित पसंदीदा लेखक नहीं है, मुझे जो किताब पसंद आ जाए वह लेखक मेरा पसंदीदा हो जाता है, फिर भी कुछ पुस्तको का नाम अवश्य लेना चाहूँगा, जैसे रणजीत देसाई की ‘श्रीमान योगी’, शिवाजी सांवत की ‘मृत्युंजय, युगांधर, केशव प्रसाद मिश्र जी की 'कोहबर की शर्त' ,रामधारी सिंह ‘दिनकर’ जी की ‘रश्मिरथी,कुरुक्षेत्र’ इत्यादि मेरी पसंदीदा है, मै मुख्यतः ऐतिहासिक,पौराणिक एवं ग्रामीण परिवेश वाली रचनाये पसंद करता हूँ। 

*) - बचपन या किशोरावस्था का कोई यादगार (हास्य) किस्सा बताएं देवेन - एक बार कक्षा में अध्यापक जी ने कोई कठिन प्रश्न पूछा था जिसका उत्तर किसी को नहीं आता था, मैंने डेस्क के निचे अपनी पुस्तक रखी हुयी थी जिसमे संयोग से मुझे उत्तर दिख गया था। मुझे लगा यही सही अवसर है, उत्तर देकर अपनी धाक जमाता हु, मै कक्षा में वो जो आजकल के लडके कहते है न ‘बैक बेंचर’ उसी श्रेणी का था, मुझसे उत्तर की उम्मीद किसी को भी न थी। लेकिन मैंने झटके से हाथ उपर उठाया,पूरी कक्षा में केवल मेरा हाथ उठा देखकर एकपल को अध्यापक भी हैरान रह गाये, उन्होंने कहा "देवेन्द्र चलो तुम उत्तर बताओ" मैंने झट से और काफी जोर से किताब में देखी पंक्ति दोहरा दी अध्यापक बेहद प्रसन्न हुए और मेरी ओर आकर मेरी पीठ थपथपाई, मै गदगद हो गया, सारी कक्षा में मेरे लिए प्रसंशा के भाव दिख रहे थे। और अध्यापक जी ने सारी कक्षा को संबोधित करते हुए कहा "देखो आप सभी देखो, कुछ सीखो इस देवेन्द्र से, कितना आत्मविश्वास है इसमें,कितने आत्मविश्वास से इसने उत्तर दिया, उत्तर गलत था तो क्या हुवा ? इसके आत्मविश्वास ने एकबारगी मुझे भी विचार करने पर विवश कर दिया के शायद मुझे जो उत्तर पता है हो सकता है वही गलत हो, मै देवेन्द्र के गलत उत्तर की बात नही करूँगा, बात करूँगा उसके आत्मविश्वास की उसने उत्तर तो देने का प्रयास किया l" उनके यह शब्द सुनकर तो मेरे पैरो तले जमीन ही खिसक गई के अरे यह क्या हो गया ? उत्तर गलत था ? तब पता चला के मैंने किसी दुसरे प्रश्न का उतर रट लिया था हडबडी में कक्षा में बड़ी भद्द पिटी, किन्तु आत्मविश्वास पर एक सीख भी मिली 

*) - 2012 (जब लिखना शुरू किया था) से अब तक खुद में और अपने लेखन में कितना बदलाव देखते हैं?
देवेन - जब मैने लिखना आरम्भ किया था तो कुछ फैन फिक्शन लिखता जो मेरे कॉमिक्स जूनून से प्रेरित थे, फिर कुछ कहानिया लिखनी शुरू की जिनमे अपरिपक्वता और नौसिखियापन काफी होता था उन्ही दिनों कुछ कॉमिक्स पब्लिकेशन के लिए दो- तीन स्क्रिप्ट्स भी लिखी जो अप्रूव हो गई जिससे आत्मविश्वास बढा (अफसोस के उनमे से कोई भी प्रकाशित नही हुयी) किन्तु इससे विस्तृत लेखन सिखने को मिला, फिर ब्लॉग से जुड़ा, समिक्षा, विचार इत्यादि लिखने लगा, फिर कुछ पत्र-पत्रिकाओं में भी लेख लिखे, फिर एक लम्बा अवकाश लिया, लेखन से दुरी सी हो गई,अब अवकाश से आया हु तो “इश्क बकलोल “ का सृजन हुआ।  मैंने जब लिखना शुरू किया था तब मै बेहद लापरवाह हुवा करता था, बेसब्र भी, जिसकी छाप मेरे लेखन में होती थी, नौसिखियापन और नासमझी साफ़ दिखाई देती थी, और न तब लेखन पर पकड़ होती थी। किन्तु अब काफी सुधार किया है (हालांकि नौसिखियापन अभी भी कायम है), और आगे भी निरंतर सुधार करता रहूँगा, अभी तो केवल सीखना शुरू ही किया है l 

*) - आज से 10-15 सालों बाद खुद को कहा देखते हैं? निजी जीवन,लेखन में भविष्य के लिए क्या लक्ष्य बनाए हैं l 
देवेन - मुझे तो आज का पूछ लीजिये, 10-15 साल बाद का किसे पता है, चूँकि लेखन मेरा शौक है तो जाहिर सी बात है के लेखन में कुछ न कुछ स्थान अर्जित करने का प्रयास अवश्य करूँगा l रही निजी जीवन की बात तो भाई प्राइवेट सेक्टर में हु, आठ घंटे की नौकरी, फिर घर, माता-पिता, पत्नी-बच्चे इन्ही के साथ जीवन बिताना है, वैसे गाँव से कट सा गया हु, जमीन है किन्तु खेती-बाड़ी का ज्ञान शून्य है, तो मेरी दिली इच्छा है के खेती-किसानी भी सिखू और गाँव में कुछ दिन रहकर फसले उगाऊ, ताकि माटी से जुड़ा रहू 

*) - आज के समाज और बदले परिदृश्य पर आपके क्या विचार है?
देवेन - आज का समाज पहले से अधिक बेसब्र है, अब हर किसी को विचार व्यक्त करने के आसान एवं सुगम साधन इंटरनेट शोशल मिडिया के रूप में प्राप्त है, हर गली मोहल्ले में,कैफे, रेस्तरा, मॉल , सडको पर वैचारिक क्रांतिया हो रही है। मूल्य घट गए है अब स्वतन्त्रता के मायने के देह और यौन संबंधो के खुलेपन तक ही सिमित रह गए है । अपने ही देश में अपने ही देश की खिलाफ विचारधारा रखने वाली नई जमात पैदा हो रही है, जहा बदलाव की आवश्यकता नही भी है वहा भी जबरदस्ती बदलाव का रोना रोया जा रहा है लुब्बे-लुबाब यह के असंतुष्टि हद दर्जे तक बढ़ रही है, लोग क्रांतिया कर रहे है लेकिन किस लिए कर रहे है कुछ न पता, आजादी मांग रहे है किन्तु कौन सी आजादी कुछ नही पता पूंजीवाद के खिलाफ लड़कर पूंजीपति बन रहे है, चर्चा में बने रहने के लिए कुछ भी किया जा रहा है, कुल मिला कर स्थिति बड़ी ही नाजुक है आज के समाज की, केवल व्हाट्सअप के मैसेज मात्र से ही लोगो की जहालत को बाहर आने का अवसर मिल जाता है पढ़े-लिखो का तबका बढ़ रहा है, उसी अनुपात में पढ़े-लिखे संवेदनहीन लोगो की जमात भी बढ़ रही है। 

*) - इश्क बकलोल के माध्यम से आप क्या संदेश देना चाहते हैं?
देवेन - देखिये संदेश तो ग्रहण करनेवाले के उपर निर्भर करता है, बाकी मैं कोई संदेश देने में विश्वास नही रखता,यदि किसी को कुछ सिखने को मिलता है, समझने को मिलता है तो यह मेरे लेखन की नहीं पढने वाले की खूबी है 
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*इश्क़ बकलोल अगस्त 2017 के पहले हफ्ते में अमेज़न और अन्य प्रमुख ऑनलाइन वेंडर पर उपलब्ध होगी। किताब पर अधिक जानकारी के लिए सूरज पॉकेट बुक्स पेज या लेखक देवेन पाण्डेय की फेसबुक प्रोफाइल विजिट करें। 

Saturday, July 15, 2017

झुलसी दुआ (कहानी) #ज़हन


सरकारी नौकरी की तैयारी में कई वर्ष बिताने के बाद सोमेश का चयन अग्निशमन कर्मी पद पर हुआ। जहाँ घरवालों में जोखिम भरी नौकरी को लेकर सवाल और चिंता थी वहीं सोमेश के तो जैसे मन की मुराद पूरी हो गयी थी। बचपन में वो सुपरहीरो बनना चाहता था, फ़िल्मी हीरो नहीं बल्कि लोगो की मदद करने वाला असली हीरो। बड़े होते-होते उसे दुनिया की ज़मीनी सच्चाई पता चली और उसने हीरो बनने का विचार तो छोड़ दिया पर लोगो की मदद करने वाले किसी क्षेत्र में जाने की बात ने उसके बचपन का सुपरहीरो फिर से जगा दिया। समाजसेवा के साथ-साथ जीविका कमाना और क्या चाहिए?

साधारण वेतन और जान के खतरे वाली नौकरी पर असमंजस में पड़े माँ-बाप और बड़ी बहन को किसी तरह मनाकर सोमेश ट्रेनिंग पर निकल गया। फायर फाइटिंग के अभ्यास में सोमेश अपने बैच में सबसे आगे था। उसके पास रहने से उसके साथी जोश, सकारात्मकता से भर जाते थे। सोमेश से पिछड़ने के बाद भी सभी उसे पसंद करते थे। ट्रेनिंग के बाद सोमेश की पहली नियुक्ति दिल्ली में हुई। उसके छोटे कस्बे की तुलना में दिल्ली जैसे पूरी दुनिया था। जहाँ उसे अपनी जगह का आराम पसंद था वहीं महानगर की चुनौती का अपना ही मज़ा था। जब उसने सुना कि दिल्ली के कुछ इलाकों में 1 वर्ग किलोमीटर में 12,000 तक लोग रहते हैं तो किसी छोटे बच्चे की आँखों जैसा अविश्वास भर गया उसमें। गर्मी के मौसम में शहर में ख़ासकर औद्योगिक क्षेत्रों में लगने वाली आग के मामले बढ़ने लगे थे। अपनी शिफ्ट में सोमेश की दमकल वैन रोज़ाना 2-3 जगह जा रही थी, शिफ्ट ख़त्म होने के बाद भी ज़रुरत पड़ने पर सोमेश पास के अपने कमरे से फायर स्टेशन पहुँच जाता था। अपनी ड्यूटी के समय से बाहर या अधिक काम करना उसके लिए इतना सामान्य हो गया था कि उसके सीनियर अधिकारीयों, सहकर्मियों ने यह बात नोट करनी तक बंद कर दी थी। उसके दोस्त हँसते थे कि दुनिया में सबसे पॉजिटिव इंसान सोमेश है, इतना ज़िंदादिल तो फिल्मों के हीरो तक नहीं होते। सोमेश वापस उन्हें कहता कि वो सब भी आशावान बनें, हमेशा अच्छा सोचें, अपने भगवान या उपरवाले पर भरोसा रखें क्योकि जिस भी जगह पर वह गया वहाँ लोग आग, भूकम्प आदि से घायल तो हुए पर किसी की जान नहीं गयी। 

उसकी दिनभर की थकान नींद से कम बल्कि घरवालों से घंटे-आधा घंटे बातें कर ज़्यादा ख़त्म होती थी। अक्सर उसने कितने लोगो को कैसे बचाया, कैसे बीमारी में भी स्टेशन आने वालो में सबसे पहला वो था, कैसे घायल पीड़ित के परिजन उस से लिपट गए, कैसे ट्रैफिक में कुछ देर हो जाने पर उनपर भीड़ ने पत्थर बरसाए या उनकी पिटाई तक की। 

"माँ! आज आप मानोगी नहीं। सीढ़ी पर से झूलकर बिल्डिंग से गिरता हुआ बच्चा पकड़ा मैंने, पूरे मोहल्ले ने आशीर्वाद दिया मुझे। कोई कपडे दे रहा था, कोई वैन में घर पर बनाई मिठाई ज़बरदस्ती रख गया। बच्चे की माँ तो अपना सोने का कड़ा उतार कर दे रही थी पर मैंने लिया नहीं। उसे देख कर आपकी याद आ गयी।"

माँ का मन करता था कि सोमेश बस बोलता रहे। उसकी आवाज़ में जो ख़ुशी झलकती थी वो ही माँ के लिए सबसे बड़ी दौलत थी। 

"....फिर ना माँ ओखला में तुरंत दूसरी जगह जाना पड़ा। हम लोगो की गाडी ख़राब हो गई और पहुँचते-पहुँचते लेट हो गए। भीड़ ने घेर लिया और गुस्से में एक आंटी ने संजय के चप्पल बजा दी, बाकी लोग वैन की तरफ बढ़ने लगे तो मैंने माइक से समझाया कि देर हो गयी पर जो लोग फँसे हैं उन्हें बचा लेने दो फिर पीट लेना। राधे-कृष्ण की जो कृपा रही किसी को ज़्यादा चोट तक नहीं आई, सारे लोग बचा लिए।"

माँ बोली - "अपना ध्यान रखा कर। बेटा हर जगह ऐसे मत बढ़ा कर, कहीं लोग ना सुने... "

सोमेश ने माँ को दिलासा दिया - "माँ भगवान आपकी और मेरी हर बात सुनते हैं। इतने महीने हो गए यहाँ मेरे सामने कोई नहीं मरा, ना मुझे कुछ हुआ। कुछेक  बार जलती बिल्डिंग, भूकंप से तहस-नहस घरों में फँसे लोग देखकर जब सबने उम्मीद छोड़ दी तब भगवान से माँगा बस बचा लो आपका सहारा है। जाने कैसे सबको बचा लाये हम लोग। तुम्हारे साथ-साथ दर्जनों लोगो का आशीर्वाद बटोरता हूँ रोज़। सब अच्छा होगा माँ, तुम चिंता मत किया करो।"

सोमेश पर भगवान की कृपा बनी रही और उसकी नौकरी का एक साल पूरा हुआ। एक दिन उसे शहर के बाहरी इलाके में स्थित अपार्टमेंट में लगी आग के मौके पर भेजा गया। अपार्टमेंट के आग के लिए पहले ही कुछ फायर वैन पहुँच चुकी थी पर भीषण आग बिल्डिंग से आस-पास मज़दूरों की बस्तियों में फ़ैल गयी थी। दूर-दराज़ के इलाके और तंग गलियों के कारण लोगो को बचाने में मुश्किलें आ रहीं थी। एक-एक सेकण्ड से लड़ते हुए दमकल कर्मियों के कुछ दल अलग-अलग स्थानों पर फ़ैल गए। सोमेश भगवान का नाम लेता हुआ बस्ती के अंदरूनी हिस्से में फँसे लोगो को बचाने लगा। कुछ देर में स्थिति काबू में आई पर घायलों के लिए इन अंदरूनी इलाकों तक एम्बुलेंस, अन्य मदद आने में काफी समय लगना। 

तभी सोमेश की नज़र एक औरत के निर्जीव शरीर के पास खड़े 2 दमकलकर्मियों पर पड़ी। वो दोनों बहस कर रहे थे कि क्या यह औरत ज़िंदा है या नहीं। तेज़ धड़कनों के साथ जब सोमेश पास पहुँचा उसे एक पूरी तरह जल चुकी गर्भवती महिला दिखी। उस महिला ने किसी तरह हाथ की ज़रा सी हरकत से जैसे बहस कर रहे बचावकर्मियों को बताया कि अभी उसमे जान थी। तारकोल की तरह चौथी डिग्री के जले के निशानों के साथ उसका मांस जगह-जगह से उतर रहा था और चेहरे की जगह एक अधभुने मांस का चिथड़ा दिख रहा था। उसका एक हाथ पेट से जलकर पेट से चिपका हुआ था, शायद जलते हुए भी वो अपने बच्चे को दिलासा दे रही थी कि सब ठीक हो जाएगा। दर्द में उसका शरीर हल्की फड़कन कर रहा था। सोमेश ने उसको पानी पिलाने की कोशिश की पर पानी की बूंदों के मांस से छूने से भी वो दर्द से और तेज़ हिलने लगी। सोमेश को विश्वास ही नहीं हो रहा था कि उसके साथ ऐसा कुछ हो सकता है। उसके साथ तो अंत में तो सब ठीक हो जाता था। एक सहकर्मी ने बताया कि इस औरत का पूरा परिवार मर चुका है। मदद आने में अभी बहुत समय था और पीड़ित औरत की हालत इतनी ख़राब थी कि सोमेश खुद को उस औरत के बचने की ज़रा सी उम्मीद का दिलासा तक नहीं दे सकता था। बेनाम औरत का दर्द सोमेश से देखा नहीं जा रहा था, नम आँखों से वह घुटनो के बल उसके पास बैठ गया। उसके हाथ बार-बार औरत की तरफ बढ़ते और उसे दर्द ना हो तो शरीर को छूने से पहले ही रुक जाते। 

हमेशा हँसमुख, आशावादी रहने वाला, आज जीवन में पहली बार हार मान चुका सोमेश ऊपर देखते हुए रुंधे गले से बोला -  "भगवान बहुत दर्द सह लिया इसने, प्लीज़ इस औरत को मार दो भगवान। इसे अपने पास बुला लो...प्लीज़ इसे मार दो..."

शायद भगवान ने उसकी पुकार सुन ली थी। उस औरत की नब्ज़ चली गई और साँसों का उतार-चढ़ाव भी बंद हो गया। भारी मन से सोमेश बस्ती के अन्य हिस्सों की तरफ बढ़ गया। 

समाप्त!
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#मोहित_शर्मा_ज़हन
Artwork - Alok Pawar
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