Freelance Falcon ~ Weird Jhola-Chhap thing ~ ज़हन

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Friday, November 22, 2019

कुछ मीटर पर...ज़िंदगी! (कहानी)


आस-पास के माहौल का इंसान पर काफ़ी असर पड़ता है। उस माहौल का एक बड़ा हिस्सा दूसरे इंसान ही होते हैं। एक कहावत है कि आप उन पांच लोगों का मिश्रण बन जाते हैं जिनके साथ आप सबसे ज़्यादा समय बिताते हैं। जहाँ कई लोग दूसरों को सकारात्मक जीवन जीने की सीख दे जाते हैं वहीं कुछ जीवन के लिए अपना गुस्सा, नाराज़गी और अवसाद अपने आस-पास छिड़कते चलते हैं।

35 साल का कुंदन, रांची की एक बड़ी कार डीलरशिप में सेल्समैन था। अक्सर खुद में कुढ़ा सा रहने वाला जैसे ज़िंदगी से ज़िंदगी की चुगली करने में लगा हो। उसकी शिकायतों का पिटारा कभी ख़त्म ही नहीं होता था। इस वजह से उसके ज़्यादा दोस्त नहीं थे। गांव से दूर शहर में अकेले रहते हुए वह घोर अवसाद में पहुंच गया था। उसे लगता था कि दुनिया में कोई उसे समझता नहीं था। वैसे उसका यह सोचना गलत नहीं था...आखिर कम ही लोग लगातार एक जैसी नकारात्मकता झेल सकते हैं।
इस बीच उसके पड़ोस में निजी स्कूल की शिक्षिका तृप्ति आई। वह कुंदन की तरह ही औरों से कुछ अलग थी। धीरे-धीरे दोनों में बातें शुरू हुईं और दोनों एक-दूसरे को पसंद करने लगे। नहीं...नहीं यह प्यार वाला "पसंद" करना नहीं था। दोनों इस हद तक नकारात्मक होकर अवसाद में डूब चुके थे कि उनकी शिकायती बातें कोई और समझ रहा है और पसंद कर रहा है...बस यह बात ही दोनों को कुछ तस्सली देती थी। कहते हैं किसी का साथ इंसान को अवसाद की गर्त से निकालने के लिए काफी होता है पर ये दोनों तो साथ ही दलदल में डूब रहे थे। यह भी किस्मत की बात थी कि इस सयानी दुनिया की आदत पड़ने के बाद भी दोनों ने अपने मन के उन दबे राज़ों को खोला, जिनको लोग पागलपन का नाम देकर बात तक करना नहीं चाहते। कुछ हफ्ते बीतने के बाद कुंदन और तृप्ति को अपने बीच कुछ प्यार जैसा महसूस तो हुआ पर उसके ऊपर टूटे व्यक्तित्वों की इतनी परतें थी जिनके पार देख पाना असंभव था।
धीरे-धीरे बातों के विषय शिकायत, परेशानी से अलग होकर स्थायी हल पर आने लगे। दोनों आत्महत्या पर बातें करने लगे। यही तो इनके मन में था। हर झंझट से चुटकी में छुटकारा पाना। दोनों का प्यार बढ़ रहा था लेकिन दोनों को ही खुद पर भरोसा नहीं था...कहीं उनका बावरा मन इस नॉवल्टी से बोर होकर पुरानी रट न लगाने लगे। एक दिन दोनों आत्महत्या के तरीकों पर गहरा विमर्श करने लगे। तृप्ति ने कुंदन से अनुरोध किया कि प्यार में घुली इस दोस्ती के नाते दोनों को साथ  मरना चाहिए। 

कुंदन तृप्ति के बालों में हाथ फिराता हुआ बोला। - "मैं भी ऐसा ही चाहता हूँ! लेकिन मैं साधारण मौत नहीं चाहता।" 

तृप्ति ने दिलचस्पी भरी नज़रों से कहा - "मतलब? यह असाधारण मौत कैसी होती है भला?"

कुंदन - "मतलब, ज़िंदगी ढंग की न सही मौत तो ज़बरदस्त होनी चाहिए। ऐसे जैसे लोग मरते न हों...क्या कहती हो?"

तृप्ति - "वाह! ठीक है, चलो कुछ 'ज़बरदस्त' सोचते हैं। हा हा!"

मरने की बातें जो लोग गलती से करने पर भी भगवान से माफ़ी मांगते हैं। इधर कुंदन और तृप्ति कितनी आसानी से कर रहे थे।

घंटों बातें करने के बाद दोनों के अपनी मौत का अलग तरीका चुना। अगले दिन कुंदन डीलरशिप से बहाना बनाकर एक कार निकाल लाया। उसने अपनी गारंटी पर तृप्ति को कुछ देर टेस्ट ड्राइव के लिए दूसरी कार दी। योजना यह थी कि सुनसान तालाब के बगल वाली सड़क के एक छोर से तेज़ रफ़्तार कार में कुंदन आएगा और कुछ दूर से तृप्ति। दोनों इस गति से एक-दूसरे से टकराएंगे कि मौके पर मौत पक्की। अगर कोई घायल होकर कुछ देर के लिए बच भी जाए तो इस वीरान इलाके में किसी के आने तक उसका भी मरना तय था। दोनों फ़ोन पर जुड़े और साथ में अपनी-अपनी कार चालू कर तेज़ी से एक-दूसरे की तरफ बढ़े। डीलरशिप से निकली चमचमाती कारें अपनी किस्मत और कुंदन-तृप्ति को कोस रहो होंगी। 

"आई लव यू!"

"आई लव यू टू!"

क्या इस इज़हार में देर हो गई थी? क्या यही अंत था?

जब कारें दो-ढाई सौ मीटर की दूरी पर थी तो कुंदन और तृप्ति को बीच सड़क पर एक नवजात बच्ची पड़ी हुई दिखी। शायद इनकी तरह कोई और भी इस वीराने का फ़ायदा उठा रहा था...इस बच्ची को खुद मारने के बजाय प्रकृति से हत्या। कायर! 

इतनी रफ़्तार में फ़ोन पर कुछ बोलने का समय नहीं बचा था दोनों ने आँखों में बात की और टक्कर होने से कुछ मीटर पहले गाड़ियां मोड़ दी। जीवन का इतना समय केवल आत्महत्या और इस पल के बारे में सोचने वाले इतने करीब से कैसे चूक गए? शायद उस बच्ची में दोनों को जीने की वजह मिल गई थी। बच्ची को देखने के बाद के दो सेकंड और आँखों से हुई बात ने कुंदन और तृप्ति की जीवन भर की उलझन सुलझा दी थी। तृप्ति की कार तालाब में जा गिरी वहीं कुंदन पेड़ से टकराने से बाल-बाल बचा। घुमते दिमाग के साथ कुंदन ने उतरकर उस बच्ची को कार में रखा और तालाब में छलांग लगा दी। कुंदन किसी तरह तृप्ति के पास पहुंचा जो जीने के लिए डूबती कार की खिड़की को ज़ोर-ज़ोर से मार रही थी। कितना अजीब है न कि कुछ सेकंड पहले वह मरने को तड़प रही थी और अब जीने के लिए पागल हुई जा रही थी। इस बात को भांपकर दोनों इस स्थिति में भी मुस्कुराने लगे। कार का शीशा टूटा और कुंदन तृप्ति को तालाब से सुरक्षित निकाल लाया। मौत की आँखों में झांककर और जीवन की डोर पकड़कर दोनों खुशी से काँप रहे थे। बच्ची भी हल्की नींद में मुस्कुरा रही थी जैसे अपने नए माँ-बाप की बेवकूफियों पर हँस रही हो।

तृप्ति और कुंदन वापस उस जीवन, उन संघर्षों में एक नई उम्मीद के साथ वापस लौटे और अपने सकारात्मक नज़रिए से जीवन को बेहतर बनाने लगे। अब जब भी वे परेशान होते तो अपनी बेटी का चेहरा देखकर सब भूल जाते। ऐसा नहीं था कि उन्हें किसी जादू से ज़िंदगी में खुशियों की चाभी मिल गई थी, बस अब वे ज़िंदगी से बचते नहीं थे बल्कि उससे लड़ते थे।

उस दिन कुंदन और तृप्ति ने उस बच्ची को नहीं बचाया था...उस बच्ची ने बस वहाँ मौजूद होकर उन दोनों की जान बचाई थी।

समाप्त!
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Artwork - Louis L.
#ज़हन

Saturday, November 2, 2019

Colorblind Beloved - कलरब्लाइंड साजन Translation


'Colorblind Beloved’, English translation of my story ‘कलरब्लाइंड साजन’. Translator - Swarajya. PC - Art Corgi

कभी कोई किसी रचना पर ऑडियो बना देता है, कोई अनुवाद कर देता है पर रचनाकार को कोई नहीं बताता! 😠

Friday, August 3, 2018

Editor - Ibadat Ishq ki Poetry Collection (Vikas Durga Mahto)


Book - Ibadat Ishq ki (Poetry Collection)
Poet - Vikas Durga Mahto
My role - Editor
Publisher: Sooraj Pocket Books; First edition (31 July 2018)
Language: Hindi
ISBN-10: 9388094018
ISBN-13: 978-9388094016
Package Dimensions: 23 x 18 x 3 cm

इस दौर में लोगों को काव्य से बांधना मुश्किल होता जा रहा है। बचपन से उँगलियों पर रखे मनोरंजन के हर साधन के बीच काव्य कहीं रूठ सा गया है। विकास महतो जैसे कवियों के कारण काव्य जैसे कुछ समय के लिए मान जाता है। किसी ग्लेशियर से अभी-अभी पिघली पावन धारा से उनके शब्द मन में घर कर लेते हैं। बाहरी ट्रेंड को देखकर बहुत से कवि खुद को बंदिशों में रखकर रचना सोचते हैं। ऐसी रचनाएँ कभी अच्छी बन सकती हैं पर उनपर दिखावे की परत साफ़ झलकती है, जैसे वो रचनाकार समाज के मानकों को ज़बरदस्ती रिझाना चाहते हों। विकास की कविताओं, ग़ज़ल-नज़्म काव्य की ख़ास बात ये है कि उनमें किसी तरह का बनावट नहीं है। हर रचना में अनेक भावों का अद्भुत घनत्व झलकता है। उनके मन से निकली भावनाओं का पाठक के मन से जुड़ना तय होता है। कविताओं को कुछ श्रेणियों में बांटा गया है और हर श्रेणी अपने में पूरी लगती है। किताब के लिए दो अतिरिक्त रचनाओं को लिखते हुए मैं डर रहा था कि क्या मैं विकास की रचनाओं के साथ न्याय कर पा रहा हूँ...आशा है आपको किताब पढ़ते हुए वैसा रस मिलेगा जैसा मुझे संपादन करते हुए मिला। 


Wednesday, May 23, 2018

ख्याल...एहसास (ग़ज़ल) #ज़हन


एक ही मेरा जिगरी यार,
तेरी चाल धीमी करने वाला बाज़ार...
मुखबिर एक और चोर,
तेरी गली का तीखा मोड़। 
करवाये जो होश फ़ाख्ता,
तेरे दर का हसीं रास्ता...
कुचले रोज़ निगाहों के खत,
बैरी तेरे घर की चौखट। 

दिखता नहीं जिसे मेरा प्यार,
पीठ किये खड़ी तेरी दीवार...
कभी दीदार कराती पर अक्सर देती झिड़की,
तेरे कमरे की ख़फा सी खिड़की। 
शख्सियत को स्याह में समेटती हरजाई
मद्धम कमज़र्फ तेरी परछाई...
कुछ पल अक्स कैद कर कहता के तू जाए ना...
दूर टंगा आईना। 
जाने किसे बचाने तुगलक बने तुर्क,
तेरे मोहल्ले के बड़े-बुज़ुर्ग। 

...और इन सबके धंधे में देती दख़्ल,
काटे धड़कन की फसल,
मेरी हीर की शक्ल...
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Thursday, April 5, 2018

रोग में मिला जोग...स्वर्ग में बनी शादी (कहानी) #ज़हन

Artwork - Vinj Gagui

मानसिक रोग विशेषज्ञ डॉक्टर जैना गर्भावस्था में ली कुछ महीनों की छुट्टी के बाद हॉस्पिटल काम पर लौटी थीं। रोज़ के काम के बीच कुछ कागज़ों ने जैना का ध्यान खींचा। शाम तक उन कागज़ों की बात जैना के मन में गोते लगा रही थी। आखिरकार उसने विभाग की नर्स से अपनी शंका का समाधान करना उचित समझा। 

"ये रिटायर्ड मेजर उत्कर्ष और मिस कोमल कैसे गायब हो गये? दोनों की मानसिक हालत दयनीय थी। मुझे तो लगा था...अभी कम से कम मेरे प्रसव के कई महीनों बाद तक इनका इलाज चलेगा।"

नर्स को ज़्यादा जानकारी नहीं थी, उसने इतना ही बताया - "डॉक्टर, उन दोनों ने शादी कर ली। उसके कुछ समय बाद दोनों का ट्रीटमेंट बंद हो गया।"

जवाब में जैना विस्मित सी केवल "क्या!" बोल पायी। 

अब तो इन दोनों में उसकी जिज्ञासा और बढ़ गयी थी। अन्य डॉक्टर एवम कर्मचारियों से संतोषजनक जानकारी ना मिल पाने की वजह से पूरी बात जानने के लिए जैना ने उनके घर जाने का फैसला किया। कोमल सालों तक घरेलु हिंसा की शिकार तलाकशुदा औरत थी और उत्कर्ष पड़ोसी देश से युद्ध की विभीषिका झेल चुका पूर्व-सैनिक था। इतने मानसिक और शारीरिक शोषण के बाद कोमल टूटकर गंभीर अवसाद में रहा करती थी। वहीं उत्कर्ष जंग में खून की नदियों में नहाकर पी.टी.एस.डी. (पोस्ट ट्रॉमेटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर) से पीड़ित होकर अवसाद, घुटन से जूझ रहा था। दोनों के उपचार में जैना ने न जाने कितने जतन किये थे पर उसे अधिक सफलता नहीं मिल पायी थी। अब ऐसा क्या हो गया जो इतने कम वक़्त में ना सिर्फ दोनों ठीक हो गये बल्कि दो से एक हो गये। जैना नवदंपत्ति के घर पहुँची। दोनों ने अपने दुख की घड़ियों के एक पुराने साथी का स्वागत किया। औचारिकताओं के बाद जैना मुद्दे पर आयी। 

"...तो जो काम इतने टाइम मैं और मेरी टीम नहीं कर सकी वो प्यार ने कर दिया? जबसे आप दोनों के बारे में सुना है तबसे ये सवाल परेशान कर रहा है।"

कोमल चहक कर बोली - "हाँ डॉक्टर, प्यार ने भी और नफरत ने भी।"

जैना की उलझन और बढ़ गयी - "नफरत? मैं समझी नहीं। हॉस्पिटल में मानसिक रोगियों को ऐसे नकारात्मक शब्द तो हम लोग बोलने भी नहीं देते थे। तो फिर  इस से इलाज कैसे हो गया?"

उत्कर्ष ने मुस्कान देते हुए समझाया - "डरिये मत, हम दोनों ने आपकी कही हर बात पर अमल किया है। कहते हैं किसी एक बात के लिए प्यार होना...दो लोगो को करीब ला सकता है। जैसे घूमने के शौक में, कला के शौक में या किसी एक विषय के पागलपन में पड़े दो लोग कब एक दूसरे की तरफ आकर्षित हो जाएं पता भी नहीं चलता। हम लोग हॉस्पिटल में मिले और एक चीज़ के लिए दोनों की नफरत हमें पास ले आयी।"

जैना की जिज्ञासा के शांत होते ज्वालामुखी में से आख़री भभका निकला - "कौनसी चीज़?"

उत्कर्ष - "हिंसा!....हिंसा के प्रति हम दोनों का गुस्सा, उस से जन्मी घुटन से दोनों की दुश्मनी में कब हम एक-दूजे का दर्द समझने लगे...और मरहम लगाने लगे पता ही नहीं चला। कुछ ही हफ़्तों में जैसे पूरी ज़िन्दगी का लदा बोझ उतर गया और हम सामान्य जीवन जीने लगे। डॉक्टर, कभी-कभी दो दर्द एक-दूसरे का ध्यान बँटाकर ख़त्म हो जाते हैं। 

समाप्त!
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Thursday, January 25, 2018

रहनुमा अक्स (नज़्म) #mohit_trendster


पिघलती रौशनी में यादों का रक़्स,
गुज़रे जन्म की गलियों में गुम शख़्स,
कलियों की ओस उड़ने से पहले का वक़्त।  
शबनम में हरजाई सा रंग आया है,
जबसे तेरे अक्स को रहनुमा बनाया है...

तेरे दर का सरफिरा रास्ता, 
इश्क़ की डोर में वाबस्ता, 
दिल में मिल्कियत...हाथ में गुलाब सस्ता। 
उपरवाले ने अब मेरी दुआओं का हिसाब बनाया है,
जबसे तेरे अक्स को रहनुमा बनाया है... 

नारियल सा किसका नसीब,
माना जिन्हे रक़ीब, 
निकले वो अपने हसीब। 
वक़्त की चुगली में जाने कितना वक़्त बिताया है,
जबसे तेरे अक्स को रहनुमा बनाया है... 

कहना उनको बात पुरानी हो गयी,
बचपन की अंगड़ाई जवानी हो गयी,
बिना पाबंदी मन की मनाही। 
दरख्तों की खुरचन पर दौर की स्याही,
12 सालों पर भारी जैसे एक कुम्भ छाया है,
जबसे तेरे अक्स को रहनुमा बनाया है...

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#ज़हन

Thumbnail Art - Gaston S Garcia‎
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Sunday, July 9, 2017

कलरब्लाइंड साजन (कहानी) #ज़हन


"देखना ये सही शेड बना है? आना ज़रा..."

"मैं नहीं आ रही! जब कोई काम कर रही होती हूँ तभी तुम्हे बुलाना होता है।"

अपने कलाकार पति आशीष को ताना मारती हुई और दो पल पहले कही अपनी ही बात ना मानती हुई रूही, उसके कैनवास के पास आकर खड़ी हो गई। 

रूही - "यहाँ नारंगी लगाना होगा तुम लाल सा कर रहे हो।"

आशीष छेड़ते हुए बोला - "किस चीज़ की लालसा?"

रूही - "इस लाल रंग ने नाक में दम कर रखा है। देखो! जब कोई बिजी, थका हुआ हो तो उसे और गुस्सा नहीं दिलवाना चाहिए। गैस बंद कर के आई हूँ।"

आशीष ने आँखों से माफ़ी मांगी और रूही मुस्कुराकर रंगो का संयोजन करवाने में लग गई। आशीष कलरब्लाइंड था, उसकी आँखें लाल और हरे रंग और उनके कई शेड्स में अंतर नहीं कर पाती थीं। उसे ये दोनों रंग भूरे, मटमैले से दिखते थे। इनके अलावा इन मूल रंगों से मिलकर बने अन्य रंग भी फीके से दिखाई देते थे। वर्णान्ध होने के बाद भी अपनी मेहनत के दम पर आशीष बहुत अच्छा पेंटर बन गया था। हालाँकि, अक्सर उसकी कलाकृतियों में रंगो का मेल या संयोजन ठीक नहीं बैठता था, इसलिए वह इस काम में रूही की मदद लेने लगा। रूही पास के प्राइमरी स्कूल में अध्यापिका थी और आशीष अपनी कलाकृतियों की कमाई पर निर्भर था। घर की आर्थिक स्थिति साधारण थी पर दोनों एक-दूसरे के प्रेम को पकड़े गृहस्थी की नैया खे रहे थे। रूही के परिजन, सहेलियां उसे इशारों या सीधे तानो से समझाते थे कि वो आशीष की कला छुड़वाकर किसी स्थिर नौकरी या काम पर लगने को कहे। रूही जानती थी उसके एक बार कहने पर आशीष ऐसा कर भी देगा पर वो उस आशीष को खोना नहीं चाहती थी जिसके प्रेम में उसने सब कुछ छोड़ा था। उसे दुनिया के रंग में घोल कर शायद वो फिर कभी खुद से नज़रे ना मिला पाती। 

एक दिन स्कूल से घर लौटी रूही कमरे में आशीष के खाँसने की आवाज़ें आईं। कमरे में आशीष खून की उल्टियाँ कर रहा था। रूही को देखकर सामान्य होने की कोशिश करता आशीष लड़खड़ाकर ज़मीन पर गिर पड़ा और बात छुपाने लगा - "ये...ये लाल रंग बना है ना? देखो गलती से फ़ैल गया, मैं साफ़ कर दूँगा।"

उसका खून अधूरी पेंटिंग पर बिखर गया था। इधर आँसुओं से धुंधली नज़रों को पोंछती रूही दौड़कर आशीष के पास आई। 

"तुम्हे झूठ बोलना नहीं आता तो क्यों कोशिश कर रहे हो? चलो हॉस्पिटल!"

हॉस्पिटल में हुई जांच में रूही को पता चला कि आशीष को झूठ बोलना आता है। वो कई महीनों से छोटा मर्ज़ मान कर अपने फेफड़ों के कैंसर के लक्षण छुपा रहा था, जो अब बढ़ कर अन्य अंगो में फैल कर अंतिम लाइलाज चरण में आ गया था। अब आशीष के पास कुछ महीनों का वक़्त बचा था। दोनों अस्पताल से लौट आये। अक्सर बुरी खबर का झटका तुरंत महसूस नहीं होता। पहले तो मन ही झुठला देता है कि कम से कम हमारे साथ तो ऐसा नहीं हो सकता। फिर फालतू की छोटी यादें जो किसी तीसरे को सुनाओ तो वो कहेगा कि "इसमें क्या ख़ास है? यह तो आम बात है।" पर वो भी कैसे समझेगा आम बात अगर किसी ख़ास के साथ हो तो उस ख़ास की वजह से ऐसी बातें आम नहीं रहती। 

रात के वक़्त आशीष से उलटी तरफ करवट लिए, तकिये पर मुँह सटाये सिसक रही रूही को उसके जीवन का सबसे बड़े ग़म का झटका लगा था। मन के ज्वार-भाटे में बहते कब सुबह हुई पता ही नहीं चला। इस सुबह रूही ने फैसला किया कि दुनिया में आशीष के बचे हुए दिनों को वो रो कर खराब नहीं करेगी और ना ही आशीष को करने देगी। उधर आशीष ने जैसे रूही के मन में जासूस बिठा रखे थे, उसने भी अपना बचा समय अपने जीवन की दो खुशियों को यानी रूही और पेंटिंग्स को देने का निर्णय लिया। एक-एक लम्हा निचोड़ कर जीने में दिन बड़ी जल्दी गुज़रते हैं। टिक-टिक करती घडी पर कैनवास डाल कर, लाल-हरे-भूरे रंग के फर्क पर हँसते दोनों का समय कट रहा था। एक दिन आशीष ने रूही को एक फाइल पकड़ाई जिसमे उसके बीमा, अकाउंट आदि के कागज़ और जानकारी थी। फाइल के अलावा एक पन्नी में लगभग तीन लाख रुपये थे। 

"इतने पैसे?" रूही ने चौंक कर पूछा। 

आशीष - "हाँ, 2-3 आर्ट गैलेरी वालों पर काफी पैसा बकाया था। पूरा तो नहीं मिला पर पीछे पड़ कर और कैंसर की रिपोर्ट दिखा के रो-पीट कर इतना मिल गया कि कुछ समय तो तुम्हारा काम चल ही जाए। तुम वहाँ होती तो मेरी एक्टिंग देख कर फ्लैट हो जाती।"

रूही - "मुझे नहीं होना फ्लैट, मैं कर्वी ही ठीक हूँ।"

दोनों हँसते-हँसते लोटपोट हो गए और एक बार फ़िर सतह की ख़ुशी की परत में दुखों को लपेट लिया। इस सतह की परत में एक कमी होती है, पूरे शरीर पर अच्छे से चढ़ जाती है पर आँखों को ढकने में हमेशा आनाकानी करती है। कुछ दिनों बाद रूही के नाम एक कुरियर आया और आशीष के पूछने पर रूही ने बताया कि उसने आशीष के लिए ख़ास इनक्रोमा चश्मा खरीदा है। इस चश्मे को लगाकर कलरब्लाइंड लोग भी बाकी लोगो की तरह सभी रंग देख सकते हैं और मूल रंगों में अंतर कर सकते हैं। इस चश्मे के बारे में आशीष को पता था और उसे यह भी पता था कि ये प्रोडक्ट बहुत महंगा और कुछ ही देशो तक सीमित था। कीमत जानकर उसने अपना सिर पीट लिया। 

आशीष बिफर पड़ा - "3 लाख! अरे पागल क्या पता तीन दिन में मर जाऊं। इस से बढ़िया तो उन गैलरी वालों पर एहसान ही चढ़ा रहने देता। क्या करूँगा बेकार चश्में का?"

रूही - "तुम्हे मुझपर भरोसा नहीं है? रह लूँगी तुम्हारे बिना। नहीं चाहिए तुम्हारा एहसान। मुझे हरा रंग देखना है, लाल रंग देखना है, जामुनी रंग में जो हल्की मैरून की झलक आती है वो देखनी है, जो तुम्हे कभी समझ नहीं आता तुम्हारी आँखों से मुझे वो कमीना लाल रंग देखना है।"

इतने दिनों से जो ख़ुशी की परत थी वो धीरे-धीरे हट रही थी। 

रूही - "अब ये चश्मा पहनो, आँखों को एडजस्ट करने में कुछ मिनट का टाइम लगता है इसलिए सामने नीली दीवार को देखो और आराम करो। बस अभी  तुम्हारा कैनवास और कलर्स लेकर आती हूँ।"

 रूही बिना कैनवास और रंग लिए लौटी। दुल्हन के श्रृंगार और लाल जोड़ें में रूही आशीष के सामने थी। 

लाल रंग देखकर आशीष उस रंग से पुरानी दुश्मनी भूल मंत्रमुग्ध होकर बोला - "ये....ये...लाल..."

हामी में सिर हिलाती रूही आशीष से लिपट गयी। दोनों की आँखों से बहते पानी ने झूठी ख़ुशी की परत धोकर सुकून की नयी परत चढ़ा दी। रूही ने घाटे का सौदा नहीं किया था, उसने तीन लाख देकर अपनी ज़िन्दगी का सबसे अनमोल पल खरीदा था। 

समाप्त!
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Painting by artist Clement Vauchel 
#mohitness #mohit_trendster #मोहित_शर्मा_ज़हन #freelance_talents

Thursday, March 9, 2017

कुत्ते ने काट लिया! (हास्य कहानी) #ज़हन

दिलजला कुत्ता

कुत्ते के काटने और गोली लगने में तुलना की जा सकती है। जैसे कुत्ता काटकर निकल ले, उसके दाँतों और आपके शरीर का कोण सही ना बैठे या आप तुरंत छुड़ा लें, तो उसे गोली शरीर से छूकर निकलना कहा जा सकता है, फिर दूसरा होता है कि कुत्ता तसल्ली से शरीर के किसी हिस्से को हपक के काटे और कुछ सेकंड चिचोड़े भी तो इसे कहेंगे गोली लगना। अभी रुकिए! तीसरा गोलियों से छलनी होना नहीं सुना? या जो फिल्मों में विलेन बोलते हैं, "गोलियों से भून डालो इसे!" वो तब होता है जब कुत्ता पगला जाए और व्यक्ति को जगह-जगह काटे, मारने-पीटने पर भी न छोड़े और जान छुड़ानी भारी पड़ जाए। ये कहानी एक ऐसे ही पागल कुत्ते की है....प्यार में पागल कुत्ते की।

सच्चे प्यार की फ्रीक्वेंसी जन्मजन्मांतर तक सेट होती है। पिछले जन्म में ये कुत्ता जी सूर्य शर्मा नामक इंसान हुआ करते थे। सुन्दर, सुशील और दयावान, मतलब इतने गुणी की इनके गुणों की संख्या से लोग जलते थे। इन्हें अपने मोहल्ले की युवती सुलोचना पर क्रश था। कई महीनो तक शर्मा जी शर्माते-शर्माते, तरह-तरह के जतन करते आखिरकार अपना प्रेम अभिव्यक्त करने में सफल रहे और शुरू हुई एक इंटर-लाइफ लव स्टोरी! सूर्य और सुलोचना एक दूसरे को इतनी अच्छी तरह समझते थे कि चेहरे के भाव देख कर समझ जाते थे कि उनके प्रीतम के मन में धूम मच रही है या कुछ देर पहले खाये गोलगप्पे ज़्यादा तीखें हैं। 

प्रेमी जोड़े में बुद्धिमत्ता बहुत थी तो बिना किसी जानकार को भनक लगे किसी गुप्तचर की चपलता से दोनों लगभग रोज़ ही मिल लेते थे। सुलोचना की रूचि फैशन डिजाइनिंग में थी और वह एक प्रतिष्ठित यूरोपीय संस्थान में पढाई की स्कॉलरशिप का सपना देख रही थी। उस छात्रवृत्ति के लिए सुलोचना को फैशन डिप्लोमा की आवश्यकता थी जिसकी फीस लाखो में थी। सूर्य को जब यह बात पता चली तो उसने अपने सभी संसाधन सुलोचना के डिप्लोमा की तरफ केंद्रित किये। अपनी दूकान बेचकर उसने किसी तरह सुलोचना की फीस भरी। घर पर इन घटनाओं और हरकतों के लिए दोनों अब भी बहाने बना रहे थे। जैसे सुलोचना ने अपने घरवालो को बताया था कि उसे स्थानीय संस्थान द्वारा मिली छात्रवृति से उसकी कोई फीस नहीं लग रही है। भाग्य से डिप्लोमा हो जाने के बाद प्रतिभावान सुलोचना का चयन स्कालरशिप के लिए हो गया और वह फिनलैंड के प्रतिष्ठित फैशन संस्थान में पढ़ने चली गई। सूर्य को अपना हर बलिदान सार्थक लगा और वह आतुरता से सुलोचना के लौटने के दिन-हफ्ते-महीने गिनने लगा। 

लंबे इंतज़ार के बाद सुलोचना लौटी पर वही एक व्यक्ति से शादी करने के बाद। सूर्य का जैसे संसार उजड़ गया। कहाँ उसने आगे के एक-एक वर्ष की योजना बना रखी थी और कहाँ उसका अब बीत रहा हर क्षण कटीले पहाड़ चढ़ने जैसा था। सूर्य ने अपनी पुरानी प्रेयसी का सामना किया तो उखड़े मन से सुलोचना ने उस से कन्नी काट ली और कहा किशोरावस्था का प्यार असली प्यार नहीं होता। "यह ज्ञान की गंगा मेरी दूकान बिकने से पहले बहा देती कलमुँही।"

अब सूर्य को लगा कि इस मैटीरियलिस्टिक दुनिया में फिलोसॉफी और मोरल साइंस की किताबो वाले जीवन का कोई फायदा नहीं। उसने अपने व्यवहार के सभी गुणों को चुन-चुन कर अवगुण बनाया और इस भौतिक दुनिया से बदला लेने की ठानी। झूठ बोलना, छल करना, पैसा गबन करने से लेकर  छोटे पाप जैसे सोते हुए पिल्लो को लात मारना, पहले मीठा गिराकर चींटीयों का मेला लगाना और फिर उस स्थान पर खौलता हुआ पानी डालना या कड़े सोल वाले जूते पहनकर डांस करना, गरीबो के घर में कलह बढ़ाने के लिए मुफ्त में शराब बाँटना, बाजार में तरह-तरह की अफवाह फैलाना आदि। जब तक वह दिन में ऐसी कुछ हरकतें ना कर लेता उसके कलेजे को ठंडक नहीं मिलती थी। कुछ वर्षो बाद उसकी अकाल मृत्यु हो गयी और उसके खाते में लिखे हज़ारो-लाखो अपराधों के कारण उसने कुत्ते की योनि में जन्म लिया। भाग्य फिर उसे अपने पिछले जन्म की प्रेमिका के घर के बाहर ले आया। अब सुलोचना एक प्रौढ़ औरत, 6 साल के बच्चे की माँ थी। उसके घर के बाहर निरीह पिल्ले (सूर्य) की आवाज़ों से सुलोचना के बच्चे प्रणव का मन पिघल गया और वह अपने माता-पिता की अनुमति से उसे अपने घर ले आया। इस पिल्ले का नाम सूरज रखा गया। किसी कारणवश सूर्य (सूरज) में अब भी अपने पिछले जन्म की स्मृतियाँ प्रबल थी। उसे कुलोचना (जो वह सुलोचना को मन में बुलाता था) का धोखा, उसकी बातें, पेड़ की आड़ में ली गई पप्पियां तक याद थी। वह उस घर में रहना तो नहीं चाहता था पर सड़क के कुत्तो के बदहाल जीवन की अपेक्षा ऐसा पालतू जीवन बेहतर था। उसने देखा कैसे सुलोचना के बड़े हो रहे लड़के प्रणव की 3 गर्ल फ्रेंड्स हैं और सोचा ("बिलकुल माँ पे गया है नासपिटा"). सुलोचना का अपना भव्य बुटीक और एक स्थानीय ज़री कला के कपड़ो की दुकान थी। अपना व्यापार बढ़ाने और बड़े स्तर पर प्रचार के लिए उसे कुछ निवेशकों की आवश्यकता थी। उसके शहर में घूमने आ रहे कुछ विश्वप्रसिद्द फैशन डिज़ाइनर, व्यापारियों का प्रतिनिधिमंडल एक अच्छा अवसर था। उसे डर था कि उस से पहले कोई और प्रतिद्वन्दी बाज़ी ना मार ले जाए। आनन-फानन में उसने अपने घर के पर्दे, कालीन, गमले, नहाने की बाल्टी तक बदल दी। उसका पुराना आशिक कुत्ता सूरज ये ट्रेंड भांप चुका था। रात को उसने छुपकर कुलोचना और उसके पति पल्लव की बातें सुनी। 

"ऐसे कैसे सूरज की जगह क्यूट सा पग ले आयें। 3-4 साल से घर में है, प्रणव नाराज़ नहीं होगा?"

कुलोचना - "विदेशी मेहमानों के लिए घर का इतना सब बदलवाया है, अब उनके आगे देसी कुत्ते से अच्छा इम्प्रैशन नहीं जमेगा। परसो वो लोग आ रहे हैं, कल रात प्रणव के सोने के बाद, सूरज को कार से कहीं दूर छोड़ आएंगे।"

गुस्से मे कुंकारते सूरज ने गमले में ज़ोर से अपनी थूथन मारी और नया गमला चटक गया। दर्द तो हुआ पर उसे तसल्ली हुई की कुलक्षणी का ढाई सौ रुपये वाला  एक गमला तो चटकाया। अगली रात प्लान के अनुसार सूरज को घर से बाहर निकालने के लिए पल्लव, सुलोचना जब बालकनी से सटे डॉग हाउस पर पहुंचे तो सूरज वहाँ से नदारद था। पूरे घर में और आस-पास आधा घंटे ढूंढने के बाद भी जब उन्हें कुछ न मिला तो दोनों ने सुबह सूरज को देखने की बात सोची। सुबह भी सूरज कहीं नहीं दिखा। दोनों ने सोचा चलो अच्छा हुआ, सूरज अपने आप ही गायब हो गया और हमारे हाथो से पाप होने से बच गया। सुलोचना अपनी मासिक कमाई के आधे खर्च पर एक फैंसी पग कुत्ता ले आयी। अगले दिन सुलोचना के न्योते पर विदेशी प्रतिनिधिमंडल का आना तय हुआ। सभी बातें सुनियोजित चल रही थी, आखिर सुलोचना और पल्लव ने एक-एक बात का रिहर्सल कर रखा था। मेहमान घर में पधारे और उनके स्वागत सत्कार के बाद नाश्ता शुरू हुआ। इधर अपने मिशन के तहत गली के सभी कुत्तो के साथ सूरज पहले ही छुपकर घर की छत पर पहुँच चुका था। वो उस शाम घर से निकल कर पास की खाली ईमारत में छुप गया था। वैसे तो सड़क के आवारा कुत्ते पालतू कुत्तो से चिढ़ते हैं पर सूरज की दर्द, धोखे वाली प्रेम कहानी सुनकर सबका दिल पसीज गया और उन्होंने सूरज की मदद करने की शपथ ली। अपनी योजना पर रिहर्सल सूरज एंड पार्टी ने भी किया था। मेहमान अभी बैठे ही थे कि अचानक उनपर छत से उतरे  दर्जनों कुत्तो का सरप्राइज अटैक हुआ। सूरज अपनी कुत्ती भाषा में अपनी टुकड़ी का मार्गनिर्देशन करने लगा जो वहाँ मौजूद इंसानो को केवल "भौ भौ", "वुफ़-वुफ़" सुनाई दे रही थी। 

सूरज (कुत्ती भाषा में) - "साथियों दबोच लो सबको, रास्ते ब्लॉक कर दो! आज इन सबका ऐसा अतिथि देवो भवः करके भेजना है कि आगे भारत का नाम सुनके आत्मा खनक जाए इन लोगो की। अपनी-अपनी थूथन रगड़ दो इन सबके मुँह, शरीरों पर... लिसलिसा दो एक-एक को! शरीद के डेढ़ मीटर दूर से 'हाउ क्यूट', 'लवली कहके' उठाते हैं और फिर 4 बार हाथ धोते हैं। जरमोफोब कहीं के! दिखाओ इन्हें भारतीय कीटाणुओं की देशभक्ति। लोटा दो ज़मीन पे चिचोड़-चिचोड़ के! चाहे कोई हुश करे या डंडा मारे पर दन्त ऐसे गड़ाने हैं कि सबकी खाल में परमानेंट हलंत के निशान पड़ जाए। नेस्तोनाबूद कर दो ये घर...सोफे फाड़ दो, फर्नीचर तोड़ दो, राशन नाली में बहा दो, बस वो बाद के लिए चॉकलेट केक सरका लेना कोने में और रुक तू कुलोचना की बच्ची....रात से मैंने सू-सू रोक रखा है ताकि तेरा ढाई लाख का नीता लुल्ला डिजाईन लहंगा ख़राब कर सकूँ। ना-ना कुल्टा मुझे पुचकारने या दूध में भीगी ब्रेड जैसे लोलू लालच देने की कोशिश मत कर सनम बेवफा क्योकि जब प्यार की आग का बदला दिल में धधकता हैं ना जान-ए-तमन्ना तो ये संसार भुला देता है। बाल इतने लंबे  कैसे हो गए तेरे 2 दिनों में? ओह! नकली एक्सटेंशन बालों वाला जूड़ा...."

तभी किसी कुत्ते ने गलती से रेडियो चला दिया जिसपर लक्खा सिंह की भक्ति भेंटे चल रहे थे। 

सूरज - "आहा! किसने घड़ा? किसने घड़ा निराला माँ का रंगला चूड़ा....हो रंगला चूड़ा....मैंने नोच खाया कुलोचना का नकली एक्सटेंशन वाला जूड़ा हो नकली जूड़ा....

....और ये बोटॉक्स के इंजेक्शन लगाकर चेहरा बड़ा टाइट कर लिया है इसपर एक काटी तो बनती है। हाँ...गिड़गिड़ा, रो, माफ़ी मांग...मैं भी बहुत तड़पा हूँ कुत्ती! वो भी 2 जन्म। कहाँ है तेरा फिरंगी पग, देख तू उसकी तस्करी नाले पार वाली कॉलोनी मे करवाता हूँ और वो पल्लव वजन की वजह से लंगड़ा के चलता है ना, उसके दूसरे पैर में काट लेता हूँ फिर बैलेंस चलेगा।"

सिर पर कफ़न बाँध कर आये कुत्ते अपनी मिसमिसाहट दूर कर, आखिरकार सूरज के कहने पर वहाँ से दूसरे मोहल्लों के लिए निकल गए। सूरज नगर पालिका की वैन आने तक मोर्चे पर डटकर आतंक मचाता रहा। उसके बंदी बनाये जाने के बाद सुलोचना के घर का दृश्य किसी भूकंप के बाद जैसा था और वहाँ उपस्थित सभी पीड़ित किसी बम ब्लास्ट में जीवित बचे लोगो से लग रहे थे। नाक से अधिक मुँह से सांस लेते विदेशी मेहमान तुरंत भारत की सीमा से बाहर निकलने की बुकिंग करने लगे। सदमे में गमलो की मिट्टी और कुत्तो की लार का उबटन लगाए फ्रिज के नीचे दबी सुलोचना सोच रही थी कि आखिर उसे किस जन्म के पापो की सज़ा मिल रही है। 

समाप्त!

#मोहित_शर्मा_ज़हन #Mohitness

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Sunday, June 12, 2016

भूतनी बीवी (कहानी) - मोहित शर्मा ज़हन

गर्मी और उमस से परेशान क्षितिज छत पर टहल रहा था तभी एक आवाज़ से वह ठिठका, जैसे किसी ने उसका नाम लिया हो। मन का वहम मान कर वह मुड़ा तो "हू!" उसकी पत्नी राधिका हँस रही थी। क्षितिज की घिग्घी बंध गई, राधिका को मरे 4 महीने हो गए थे। डर के मारे क्षितिज की लो फ्रीक्वेंसी चीख निकली जो इंसान तो नहीं पर शायद चमगादड़ सुन सकते थे। हँसते-हँसते पागल राधिका की आत्मा इस मोमेंट को भी एन्जॉय कर रही थी। फिर उसने क्षितिज को समझाया। 

"डरो मत तुमसे मिलने आई हूँ बस, कुछ नहीं करुँगी।" क्षितिज ने खुद को सम्भाला, आत्मा होते हुए भी राधिका के चेहरे की वजह से डर की जगह उसके मन में पुरानी यादें चलने लगी। 

क्षितिज - "क्या करती हो यार? अभी यहीं पजामे में ही सू-सू कर देता मैं! मुझे लगा तुम्हारा अकेले मन नहीं लग रहा तो मुझे मारने आई होगी।"

राधिका - "हा हा हा....तुम्हारा चेहरा देख कर इतनी हँसी आई कि मन तो था थोड़ा कायदे से डराऊं तुम्हे। फिर सोचा कहीं फ्री फण्ड में हार्ट अटैक न आ जाए।" 

क्षितिज बोला -  "...और यह बताओ तुम्हे हू करने की क्या ज़रुरत है तुम तो पहले से ही..."

कुछ देर ख़ामोशी में दोनों एक-दूसरे को देखते रहे जैसे आँखों को भी बातें करने का मौका दे रहें हों, फिर राधिका बोली। "बस तुम्हे देखने आई थी, दूर से देखकर जा रही थी पर मन नहीं माना। बस एक चीज़ देखने की इच्छा है, नहीं तो मेरी आत्मा को शांति नहीं मिलेगी।" 

क्षितिज आतुर होकर बोला - "क्या? जो बोलो वो लाकर दूँ, क्या करूँ?"

राधिका - "वो जो शॉर्ट्स में तुम चिकनी चमेली और बेबी डॉल में सोने की मैशअप पर डांस करते थे प्लीज वो दिखा दो....प्लीज प्लीज प्लीज!"

क्षितिज - "सत्यानाश जाए तेरा करमजली चुड़ैल! हे भगवान....किसी को भेजो इसको ऊपर लाने के लिए।"

फिर क्षितिज ने शॉर्ट्स में इन आइटम सांग्स पर अपने अंदाज़ मे डांस किया और राधिका के ठहाके गूंजने लगे। जब गाने ख़त्म हुए तब नम हुयी आँखों को क्षितिज ने पोंछा पर अब राधिका वहां नहीं थी। 

समाप्त!
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Tuesday, March 26, 2013

Ishq mey Chloroform


Ishq mey Chloroform

-         Mohit Sharma (Trendster / Trendy Baba)



Ronit apne mohalle ki Rinnie naam ki ladki par flat tha. Dono jawan the, ek hi college mey padhte the, hesiyat mey bhi zyada antar nahi tha aur caste bhi ek thi. Matlab jaise kisi marathon runner ne 1-2 kilometers ki lead le li ho runner-up se. Cake Walk! Par Ronit ko baat taalne ki badi aadat thi. Rinnie use dekh kar muskurati thi, hint deti thi aur different prakaar ki mada aakarshan demonstration waali harkaten karti thi par saath engineering k baad  MBA k bhi 2 saal ho gaye to Rinnie ko laga ye banda Lolu-Chand hai. 

Ronit sahi mauke aur build up mey vishvaas rakhta tha. Rinnie k papa Mr. Pralay Pandit festivals mey us colony ki Samiti k swaghoshit sachiv the jabse wo aaye the colony mey. Ronit unko impress karne k liye kuch saalo se festivals par kaafi mehnat kar raha tha jis se Mogambo…..I mean Uncle ji khush bhi huey. Kai seasons mey lagataar aakhri moment par himmat jutane mey fail hone k baad Is baar usne decide kiya ki Diwali ka mauka achchha hai shaadi ki baat direct achchhe mood mey Uncle ji k saamne rakhne ka. Ronit ko 2 din pehle pata chala ki is baar Pandit family 2 shaadi attend karne  Gwalior jaa rahe hai. Ronit ne bina baat k Madhav Rao Sindhiya ji ko kosa kyoki wahi ek naam tha Gwalior se related uske zehan mey. 

Ab baari thi next big festival Holi ki, to Holi waale month mey Ronot k ghar Rinnie ki engagement ka invitation aaya, pata chala ki shaadi bhi April mey  hi hai. Ronit ne April mey paida huey apne ek dost ko ashleel gaaliyan suna kar apna krodh shaant kiya (kyoki April month se related wahi banda pehle dimaag mey aaya Ronit k). 

Orthodox aur andhvishvaadi Pandit ji ka parivaar, Rinnie ko ab kisi ki nazar na lag jaaye isliye bechari duniya se alag total lockdown ki jaa chuki thi. Ronit ne decide kiya ki wo aaj raat hi Rinnie ko manane ki kosish karega chupke se. Ronit rassi, slice ki bottle (pata nahi kyu laya gadha), torch, mask, chloroform (emergency k liye….aur rumaal bhul gaya sunghayega kaise/kisko ye ek sawal tha) lekar bagal k pipe se chadhne laga par lagta hai uspar shani ki dasha chal rahi thi Pipe se girkar wo bagal waale lawn ki ghaas kaatne waali machine par gira.

“AAAAAAAIIIIIIIIEEEEEEEEE…..Mummy!!!”

Usne kisi tarah dard control kiya, kuch serious to nahi hua tha par uska pairon mey moch aa gayi thi, haath-pair chhil bhi gaye the aur Slice ki bottle bhi fat gayit thi. Wo kuch samay tak dard k mare nirjeev pada raha, aesa lag raha tha jaise wo ek laash hai bas antar ye tha uske charo taraf khoon ki jagah mango juice faila hua tha. 

Tabhi usko ek aawaz ne instant-sanjivni ki tarah attention mode mey khada kar diya kuch nanoseconds mey.

“Kaun hai wahan? Mai shor machaungi. Wait kahin tum….Utho

“Ronit! are you OK? Chot to nahi lagi? Ye sab karne ki kya zaroorat thi. College mey hi bol dete…I like you too. Ye chloroform kyu? Kidnap karoge kya?”

“Naina, wo baat nahi hai….”       

Tabhi Naina ki mummy ki aawaz aayi andar se jo is aur badh rahi thi.

“Ye kaisi aawaz thi kaun hai wahan? Naina Beta kya toota?”

Naina ki mummy ki aawaz se to jaise dono ki mummy si mar gayi.

Naina - “Ab kya Karen? Mummy maar daalengi mujhe…”

Ronit – “Mai cooler ki aad mey chhup jata hun andhere mey…”

Naina – “Tum Mummy ko nahi jaante, aayin hai to sab check karke jayegi poori tassalli se, dekho wo paanch rupaye waali one beam torch leke aa rahi hai.”

Ronit – “Mai chloroform to laya hun par hanky bhool gaya ghar pe, ab kya karun?”

Naina – “Hey Bhagwan…..” 

Tabhi Mummy close in flieder ki tarah agrasar hui aur Ronit cooler ki aad mey hua.

“Kaun tha wahan?”

Naina – “Koi dikha nahi, Maa…ped ki side dekho.”

“Pehle ghar ki side dekhungi…”

Yaani ab Naina ki Mummy ki 'use and throw' torch aur Ronit k beech 10-12 seconds ka antar tha. Naina ki mummy palti aur Naina ne Suresh Raina si furti dikhate hue apna duppatta utaara aur mummy ki one beam torch k upar se Ronit ko timely paas kiya jisme chloroform duppatte par lagayi aur beam ko cover karte hue Bombastic fidayin hamla kiya jisme aunty off guard caught hui aur Out hui!

Naina ki baaton aur harkaton ne Ronit ko bataya ki usko Naina kitna chahti hai. Jaate-jaate 2-4 chummiyan exchange hui aur agli Diwali Ronit rishta lekar Naina k ghar pahuncha.

….Samaptam!!!!  

Moral of the Story – Dil beauty se kahin decade zyada durable hota hai on an average to logo k dil ko dekho. Jo tumhe pyaar kare usko apnao, uske peechhe bhaagne se faayda nahi jiski priorities ka tum hissa na ho. 

....aur Trendy Baba k darbaar mey chanda chadhane se manchaha rishta milta hai given aapke chande ka amount chindi-chor type na ho.

Pic Courtesy  - Mr. Harjeet Singh Chadha