Freelance Falcon ~ Weird Jhola-Chhap thing ~ ज़हन

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Tuesday, June 30, 2026

Grateful for the Journey

 

After an incredible journey of nearly 52 months, I recently bid farewell to Pocket FM.

It's amazing how quickly time flies. Looking back, I'm filled with gratitude for the people, the stories, and the experiences that made this journey so meaningful.

My heartfelt thanks to my wonderful team. It was a privilege working with all of you. A special thank you to Abhivyanjana ji, Akshay, Krunal, Sridhar, Rishi, Apurva, Rashmi ji, Rishikant, Sachin, Simran, and everyone who made these years so memorable.

I'm grateful to have contributed to some incredible shows, including:

  • Super Yoddha
  • Chanakya
  • Sherdil
  • Yakshini
  • Zero to Hero
  • Vashikaran

Being a part of stories that reached and entertained millions of listeners is something I'll always be proud of.

One of the most touching moments of my farewell was the beautiful gift my team gave me: a customized diary and pen set engraved with my name, along with a heartfelt handwritten note. It was a thoughtful gesture that I'll always cherish. Thank you for making me feel so valued.

As I look ahead to new opportunities, I do so with immense gratitude for everything I experienced at Pocket FM. The memories, learnings, friendships, and countless moments from these 52 months will always stay with me.

Thank you, Pocket FM, for an unforgettable journey. ❤️

#PocketFM #Gratitude #Farewell #NewChapter #Storytelling #AudioEntertainment

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Saturday, August 2, 2025

एक घर जो कभी छोटा न पड़ता था...

 

देवबंद में नाना-नानी का दो मंजिला मकान काफी जगह में फैला था। बचपन में गर्मियों की छुट्टियों में इतने cousins और रिश्तेदार आ जाते थे, लेकिन जाने कैसे उस घर में सबके लिए भरपूर जगह निकल ही आती थी। जैसे उस घर में कोई जादू हो कि वो कभी छोटा नहीं पड़ता। पहले के बड़े मकान या हवेलियाँ इतनी खुली जगह में बनती थीं कि आजकल के architects भी सोच में पड़ जाएँ कि इतनी जगह क्यों waste कर दी।

घर के बाहर का रंग भी अलग ही था। शायद गुलाबी करवाया था, जो धूप पड़ते-पड़ते नारंगी और गुलाबी का एक अनोखा मेल बन गया था। हर किसी को अपनी उम्र के हिसाब से साथी मिल जाते थे और कुछ हफ्तों का एक routine सा बन जाता था। सुबह नाश्ता, फिर आंगन या पास की खाली जगह में खेलना। कभी-कभी मामा जी बच्चों को बाग में ले जाते थे। वहाँ मामा जी किसी guide की तरह हमें पेड़ों और कुछ वन्य जीवों के बारे में जानकारी देते थे, जो भूले-भटके वहाँ आ जाते थे।

दोपहर होते ही बड़े भाई-बहनों से कॉमिक्स-पत्रिकाओं की फरमाइश शुरू हो जाती। तभी दूर से कुल्फी वाले के भोंपू से पहले उसके जर्जर ठेले की bottles की आवाज़ सुनते ही बच्चों का गिरोह दौड़ पड़ता। पैसे कहाँ से आएँगे, कौन देगा, इसकी चिंता किये बिना ही ढेरों ऑर्डर दे दिए जाते। जब धूप का असर कम होता तो पास के बाज़ार में घूमने निकल जाते। वहाँ इतनी दुकानें थीं कि हर बार कुछ नया देखने को मिलता। कभी कंचे वाला soda लुभाता, तो कभी उस समय की नई सी लगने वाली wafer chocolates। कोशिश ये रहती कि झुंड के साथ एक-दो बड़े लोग रहें, ताकि खाना-पीना चलता रहे।

शाम को कभी cartoons देख लेते। रात में light आती तो ठीक, लेकिन अगर ज्यादा देर के लिए चली जाती, तो सबके बिस्तर छत पर लग जाते। अब इतनी भीड़ में आसानी से नींद आ जाए, ये कैसे हो सकता था। कोई Disney hour पर बहस कर रहा होता, कोई मामा जी की चीते से लड़ने की कहानी सुन रहा होता, कहीं भूत-चुड़ैल के address verify किए जा रहे होते, तो कहीं इस पर चर्चा होती कि India Champions Trophy में कैसे qualify करेगी। ऐसे में अगर नीचे जाकर पानी, चादर आदि लाने को हम छोटे बच्चों को कहा जाता, तो अँधेरे जीने में जाना सबसे बड़ा challenge लगता।

उस दिन छोटे मामा जी के देहांत पर जब देवबंद पहुँचा तो मेरे भीतर का बच्चा अपने जाने-पहचाने spots को ढूँढ रहा था। आस-पास सबने अपने घर तुड़वाकर नए तरीके से बनवा लिए थे। ननिहाल के घर की थोड़ी मरम्मत ज़रूर हुई थी, लेकिन वो अब भी पुरानी यादों जैसा ही था। बाहर के गुलाबी रंग की quality बेहतर हो गई थी, जिसका मुझे अफ़सोस था, क्योंकि मेरे मन में तो वही पुराना गुलाबी-नारंगी रंग देखने की इच्छा थी। पहले के बने जरोखे, न जाने paint के कितने coats से ढक गए थे, और मज़बूत दरवाज़े अब भी वही थे।

देवबंद के बाज़ार में बड़े-बड़े hoardings लगे थे। पता नहीं इस सब के बीच वो दुकानदार अब भी होगा क्या, जिससे हम Big Fun और Big Babool के साथ cricket cards लिया करते थे। बाग जाने का मन हुआ, लेकिन पता चला अब हर जगह colony कट रही हैं। वहां का रास्ता पहले जैसा नहीं रहा, और मुझे साथ ले जाने वाला कोई “बड़ा” भी तो नहीं था।

मामा जी तस्वीर में मुस्कुरा रहे थे और सबकी आँखें नम थीं। पहले जब हम आते थे तो वे न जाने कैसे गरमा-गरम चाट, समोसे, fresh फल और मिठाई तुरंत ले आते थे, जबकि दुकानों का रास्ता इतना पास भी नहीं था। ऐसा लगता था जैसे दुकान वाले खुद दौड़कर उन्हें पकड़ा गए हों कि भांजे-भांजियों को सब कुछ ताज़ा मिलना चाहिए।

हमारे बचपन को सुंदर बनाने वाले मामा जी चले गए। अब देवबंद का नाम सुनते ही मन में खुशी नहीं, बस एक गहरी उदासी उतर आती है।

#ज़हन

Friday, May 10, 2024

समुद्र से पक्षियों का बैर (कॉमिक्स)

 

पुराने मेल स्क्रॉल करते हुए संजय गुप्ता सर का एक मेल दिखा। तब राज कॉमिक्स के उपक्रम "ट्राईकलर बुक्स" की मिनी कॉमिक्स की कुछ स्क्रिप्ट्स लिखीं थी (साल 2010-2011)। इन कॉमिक्स में बच्चों के लिए शिक्षाप्रद-मनोरंजक कहानियां होती थी। कॉमिक्स हिंदी और अंग्रेजी भाषाओं में प्रकाशित होती थी। इस कॉमिक्स "चिंकी और चिंकू में एक पक्षी जोड़ा समुद्र से दुश्मनी कर लेता है। समुद्र अहंकार में उनका मज़ाक उड़ाता है, लेकिन धीरे-धीरे पक्षी जोड़े के अभियान में कई प्राणी जुड़ जाते हैं।


#ज़हन

Sunday, May 14, 2023

Happy Mother's Day - A Valuable Lesson

 Happy Mother's Day! 

My mother, Shrimati Kamlesh, taught me a valuable lesson when I was young - to respect every individual, no matter who they are or what they do. She believed that being a law-abiding, hard-working human was enough reason to show respect to someone, regardless of their social status. In Hindi language, there are two words for "You" - "Aap" and "Tu / Tum". "Aap" is considered the respectful form of address.

I noticed that people around me were surprised and confused when I addressed workers or domestic help with "Aap". They would often ask me why I was showing them so much respect. To which, I would simply ask them back, "Why not?". For me, it was a matter of principle - I believed that every individual deserved to be treated with respect, regardless of their profession or social status. Using "Aap" was my way of acknowledging their worth and showing that I valued them as a human being. Looking back, I'm grateful for the lesson my mother taught me and the values she instilled in me. It has helped me become a better person and treat everyone with the respect they deserve. #mothersday #mom

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Monday, May 9, 2022

Walking down the memory lane - Naftonomix Event

 

‘Naftonomix '12-Beyond the Barrel’ organized by Department of Oil & Gas and Energy Trading, UPES aimed to facilitate students bring out the professional in them by providing platform where they can get an out-of-the book exposure to think out-of-the box and evaluate.

This two day student driven event, flanked by Prof Pokhriyal and other faculty members was initiated to provide students the chance to make a difference through performing & presenting cultural and artistic skills. The technical sub-events were case based context, management paper presentation, virtual trading, Click Pic (photography contest), Symposium, Knack (Poster making competition), Instinct (extempore), Business idea, Brain Storming (quiz) and Vaudeville (cultural event).

To conclude, Naftonomix 2012 proved not just the technical event providing platform only for the sharpening of the executive dexterity in the students to perform but also provided them with an arena of opportunities to step up and display their cultural and artistic skills.

*Won the Vaudeville event.

Thursday, February 6, 2020

एक आयोजन जिसने भारतीय कॉमिक्स को नई दिशा दी...


"Genereation Next Writers Workshop and Meet" इवेंट 25 जनवरी 2008 से 27 जनवरी 2008 को राज कॉमिक्स ने बुराड़ी, दिल्ली में करवाया था। इसमें शामिल होने के लिए दिसंबर 2007 में एक प्रतियोगिता रखी गई थी। उस प्रतियोगिता के कुछ विजेता इस 3 दिन के आयोजन का हिस्सा नहीं बन पाए थे, इस वजह से इवेंट में ऑनलाइन कॉमिक्स समुदाय में सक्रीय कुछ प्रशंसकों को शामिल होने की छूट मिल गई थी। 19 साल की उम्र में वहां जाना सपने जैसा था।


इन तीन दिनों के दौरान भारतीय कॉमिक्स से जुड़े कई लेखक कलाकार वहां मौजूद रहे, जैसे - तरुण कुमार वाही, अनुपम सिन्हा, ललित शर्मा, संजय गुप्ता, ललित सिंह, क्षितीश पैढी, बेदी जी, जगदीश कुमार, प्रदीप सहरावत आदि। यही नहीं यह आयोजन इतना सफल रहा कि इसमें शामिल लगभग 10 किशोर और युवा आगे चलकर कॉमिक्स और साहित्य की दुनिया से जुड़े। भारत में इंटरनेट के माध्यम से इतना बड़ा ये अपनी तरह के पहला आयोजन था और इसी के बाद सालाना 'नागराज जन्मोत्सव' आयोजन की नींव रखी गई। जिन लोगों से ऑनलाइन इतनी बातें की थी उनसे मिलकर विचार साझा करना अद्वितीय अनुभव रहा। आयोजन में लाइव स्केच सेशन, कॉमिक आईडिया से पूरी कॉमिक तैयार होने का सफ़र, राज कॉमिक्स के गोदाम-ऑफिस का टूर, कॉमिक्स की स्क्रिप्ट कैसे लिखी जाती है, किस तरह के संवाद, विचार और कहानियां इस माध्यम के अनुकूल हैं, एनिमेशन, जारी प्रोजेक्ट्स पर बातचीत जैसी कई चीज़ें हुई। ठहरने की व्यवस्था राज कॉमिक्स और अब बंद हो चुके एनिमेशन स्टूडियो RToonz के ऑफिस में की गई थी। वहां से आने के बाद मैंने राज कॉमिक्स की एक शाखा ट्राईकलर बुक्स के लिए कुछ मिनी-कॉमिक्स लिखी। यह कॉमिक्स बाल विकास और बच्चों को शिक्षा देते विषयों पर थी। मेरा बाकी सफ़र तो आपके सामने है ही...यह अनुभव एक सुखद याद के रूप में हमेशा मेरे साथ रहेगा।


पुरानी साइट काफ़ी पहले बंद हो जाने की वजह से कई फ़ोटो और जानकारी अब उपलब्ध नहीं है। सदस्यों का एक यह लिंक मिला है जिसमें 19 लोगों के नाम दिख रहे हैं। - RC Forum Main Awards & Contests

#ज़हन
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Thursday, June 20, 2019

बूढ़े बरगद के पार (कहानी) #ज़हन


संतुष्टि की कोई तय परिभाषा नहीं होती। बच्चा कुदरत में रोज़ दोहराये जाने वाली बात को अपने जीवन में पहली बार देख कर संतुष्ट हो सकता है, वहीं अवसाद से जूझ रहे प्रौढ़ को दुनिया की सबसे कीमती चीज़ भी बेमानी लगती है। नवीन के चाय बागान अच्छा मुनाफा दे रहे थे। इसके अलावा अच्छे भाग्य और सही समझ के साथ निवेश किये गए पैसों से वह देश के नामी अमीरों में था। एक ही पीढ़ी में इतनी बड़ी छलांग कम ही लोग लगा पाते हैं। हालांकि, नवीन संतुष्ट नहीं था। मन में एक कसक थी...उसके पिता हरिकमल।

जब नवीन संघर्ष कर रहा था तब उसके पिता हर कदम पर उसके साथ थे। वे अपने जीवन के अनुभव उससे बांटते, निराश होने पर उसे हौंसला देते और यहाँ तक कि उसके लिए कितनी भागदौड़ करते थे। ऐसा भी नहीं था कि ये कुछ सालों की बात थी। अब नवीन की उम्र 53 साल थी और उसके पिता करीब 82 साल के थे। आज जब जीवन स्थिर हुआ तो अलजाइमर के प्रभाव में वे पुराने हरिकमल जी कहीं गुम हो गए। नवीन के लिए बात केवल खोई याददाश्त की नहीं थी, मलाल था कि ऊपरवाला कुछ कम भी देता पर ऐसा समय देखने के लिए पिता को कुछ ठीक रखता। 

"बरगद..."

हरिकमल अक्सर ये शब्द बुदबुदाते रहते थे। कसक का इलाज ढूंढ रहे नवीन ने इस शब्द पर ध्यान तो दिया पर कभी इसपर काम नहीं किया। एक दिन दिमाग को टटोलते हुए नवीन ने इस बरगद की जड़ तक जाने की ठान ली। कुछ पुराने परिजनों से और कुछ अपनी धुंधली यादों से तस्वीर बनाई। गांव में घर के पास बड़ा सा बरगद का पेड़। खेती-बाड़ी करने के बाद पिताजी उसकी छांव में बैठा करते थे। इसके अलावा हरिकमल कुछ और भी कहते रहते थे पर वह बात पूरा ध्यान देने पर भी समझ नहीं आती थी।  ऐसा लगता था जैसे बरगद के बाद बोली बात उनके मन में तो है पर होंठो तक आते-आते बिखर जाती थी। क्या पता वह दूसरी बात अलजाइमर के प्रभाव में उन्हें याद न हो....या वे खुद बोलना न चाहते हों। अब अधूरी तस्वीर में एक पुराना बरगद था और बाकी यादों के कोहरे में छिपी कोई बात। चलो पूरी न सही एक सिरा ही सही। 

 नवीन ने विशेषज्ञों का एक दल पिताजी के आधे-अधूरे वर्णनों को पकड़ने में लगा दिया।

"बरगद..."

यह शब्द और इसके अलावा जो कुछ भी हरिकमल कहते उसपर गहन चर्चाएं होती, कलाकारों से स्केच बनवाये जाते और कंप्यूटर की मदद से उन्हें असलियत के करीब लाया जाता। परिजनों और नवीन की यादों पर शोध कार्य हुए। अंत में नवीन के एक फार्म हाउस का बड़ा हिस्सा साफ़ करके उसमें गांव जैसा पुराना घर और दूसरे शहर से जड़ों के नीचे कई मीटर मिट्टी समेत विशाल, पुराने बरगद को लगाया गया। कच्चे मकान और बरगद की कटाई छटाई इस बारीकी से की गई थी कि वो सबकी यादों के आइनों के सामने खरे उतर सकें। 

"बरगद..."

लो बरगद तो आ गया। नवीन, सारे परिजन और उसका अनोखा दल 'बरगद' पर हरिकमल जी की प्रतिक्रिया जानने को बेचैन था। हालांकि, डॉक्टरों ने किसी बड़े चमत्कार की उम्मीद रखने की सलाह नहीं दी थी। फिर भी ये अनोखा प्रयोग और इससे जुड़ी मेहनत, भावनाएं जैसे डॉक्टरों की सलाह को अनदेखा करने की अपनी ही सलाह दे रही थीं। 

हरिकमल को फार्म हाउस लाया गया। इस बात का पूरा खयाल रखा गया कि उन्हें अचानक बड़ा झटका न लगे। बरगद को ढ़ककर रखा गया। धीरे-धीरे उन्हें पुराने घर से जुड़ी चीज़ें दिखाई गईं, वैसे तापमान और खेतों में कुछ दिनों तक रोज़ थोड़ी देर के लिए रखा गया। जब उनकी प्रतिक्रिया और सेहत सही बनी रही तो आख़िरकार पुराने बरगद से उनके मिलने की तारीख तय हुई।

"बरगद..."
वह दिन भी आया। हरिकमल से मिलने उनका 'बरगद' आया था। वे बरगद से किसी पुराने यार की तरह लिपट गए। बरगद से ही उनका लंबा एकालाप में लिपटा वार्तालाप चला। उनकी ख़ुशी और संतुष्टि देख कर सभी अपनी मेहनत सफल मान रहे थे। इतने में हरिकमल ज़मीन पर निढाल होकर रोने लगे। सब कुछ ठीक तो हो गया था? अब क्या रह गया? 

सब सवालों से घिरे थे पर नवीन को जैसे जवाब पता था या शायद वह इस घटना का इंतज़ार कर रहा था। अपने दल और नौकरों को हरिकमल से दूर हटाकर नवीन उनसे लिपट गया।

"देख...बाबू..."

"बोलो पिता जी, क्या रह गया? क्यों परेशान हो...इतने सालों से। क्यों मुँह में मर जाती है बरगद के बाद दूसरी बात?"

दहाड़े मारते हरिकमल बोले - "बरगद तो आ गया..."

"बरगद तो आ गया...पर पुराना माहौल नहीं आया।"

समाप्त!  
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Wednesday, May 23, 2018

ख्याल...एहसास (ग़ज़ल) #ज़हन


एक ही मेरा जिगरी यार,
तेरी चाल धीमी करने वाला बाज़ार...
मुखबिर एक और चोर,
तेरी गली का तीखा मोड़। 
करवाये जो होश फ़ाख्ता,
तेरे दर का हसीं रास्ता...
कुचले रोज़ निगाहों के खत,
बैरी तेरे घर की चौखट। 

दिखता नहीं जिसे मेरा प्यार,
पीठ किये खड़ी तेरी दीवार...
कभी दीदार कराती पर अक्सर देती झिड़की,
तेरे कमरे की ख़फा सी खिड़की। 
शख्सियत को स्याह में समेटती हरजाई
मद्धम कमज़र्फ तेरी परछाई...
कुछ पल अक्स कैद कर कहता के तू जाए ना...
दूर टंगा आईना। 
जाने किसे बचाने तुगलक बने तुर्क,
तेरे मोहल्ले के बड़े-बुज़ुर्ग। 

...और इन सबके धंधे में देती दख़्ल,
काटे धड़कन की फसल,
मेरी हीर की शक्ल...
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Tuesday, January 26, 2016

"बड़े हो जाओ!" - मोहित शर्मा (ज़हन)

अपनी बच्ची को सनस्क्रीन लोशन लगा कर और उसके हाथ पांव ढक कर भी उसे संतुष्टि नहीं मिली। कहीं कुछ कमी थी...अरे हाँ! हैट तो भूल ही गया। अभी बीमार पड़ जाती बेचारी...गर्दन काली हो जाती सो अलग। उस आदमी को भरी धूप, गलन-कोहरे वाली कड़ी सर्दी या बरसात में भीगना कैसा होता है अच्छी तरह से पता था। ऐसा नहीं था कि वो किसी गरीब या अभागे परिवार में जन्मा था। पर अपने दोस्तों, खेल या कॉमिक्स के चक्कर में वो ऐसे मौसमो में बाहर निकल आता जिनमें वो किसी और बात पर बाहर निकलने की सोचता भी नहीं। ये उसका पागलपन ही था कि जब समाचारपत्र उसके शहर में माइनस डिग्री सेल्सियस पर जमे, कई दशको के न्यूनतम तापमान पर हेडलाइन्स छाप रहे थे, तब बुक स्टाल पर उन्हें अनदेखा करते हुए वह ठिठुरता हुआ उन अखबारों के बीच दबी कॉमिक्स छांट रहा था। या जो भूले बिसरे ही अपनी कॉपी-किताबों पर मुश्किल से कवर चढ़ाता था, वह कुछ ख़ास कॉमिक्स पर ऐसी सावधानी से कवर चढ़ाता था कि दूर से ऐसा लगे की शहर का कोई नामी कलाकार नक्काशी कर रहा हो। या वो जिसे स्कूल में कॉमिक्स का तस्कर, माफिया तक कहा जाता हो। जाने कितने किस्से थे उसके जूनून के, जो औरों को बाहर से देखने पर पागलपन लगता था। "बच्चो वाली चीज़ छोडो, बड़े हो जाओ!" यह वाक्य उसने 11 साल की उम्र में पहली बार सुना। उसने तब खुद को तसल्ली दी की अभी तो वो बच्चा ही है। फिर उसे यह बात अलग-अलग लोगो से सुनने और इसे नज़रअंदाज़ करने की आदत हो गयी। 

समय के साथ जीवन और उसकी प्राथमिकताएं बदली। यकायक व्यवहारिक, वास्तविक दुनिया ने चित्रकथा की स्वप्निल दुनिया को ऐसा धोबी पाट दिया कि कभी जो घर का सबसे ख़ास कोना था वह सबसे उपेक्षित बन गया। उसकी शादी हुयी! पत्नी द्वारा उस कोने की बात करने पर वह कोई ना कोई बहाना बनाकर टाल देता, जैसे वो अबतक अपने घरवालों को टालता आया था। जिसपर अब भी वह ख़ुशी से "बड़े हो जाओ" का ताना सुन लेता था। उसके दिमाग का एक बड़ा हिस्सा व्यवहारिक होकर स्वयं उसे बड़े हो जाने को कह रहा था। जबकि कहीं उसके मन का एक छोटा सा हिस्सा अक्सर नींद से पहले, सपनो में या यूँ ही बचपन, किशोरावस्था में उसके संघर्ष, जूनून की कोई स्मृति ले आता।  वो मन जिसे उसने वर्षो तक इस भुलावे में रखा था कि यही सब कुछ है बाकी दुनिया बाद में। अब मन का छोटा ही सही पर वह हिस्सा ऐसे कैसे हार मान लेता। 


फिर उसके घर एक नन्ही परी, उसकी लड़की का आगमन हुआ। जिसने बिना शर्त पूरे मन (उस छोटे हिस्से को भी) हाईजैक कर लिया। आखिरकार, उसने अपनी हज़ारों कॉमिक्स निकाली। हर कवर को देख कर उसकी कहानी, वर्ष, रचनाकारों के साथ-साथ उस प्रति को पाने का संघर्ष उसके मन में ताज़ा हो गया। जैसे एक बार कमेंटरी में मोहम्मद अज़हरुद्दीन को डिहाइड्रेशन होने की बात बताये जाने पर उसने ही अपने मित्रों को इस बात का मतलब समझाया था.... क्योंकि एक बार डॉक्टर ने यह उसे तब बताया था जब उसके घरवाले उसे कमज़ोरी, चक्कर आने पर पड़ोस में ले गए थे। उसे चक्कर जून की गर्मी में बाहर किस वजह से रहने से आये होंगे यह बताने की ज़रुरत नहीं। 2 किशोर उसके घर आये जिन्हे उसने अपनी कॉमिक्स के गट्ठर सौंपे। बड़े जोश में उसने अपने किस्से, बातें सुनाने शुरू किये पर उनसे बात करने के थोड़ी ही देर में उसे अंदाज़ा हो गया कि समय कितना बदल गया है और दोनों पार्टीज एक दूसरे की बातों से जुड़ नहीं पा रहें है। अंततः उन किशोरों ने विदा ली और दरवाज़े पर उन्हें छोड़ते हुए, मन का वह छोटा हिस्सा जो अबतक रूठा बैठा था, दबी सी आवाज़ में बोला "ख़्याल रखना इनका।"

कुछ महीनों बाद दिनचर्या बदली, काम और ज़िम्मेदारियाँ बढ़ीं। एक दिन पत्नी ने टोका - "इतने चुप-चुप क्यों रहते हों? क्या सोचते रहते हो? इंसान हो मशीन मत बनो! क्या हमेशा से ही ऐसे थे?" 

अच्छा लगा कि फॉर ए चेंज`व्यवहारिक, वास्तविक दुनिया वाले दिमाग को खरी-खोटी सुनने को मिली। पर फ़िर से जीवन की किसी उधेड़बुन को सोचते हुए उसने कहा - " ...बड़ा हो गया हूँ! यही तो सब चाहते थे।" :) 

समाप्त!

#mohitness #mohit_trendster #trendybaba #freelance_talents

Notes: काल्पनिक कहानी, यहाँ बाकी दुनिया को बेकार नहीं कह रहा, बस एक दुनिया छूट जाने का दर्द लिख रहा हूँ जो अक्सर देखता हूँ मित्रों में। Artworks by Mr. Saket Kumar (Ghulam-e-Hind Teaser)