‘Aids Peedit Vampire’ now on Kuku FM. More audio stories soon.
Freelance Falcon ~ Weird Jhola-Chhap thing ~ ज़हन
Friday, September 27, 2019
Friday, August 16, 2019
My Stories on Kuku FM #ज़हन
Talented Kuku FM team is creating audio stories, audio books on my stories and poems. 🤖 🥳
Kuku FM वेबसाइट और ऐप्लिकेशन पर सुनिए कई जॉनर में मेरी कहानियाँ और काव्य। पहली दो कहानियों के लिंक ये रहे -
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जल्द ही और कहानियाँ भी...
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मोहित शर्मा ज़हन
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Noida, Uttar Pradesh, India
Saturday, July 13, 2019
शहर के पेड़ से उदास लगते हो...(नज़्म)
दबी जुबां में सही अपनी बात कहो,
सहते तो सब हैं...
...इसमें क्या नई बात भला!
जो दिन निकला है...हमेशा है ढला!
बड़ा बोझ सीने के पास रखते हो,
शहर के पेड़ से उदास लगते हो...
पलों को उड़ने दो उन्हें न रखना तोलकर,
लौट आयें जो परिंदों को यूँ ही रखना खोलकर।
पीले पन्नो की किताब कब तक रहेगी साथ भला,
नाकामियों का कश ले खुद का पुतला जला।
किसी पुराने चेहरे का नया सा नाम लगते हो,
शहर के पेड़ से उदास लगते हो...
साफ़ रखना है दामन और दुनियादारी भी चाहिए?
एक कोना पकड़िए तो दूजा गंवाइए...
खुशबू के पीछे भागना शौक नहीं,
इस उम्मीद में....
वो भीड़ में मिल जाए कहीं।
गुम चोट बने घूमों सराय में...
नींद में सच ही तो बकते हो,
शहर के पेड़ से उदास लगते हो...
फिर एक शाम ढ़ली,
नसीहतों की उम्र नहीं,
गली का मोड़ वही...
बंदिशों पर खुद जब बंदिश लगी,
ऐसे मौकों के लिए ही नक़ाब रखते हो?
शहर के पेड़ से उदास लगते हो...
बेदाग़ चेहरे पर मरती दुनिया क्या बात भला!
जिस्म के ज़ख्मों का इल्म उन्हें होने न दिया।
अब एक एहसान खुद पर कर दो,
चेहरा नोच कर जिस्म के निशान भर दो।
खुद से क्या खूब लड़ा करते हो,
शहर के पेड़ से उदास लगते हो...
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#ज़हन
Thursday, June 20, 2019
बूढ़े बरगद के पार (कहानी) #ज़हन
संतुष्टि की कोई तय परिभाषा नहीं होती। बच्चा कुदरत में रोज़ दोहराये जाने वाली बात को अपने जीवन में पहली बार देख कर संतुष्ट हो सकता है, वहीं अवसाद से जूझ रहे प्रौढ़ को दुनिया की सबसे कीमती चीज़ भी बेमानी लगती है। नवीन के चाय बागान अच्छा मुनाफा दे रहे थे। इसके अलावा अच्छे भाग्य और सही समझ के साथ निवेश किये गए पैसों से वह देश के नामी अमीरों में था। एक ही पीढ़ी में इतनी बड़ी छलांग कम ही लोग लगा पाते हैं। हालांकि, नवीन संतुष्ट नहीं था। मन में एक कसक थी...उसके पिता हरिकमल।
जब नवीन संघर्ष कर रहा था तब उसके पिता हर कदम पर उसके साथ थे। वे अपने जीवन के अनुभव उससे बांटते, निराश होने पर उसे हौंसला देते और यहाँ तक कि उसके लिए कितनी भागदौड़ करते थे। ऐसा भी नहीं था कि ये कुछ सालों की बात थी। अब नवीन की उम्र 53 साल थी और उसके पिता करीब 82 साल के थे। आज जब जीवन स्थिर हुआ तो अलजाइमर के प्रभाव में वे पुराने हरिकमल जी कहीं गुम हो गए। नवीन के लिए बात केवल खोई याददाश्त की नहीं थी, मलाल था कि ऊपरवाला कुछ कम भी देता पर ऐसा समय देखने के लिए पिता को कुछ ठीक रखता।
"बरगद..."
हरिकमल अक्सर ये शब्द बुदबुदाते रहते थे। कसक का इलाज ढूंढ रहे नवीन ने इस शब्द पर ध्यान तो दिया पर कभी इसपर काम नहीं किया। एक दिन दिमाग को टटोलते हुए नवीन ने इस बरगद की जड़ तक जाने की ठान ली। कुछ पुराने परिजनों से और कुछ अपनी धुंधली यादों से तस्वीर बनाई। गांव में घर के पास बड़ा सा बरगद का पेड़। खेती-बाड़ी करने के बाद पिताजी उसकी छांव में बैठा करते थे। इसके अलावा हरिकमल कुछ और भी कहते रहते थे पर वह बात पूरा ध्यान देने पर भी समझ नहीं आती थी। ऐसा लगता था जैसे बरगद के बाद बोली बात उनके मन में तो है पर होंठो तक आते-आते बिखर जाती थी। क्या पता वह दूसरी बात अलजाइमर के प्रभाव में उन्हें याद न हो....या वे खुद बोलना न चाहते हों। अब अधूरी तस्वीर में एक पुराना बरगद था और बाकी यादों के कोहरे में छिपी कोई बात। चलो पूरी न सही एक सिरा ही सही।
नवीन ने विशेषज्ञों का एक दल पिताजी के आधे-अधूरे वर्णनों को पकड़ने में लगा दिया।
"बरगद..."
यह शब्द और इसके अलावा जो कुछ भी हरिकमल कहते उसपर गहन चर्चाएं होती, कलाकारों से स्केच बनवाये जाते और कंप्यूटर की मदद से उन्हें असलियत के करीब लाया जाता। परिजनों और नवीन की यादों पर शोध कार्य हुए। अंत में नवीन के एक फार्म हाउस का बड़ा हिस्सा साफ़ करके उसमें गांव जैसा पुराना घर और दूसरे शहर से जड़ों के नीचे कई मीटर मिट्टी समेत विशाल, पुराने बरगद को लगाया गया। कच्चे मकान और बरगद की कटाई छटाई इस बारीकी से की गई थी कि वो सबकी यादों के आइनों के सामने खरे उतर सकें।
"बरगद..."
लो बरगद तो आ गया। नवीन, सारे परिजन और उसका अनोखा दल 'बरगद' पर हरिकमल जी की प्रतिक्रिया जानने को बेचैन था। हालांकि, डॉक्टरों ने किसी बड़े चमत्कार की उम्मीद रखने की सलाह नहीं दी थी। फिर भी ये अनोखा प्रयोग और इससे जुड़ी मेहनत, भावनाएं जैसे डॉक्टरों की सलाह को अनदेखा करने की अपनी ही सलाह दे रही थीं।
हरिकमल को फार्म हाउस लाया गया। इस बात का पूरा खयाल रखा गया कि उन्हें अचानक बड़ा झटका न लगे। बरगद को ढ़ककर रखा गया। धीरे-धीरे उन्हें पुराने घर से जुड़ी चीज़ें दिखाई गईं, वैसे तापमान और खेतों में कुछ दिनों तक रोज़ थोड़ी देर के लिए रखा गया। जब उनकी प्रतिक्रिया और सेहत सही बनी रही तो आख़िरकार पुराने बरगद से उनके मिलने की तारीख तय हुई।
"बरगद..."
वह दिन भी आया। हरिकमल से मिलने उनका 'बरगद' आया था। वे बरगद से किसी पुराने यार की तरह लिपट गए। बरगद से ही उनका लंबा एकालाप में लिपटा वार्तालाप चला। उनकी ख़ुशी और संतुष्टि देख कर सभी अपनी मेहनत सफल मान रहे थे। इतने में हरिकमल ज़मीन पर निढाल होकर रोने लगे। सब कुछ ठीक तो हो गया था? अब क्या रह गया?
सब सवालों से घिरे थे पर नवीन को जैसे जवाब पता था या शायद वह इस घटना का इंतज़ार कर रहा था। अपने दल और नौकरों को हरिकमल से दूर हटाकर नवीन उनसे लिपट गया।
"देख...बाबू..."
"बोलो पिता जी, क्या रह गया? क्यों परेशान हो...इतने सालों से। क्यों मुँह में मर जाती है बरगद के बाद दूसरी बात?"
दहाड़े मारते हरिकमल बोले - "बरगद तो आ गया..."
"बरगद तो आ गया...पर पुराना माहौल नहीं आया।"
समाप्त!
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Wednesday, June 19, 2019
जब क्रिकेट से मिलने बाकी खेल आए...(कविता) #ज़हन
एक दिन सब खेल क्रिकेट से मिलने आए,
मानो जैसे दशकों का गुस्सा समेट कर लाए।
क्रिकेट ने मुस्कुराकर सबको बिठाया,
भूखे खेलों को पाँच सितारा खाना खिलाया।
बड़ी दुविधा में खेल खुस-पुस कर बोले...
हम अदनों से इतनी बड़ी हस्ती का मान कैसे डोले?
आँखों की शिकायत मुँह से कैसे बोलें?
कैसे डालें क्रिकेट पर इल्ज़ामों के घेरे?
अपनी मुखिया हॉकी और कुश्ती तो खड़ी हैं मुँह फेरे...
हिम्मत कर हाथ थामे टेनिस, तीरंदाज़ी आए,
घिग्घी बंध गई, बातें भूलें, कुछ भी याद न आए...
"क...क्रिकेट साहब, आपने हमपर बड़े ज़ुल्म ढाए!"
आज़ादी से अबतक देखो कितने ओलम्पिक बीते,
इतनी आबादी के साथ भी हम देखो कितने पीछे!
माना समाज की उलझनों में देश के साधन रहे कम,
बचे-खुचे में बाकी खेल कुछ करते भी...तो आपने निकाला दम!
इनकी हिम्मत से टूटा सबकी झिझक का पहरा,
चैस जैसे बुज़ुर्ग से लेकर नवजात सेपक-टाकरा ने क्रिकेट को घेरा...
जाने कौनसे नशे से तूने जनता टुन्न की बहला फुसला,
जाने कितनी प्रतिभाओं का करियर अपने पैरों तले कुचला...
कब्बडी - "वर्ल्ड कप जीत कर भी मेरी लड़कियां रिक्शे से ट्रॉफी घर ले जाएं...
सात मैच खेला क्रिकेटर जेट में वोडका से भुजिया खाये?"
फुटबॉल - "पूरी दुनिया में पैर हैं मेरे...यहां हौंसला पस्त,
तेरी चमक-दमक ने कर दिया मुझे पोलियोग्रस्त।"
बैडमिंटन - "हम जैसे खेलों से जुड़ा अक्सर कोई बच्चा रोता है,
गलती से पदक जीत ले तो लोग बोलें...ऐसा भी कोई खेल होता है?"
धीरे-धीरे सब खेलों का हल्ला बढ़ गया,
किसी की लात...किसी का मुक्का क्रिकेट पर बरस पड़ा।
गोल्फ, बेसबॉल, बिलियर्ड वगैरह ने क्रिकेट को लतिआया,
तभी झुकी कमर वाले एथलेटिक्स बाबा ने सबको दूर हटाया...
"अपनी असफलता पर कुढ़ रहे हो...
क्यों अकेले क्रिकेट पर सारा दोष मढ़ रहे हो?
रोटी को जूझते घरों में इसे भी तानों की मिलती रही है जेल,
आखिर हम सबकी तरह...है तो ये भी एक खेल!
वाह, किस्मत हमारी,
यहाँ एक उम्र के बाद खेलना माना जाए बीमारी।
ये ऐसे लोग हैं जो पैकेज की दौड़ में पड़े हैं...
हाँ, वही लोग जो प्लेस्कूल से बच्चों का एक्सेंट "सुधारने" में लगे हैं।
ऐसों का एक ही रूटीन सुबह-शाम,
क्रिकेट के बहाने सही...कुछ तो लिया जाता है खेलों का नाम।
हाँ, भेड़चाल में इसके कई दीवाने,
पर एक दिन भेड़चाल के उस पार अपने करोड़ों कद्रदान भी मिल जाने!
जलो मत बराबरी की कोशिश करो,
क्रिकेट नहीं भारत की सोच को घेरो!
समाप्त!
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Saturday, May 11, 2019
कई नाम हैं मेरे! (कहानी) - अनुभव पत्रिका मई 2019 में प्रकाशित
कल मेरा चेहरा और मेरी लिखी एक बात इंटरनेट पर वायरल हो गई। इतने सालों में ऐसा पहली बार हुआ है कि मुझे भी इतने लोगों ने जाना है। वायरल हुई बात बताने से पहले अपने बारे में थोड़ा बताता चलूं।
समाज के कायदे-कानून को बकवास बताने वालों को भी उन कायदों में रहकर अपने फायदे देखने पड़ते हैं। जो इन नियमों को नहीं मानते या मजबूरी में मान नहीं पाते उनकी किसी न किसी तरह से शामत पक्की है। 10-12 घंटे की नौकरी, 3-4 घंटे का आना-जाना बाकी नींद, खाने के अलावा क्या किया याद ही नहीं रहा। घर से दूर अजनबी शहर में पुराने यार भी छूट गए। ऐसी जीवनशैली के कद्दूकस में घिसकर जैसे सेहत, जवानी और दिमाग हर बीतते पल के साथ ख़त्म हो रहे थे। बचे समय में दिमागी संतुलन बचाने में सिर्फ़ इंटरनेट, सोशल मीडिया की आभासी दुनिया का सहारा था। यहाँ मैं भी कई लोगों की तरह अपने नीरस जीवन को चमकीली पन्नी में लपेट कर दिखाने में माहिर हो गया था। इस बीच बहुत से आभासी दोस्त भी बन गए। उन्ही में जीतता, उन्ही को जताता इस लत के सहारे जीता रहा।
उस मनहूस दिन मेरी माँ चल बसीं। कितना कुछ सोच रखा था उनके लिए! क्या-क्या करके उनका कर्ज़ उतारूंगा। अपनी औसत ज़िन्दगी में बेचारी का ज़्यादा कर्ज़ चुका नहीं पाया। मुझे घुटन हो रही थी कि अभी तो समय था, अभी मेरी सोची हुई बातें परवान चढ़नी थी...मेरे साथ ऐसा नहीं हो सकता! जब घुटन का कहीं कोई इलाज नहीं मिला तो माँ की तस्वीरों के साथ कुछ बातें लिख दीं। कलेजा से कुछ बोझ कम हुआ। अपने दर्द में मैं यह देख न पाया कि उन तस्वीरों में एक तस्वीर माँ के पार्थिव शरीर की भी अपलोड हो गई। जब तक वह तस्वीर हटाई तब तक वह कई जगह साझा हो चुकी थी। बस फिर क्या था सोशल मीडिया से वीडियो वेबसाइटों तक सब मेरा मज़ाक उड़ाने लगे, मुझ पर थूकने लगे कि कुछ लाइक्स, टिप्पणियों और लोगों का ध्यान खींचने के लिए मैं अपनी मरी माँ का सहारा ले रहा था। किसी ने ये तक कहा कि लड़कियों की सहानुभूति और उनसे दोस्ती बढ़ाने के लिए मैंने ऐसी गिरी हुई हरकत की। उन्हें क्या बताता...मेरी यह आदत अब मेरी बीमारी बन चुकी थी। न मेरे पास किसी करीबी दोस्त का कंधा था और न गला पकड़ती इस घुटन का कोई और त्वरित इलाज। मुझे माफ़ कर दो माँ!
मेरा नाम...कई नाम हैं मेरे! नहीं-नहीं भगवान नहीं हूँ। बस अपनी फ्रेंडलिस्ट में तो देखो एक बार, मैंने कहा ना...कई नाम हैं मेरे!
समाप्त!
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Tuesday, April 16, 2019
Nazm in Anubhav Patrika (April 2019)
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Thursday, April 11, 2019
New Comic - Horror Diaries 3.2 (Fiction Comics)
Maut Neeti and Flight 279 in Horror Diaries 3.2 (Fiction Comics)
Cover page
Maut Neeti (Page 1)
Artist - Neeshu Chauhan
Only one tiny issue, these old scripts were in Hinglish and typist (...and editor) converting Hinglish to Devnagri font missed-mixed few spellings. Anyways, one more comic in print. Yay!
Sunday, March 10, 2019
What's New...
Gift from Google #LocalGuides
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New story published - Anubhav Magazine (March 2019) Yatra Visheshank
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Kind words by artist-author Shambhu Nath Mahto
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News mentions, appearances...
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Great minds think alike… Langoor Peace Accord 1994, Sikandra (Akbar's Tomb)
Memories
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February 2019 Chess24 stats
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New job, new city (Noida).
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Tuesday, October 16, 2018
#Updates October 2018
Freelance Talents nomination certificate India 5000 Best MSME Award 2018
Event - Sooraj Pocket Books: Baaten, Kitaben, Mulaqaten #2 (30 September 2018)
Google Local Guides Level #06
Event appearance News Dainik Jagran (October 2018) and Dainik Bhaskar (September 2018)
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